एपिसोड 17– एक गलतफ़हमी की शुरुआत
शाम के छह बजने में अभी पाँच मिनट बाकी थे।
हॉस्पिटल की ट्रेनिंग खत्म हो चुकी थी। ज़्यादातर डॉक्टर अपने-अपने केबिन में जा चुके थे और कई मरीज भी आराम कर रहे थे। हॉस्पिटल के पीछे बने छोटे-से गार्डन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।
उधर आयत अपना बैग उठाने लगी।
तभी उसे बैग की चेन के अंदर एक मुड़ा हुआ कागज़ दिखाई दिया।
"ये क्या है...?"
उसने हैरानी से कागज़ खोला।
उस पर लिखा था—
"आज शाम ठीक छह बजे हॉस्पिटल गार्डन में मिलना। कुछ ज़रूरी बात करनी है। — अर्जुन"
आयत कुछ पल तक उस कागज़ को देखती रह गई।
उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
"अर्जुन... मुझसे मिलना चाहते हैं?"
उसने एक बार फिर कागज़ पढ़ा।
फिर हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
"शायद... कोई ज़रूरी बात होगी।"
वह धीरे-धीरे गार्डन की तरफ़ चल पड़ी।
उधर दूसरी तरफ़...
अर्जुन अभी भी वार्ड में था।
डॉ. मीरा सक्सेना ने उसे कुछ मरीजों की रिपोर्ट दोबारा चेक करने के लिए कहा था।
"अर्जुन, ये फाइलें आज ही पूरी करनी होंगी।"
"जी मैम।"
अर्जुन पूरी ईमानदारी से काम में लग गया।
उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उसके नाम से किसी ने एक चाल चल दी है।
दूर कॉरिडोर में खड़ा रोहन मुस्कुरा रहा था।
समर धीरे से बोला,
"लगता है अब मज़ा आएगा।"
रोहन बोला,
"बस पाँच मिनट और..."
"फिर दोनों के बीच पहली गलतफ़हमी शुरू हो जाएगी।"
गार्डन में...
आयत एक बेंच के पास आकर खड़ी हो गई।
चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उसने घड़ी देखी।
ठीक छह बज चुके थे।
"शायद... अभी आते होंगे।"
पाँच मिनट बीत गए।
दस मिनट...
पंद्रह मिनट...
लेकिन अर्जुन नहीं आया।
आयत के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी।
"क्या मैं गलत जगह आ गई हूँ?"
उसी समय पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आई।
आयत ने जल्दी से पीछे मुड़कर देखा।
लेकिन सामने अर्जुन नहीं...
रोहन खड़ा था।
रोहन मुस्कुराया।
"किसका इंतज़ार कर रही हो?"
आयत का चेहरा तुरंत सख़्त हो गया।
"आपसे मतलब?"
"मतलब है..."
रोहन धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ा।
"इतनी देर से अकेली खड़ी हो... इसलिए पूछ लिया।"
आयत दो कदम पीछे हट गई।
"मुझे अकेला छोड़ दीजिए।"
रोहन हँस पड़ा।
"जिसका इंतज़ार कर रही हो... वो नहीं आएगा।"
आयत चौंक गई।
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि अर्जुन अभी वार्ड में काम कर रहा है।"
आयत की आँखें फैल गईं।
"तुम्हें कैसे पता?"
रोहन ने कंधे उचकाए।
"पूरे हॉस्पिटल में सब जानते हैं।"
इतना कहकर वह मुस्कुराते हुए वहाँ से चला गया।
लेकिन जाते-जाते उसके चेहरे की मुस्कान बता रही थी कि उसे अपनी चाल पर पूरा भरोसा है।
उधर...
अर्जुन ने आखिर अपनी आख़िरी रिपोर्ट भी पूरी कर दी।
डॉ. मीरा ने कहा,
"गुड जॉब, अर्जुन। अब तुम जा सकते हो।"
"थैंक यू, मैम।"
अर्जुन हॉस्पिटल से बाहर निकलने लगा।
तभी उसकी नज़र गार्डन की तरफ़ गई।
उसे लगा जैसे वहाँ आयत खड़ी है।
वह उसी तरफ़ बढ़ गया।
आयत भी उसे आते हुए देख चुकी थी।
उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ दिखाई दे रही थी।
अर्जुन पास आया।
"आयत... आप अभी तक गई नहीं?"
आयत ने बिना मुस्कुराए पूछा,
"आपको अगर आना ही नहीं था... तो बुलाया क्यों?"
अर्जुन हैरान रह गया।
"मैंने... बुलाया?"
आयत ने बैग से वही कागज़ निकालकर उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये क्या है?"
अर्जुन ने कागज़ पढ़ा।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
"ये मैंने नहीं लिखा।"
आयत ने उसकी आँखों में देखा।
उसे लगा जैसे अर्जुन सच बोल रहा है।
"तो फिर... ये किसने रखा?"
अर्जुन कुछ सेकंड सोचता रहा।
फिर उसके दिमाग़ में अचानक एक चेहरा उभरा।
रोहन।
उसी समय दूर खड़ा रोहन उन दोनों को देख रहा था।
उसे लगा कि अब दोनों के बीच झगड़ा होगा।
लेकिन उसकी उम्मीद के उलट...
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा,
"आयत... मुझे नहीं पता ये किसने किया। लेकिन मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि मैं झूठ बोलने वालों में से नहीं हूँ।"
आयत कुछ पल तक उसकी आँखों में देखती रही।
फिर उसने धीरे से कहा,
"मुझे... आप पर भरोसा है।"
यह सुनकर अर्जुन के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
दूर खड़ा रोहन हैरान रह गया।
"ये क्या...?"
"गलतफ़हमी होने की जगह... इन दोनों का भरोसा और बढ़ गया!"
उसने गुस्से में अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
"अब खेल थोड़ा बड़ा खेलना पड़ेगा, अर्जुन वशिष्ठ..."
उसे नहीं पता था...
कि उसकी हर चाल अब अर्जुन की नज़रों में आने लगी थी।
और यह लड़ाई अब सिर्फ़ दुश्मनी की नहीं...
बल्कि भरोसे और साज़िश की भी बनने वाली थी।
क्रमशः...