hukm aur hasarat - 15 in Hindi Love Stories by Diksha mis kahani books and stories PDF | हुक्म और हसरत - 15

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हुक्म और हसरत - 15

💗 मेरे प्यारे ParaHearts के नाम... 💗

सबसे पहले... आप सभी से दिल से माफ़ी। ❤️

करीब 7–8 महीनों तक मैं हुक्म और हसरत का कोई नया अध्याय अपलोड नहीं कर पाई। मेरी पढ़ाई और कुछ ज़रूरी जिम्मेदारियों की वजह से मुझे लिखने से थोड़ा दूर होना पड़ा।

लेकिन यकीन मानिए... मैं आप सबको और अपनी इस कहानी को कभी नहीं भूली। हर बार जब हुक्म और हसरत का ख्याल आता था, तो सबसे पहले आप सभी ParaHearts याद आते थे, जिन्होंने इस कहानी और इसके किरदारों को इतना प्यार दिया। 🥹🌸

अब मैं वापस आ गई हूँ, पूरे दिल के साथ। ✨

मैं चाहती हूँ कि आप सभी एक बार फिर से शुरुआत से या जहाँ तक पढ़ा था, वहाँ से कहानी को दोबारा पढ़ें, ताकि आगे आने वाले अध्यायों का हर राज़, हर एहसास और हर मोड़ पहले से भी ज़्यादा गहराई से महसूस कर सकें।

अब से मैं हर हफ्ते एक नया अध्याय अपलोड करने की पूरी कोशिश करूँगी। 🤍

बस आप सबका वही प्यार, इंतज़ार और साथ फिर से चाहिए। आपके कमेंट्स, रिव्यू और सपोर्ट ही मुझे बेहतर लिखने की सबसे बड़ी प्रेरणा देते हैं। 💕

तो तैयार हो जाइए...

क्योंकि अर्जुन और सिया की कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली है, जहाँ से हर अध्याय आपको नए सवाल, नए राज़ और ढेर सारी भावनाएँ देगा। 🔥

आपका इंतज़ार खत्म हुआ...

आपकी अपनी,
Diksha ✍️

######
🌸🌸🌸🌸 हुक्म और हसरत 🌸🌸🌸🌸

#Arsia 🌹

अब तक आपने पढ़ा कि सिया फ्लोरेंस में पियानो आर्टिस्ट के रूप में सबके सामने आई। अर्जुन को अनजाने में ही उसकी चिंता होने लगी थी। वहीं कोई अनजान शख्स लगातार सिया पर नज़र रखे हुए था। 👀

✨ अब आगे... ✨

फ्लोरेंस की ठंडी हवाएँ अब भी वही थीं, लेकिन सिया के भीतर कुछ बदल चुका था। मंच पर बजे सुर थम चुके थे, मगर दिल की धड़कनों का शोर अब भी बाकी था।

एनजीओ इवेंट के लिए जाते समय काव्या उसके साथ थी। तभी अचानक सिया की नज़र सामने पड़ी...

अर्जुन।

ब्लैक सूट, आँखों में वही बर्फ़-सी गंभीरता... लेकिन इस बार कुछ अलग था।

उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान थी।

सिया का दिल एक पल के लिए जैसे थम गया।

"मो—"

अर्जुन की ज़ुबान पर नाम आते-आते रुक गया।

सिया ने बस एक पल उसकी ओर देखा... फिर बिना कुछ कहे पलट गई।

उसके कदम आगे बढ़ रहे थे, लेकिन दिल जैसे वहीं ठहर गया था।

"सिया!" 🔥

"राजकुमारी सिया!" 🌷✨

वह आवाज़ जैसे दूर से आती हुई महसूस हुई। सब कुछ धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा। आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा और पलकों पर भारीपन उतर आया...

...

"मैम... मैम!"

किसी ने उसके चेहरे पर हल्के-हल्के पानी के छींटे मारे।

सिया ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

सामने उसकी अंगरक्षक राधिका और काव्या घबराई हुई खड़ी थीं। दोनों के चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।

"मुझे... क्या हुआ?"

"मैम... आप बेहोश हो गई थीं।"

"क... क्या?" सिया ने हैरानी से चारों ओर देखा।

वह इस समय होटल के कमरे में अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। हाथ में ड्रिप लगी थी।

"मैम, अब आप ठीक हैं?" राधिका ने धीरे से पूछा।

सिया ने बस हल्के से सिर हिला दिया।

वह अब भी समझ नहीं पा रही थी कि आखिर उसके साथ हुआ क्या था। उसे तो बस इतना याद था कि वह स्टेज पर थी... फिर होटल लौट रही थी...

अब यहाँ कैसे...?

---

उसी होटल में...

रिसेप्शन पर अर्जुन को एक छोटा-सा पैकेट दिया गया।

न कोई नाम...

न कोई भेजने वाला...

उसने पैकेट खोला।

अंदर थीं...

सिया राठौर की फाइलें।

● उसकी तस्वीरें।

● एनजीओ विज़िट का पूरा शेड्यूल।

● पासपोर्ट की कॉपी।

और सबसे ऊपर...

एक फ़ोल्डर...

"Mission: Siya Rathore."

अर्जुन की उँगलियाँ अनायास ही कस गईं।

उसकी निगाहें उसी नाम पर ठहर गईं।

"सिया... राठौर..."

कुछ पल तक कमरे में सन्नाटा पसरा रहा।

फिर उसने गहरी साँस ली।

उसकी आँखों की ठंडक अब गुस्से में बदल चुकी थी।

"जो भी हो... बहुत बड़ी गलती कर रहे हो।"

उसने फाइल को धीरे से बंद किया।

"अब यह खेल तुम्हारे लिए नहीं... तुम्हारी मौत के लिए शुरू हुआ है।"

उसने पूरी फाइल अपने बैग में रखी और बिना एक पल गंवाए कमरे से बाहर निकल गया।

---

सिया की नज़र अपने बेड के सिरहाने रखे एक लिफाफे पर पड़ी।

उसे अचानक कुछ घंटे पहले की घटना याद आ गई...

होटल स्टाफ ने उसे वह लिफाफा देते हुए कहा था—

"मैम, किसी ने इसे लॉबी में आपके लिए छोड़ा है।"

सिया ने उलझन में लिफाफा खोला।

अंदर एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर थी।

तस्वीर में...

वह खुद...

घने जंगल के बीच बेहोश पड़ी हुई थी।

उसकी साँसें जैसे एक पल को रुक गईं।

तस्वीर के पीछे सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—

"तुम्हें लगता है तुम बच गई हो... लेकिन खेल अब शुरू हुआ है।"

सिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसने घबराकर सूखे गले से थूक निगला।

उँगलियाँ हल्का-हल्का काँपने लगीं।

तभी काव्या उसके पास आई।

"क्या हुआ?"

सिया ने झट से तस्वीर वापस लिफाफे में रख दी।

"कुछ नहीं... किसी का बेहूदा मज़ाक है।"

लेकिन उसकी काँपती उँगलियाँ उसकी झूठी मुस्कान का साथ नहीं दे पा रही थीं।

काव्या के पीछे खड़ी नई अंगरक्षक ने यह सब गौर से देखा।

उसने बिना कुछ कहे चुपचाप किसी को सूचना देने के लिए एक ओर कदम बढ़ा दिए।

शायद उसी सदमे और कई घंटों से कुछ न खाने की वजह से सिया बेहोश हो गई थी।

कम से कम डॉक्टर की रिपोर्ट तो यही कहती थी...

लेकिन सच्चाई...

शायद अभी किसी को नहीं पता थी।
---

इसी बीच, काव्या का फोन बजा।

उसने स्क्रीन पर नज़र डाली और हल्की-सी मुस्कान उसके होंठों पर आ गई।

"हैलो?"

"हाय, मिस असिस्टेंट मैडम..." सामने से वही परिचित आवाज़ आई।

काव्या मुस्कुरा उठी।

"राजकुमारी सिया ठीक हैं न?"

"सुना... वो बेहोश हो गई थीं?" विवेक की आवाज़ में चिंता साफ़ झलक रही थी।

"जी... अब वो ठीक हैं। डॉक्टर ने कहा है कि समय पर खाना न खाने की वजह से ऐसा हुआ।"

कुछ पल दोनों तरफ़ खामोशी छाई रही।

फिर विवेक ने धीरे से पूछा—

"वैसे... तुम कैसी हो?"

काव्या की मुस्कान और गहरी हो गई।

"पहले जैसी... लेकिन अब थोड़ी कम चुप।"

"अच्छा?"

"और मैं आज भी वही हूँ..." विवेक ने हल्के से हँसते हुए कहा, "जो तुम्हारी चुप्पी में भी बातें ढूँढ़ लेता है।"

काव्या की पलकों ने झुककर उसकी मुस्कान छिपाने की कोशिश की।

"है ना... मिस काव्या?"

"बिल्कुल..."

उसने मुस्कुराकर जवाब दिया।

"मिस्टर फ्लर्ट!"

विवेक ज़ोर से हँस पड़ा।

उस हँसी में जाने कैसी अपनापन था, जिसने काव्या के चेहरे पर पहली बार बिना किसी डर के खुली मुस्कान ला दी।

---

उसी समय...

राजमहल में मीरा एक पुरानी संदिग्ध फाइल के पन्ने पलट रही थी।

हर नया पन्ना एक नए राज़ से पर्दा उठा रहा था।

विक्रांत के NGO से जुड़े दस्तावेज़...

● फ़र्ज़ी बिलिंग।

● गायब फंड्स।

● बच्चों के नाम पर डोनेशन...

लेकिन असली रकम कहीं और भेजी जा रही थी।

मीरा की आँखें सिकुड़ गईं।

उसने धीरे से फाइल बंद की।

"जो इंसान खुद को दूध का धुला बताता है..."

"असल में उसके हाथ सबसे ज़्यादा गंदे हैं।"

एक पल भी गंवाए बिना उसने अर्जुन को सारी जानकारी भेज दी।

"वो सिर्फ़ तुम्हारा दुश्मन नहीं है..."

"सिया के सबसे करीब मंडराता सबसे बड़ा खतरा भी वही है।"

---

रात...

होटल से कुछ दूरी पर एक काली गाड़ी खड़ी थी।

उसके भीतर अँधेरा था।

सिर्फ़ लैपटॉप की नीली रोशनी एक चेहरे पर पड़ रही थी...

वही रहस्यमयी शख्स...

जिसके पास सिया की फाइलें थीं।

अर्जुन की गतिविधियों का पूरा रिकॉर्ड था।

और कई ऐसी जानकारियाँ...

जो किसी आम इंसान के पास हो ही नहीं सकती थीं।

उसने स्क्रीन पर नज़र टिकाई।

धीरे से मुस्कुराया।

"Siya Rathore is now moving exactly where we want her..."

(सिया राठौर अब ठीक वहीं जा रही है, जहाँ हम उसे ले जाना चाहते हैं।)

कुछ सेकंड बाद उसने अगली लाइन पढ़ी—

"But Arjun Suryavanshi is the only variable."

(लेकिन अर्जुन सूर्यवंशी ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति है जो पूरी योजना बदल सकता है।)

उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर चलीं।

स्क्रीन पर नए शब्द उभरे—

MISSION : SIYA RATHORE

PHASE II INITIATED

उसके होंठों पर एक खतरनाक मुस्कान फैल गई।

"अब असली खेल शुरू होगा..."

---

फ्लोरेंस से लौटे एक सप्ताह बीत चुका था।

महल की बालकनी में बैठी सिया हाथ में किताब लिए थी।

किताब खुली ज़रूर थी...

लेकिन उसकी नज़रें शब्दों पर नहीं ठहर रही थीं।

हर कुछ देर में हवा उसके बालों को छू जाती...

और उसके साथ एक जानी-पहचानी याद भी।

अर्जुन...

उसके लौटने के बाद से महल अजीब-सा खाली लगने लगा था।

वह खालीपन किसी सन्नाटे जैसा नहीं...

बल्कि एक अनकहे शोर जैसा था...

जिसे सिर्फ़ उसका दिल सुन पा रहा था।

तभी...

बिना किसी दस्तक के...

दरवाज़ा खुला।

एक जानी-पहचानी आहट कमरे में उतरी।

उसके साथ वही हल्की-सी खुशबू...

जिसे महसूस करते ही सिया का मन अनायास शांत हो जाता था।

उसने धीरे से नज़र उठाई।

और सामने...

अर्जुन खड़ा था।

काले कुर्ते में...

हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी...

आँखों में कई रातों की अधूरी नींद...

और चेहरे पर वही स्थिर गंभीरता।

लेकिन आज उसकी आँखों में कुछ और भी था...

एक अनकहा सुकून।

"कब लौटे?"

सिया की आवाज़ धीमी थी...

जैसे सवाल कम, इंतज़ार ज़्यादा हो।

अर्जुन जवाब देना भूल गया।

उसकी नज़रें बस सिया पर ठहर गईं।

हल्के रंग की सादी साड़ी...

ढीले जुड़े से निकलती कुछ लटें...

जो बार-बार उसके गालों को छू रही थीं।

बिना किसी मेकअप के चमकता मासूम चेहरा...

और होंठों पर सजी वही हल्की मुस्कान।

अर्जुन ने न जाने कितनी बार मौत को करीब से देखा था...

लेकिन इस पल...

एक मासूम मुस्कान ने उसके दिल की धड़कनों को सबसे ज़्यादा बेकाबू कर दिया।

उसे लगा...

जैसे दुनिया कुछ पल के लिए थम गई हो।

सिर्फ़ वह...

और सामने खड़ी सिया।

बाक़ी सब धुंधला।

सिया ने फिर पूछा—

"मैंने पूछा... आप कब आए?"

इस बार अर्जुन जैसे ख्यालों से बाहर आया।

उसने हल्के से गला साफ़ किया।

"अभी...

बस अभी।"
अर्जुन 🖤 ने हल्की साँस ली।

वह एक कदम आगे बढ़ा।

सिया 🌸 की पलकें अनायास झपक गईं।

वह जाने क्यों एक कदम पीछे हट गई।

अर्जुन 🖤 फिर थोड़ा और करीब आया...

और सिया 🌸 फिर पीछे।

यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक उसकी पीठ पीछे की दीवार से नहीं लग गई।

कमरे में अजीब-सी खामोशी थी। 🤍

बाहर चलती हवा की सरसराहट भी मानो थम गई थी।

दोनों की धड़कनों की आवाज़ जैसे उस सन्नाटे में साफ़ सुनाई दे रही थी। 💓

सिया 🌸 की साँसें तेज़ हो चुकी थीं।

उसे लगा जैसे पूरे कमरे की हवा अचानक गर्म हो गई हो।

दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं उसकी धड़कनों की आवाज़ अर्जुन 🖤 तक न पहुँच जाए।

उसने नज़रें उठाईं...

और पाया कि अर्जुन 🖤 अब भी बस उसे ही देख रहा था। 👀

उसकी आँखों में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी...

न कोई अधिकार...

सिर्फ़ एक अनकही मोहब्बत... ❤️‍🩹

और बरसों की थकान के बाद मिला सुकून। ✨

अर्जुन 🖤 की नज़र अचानक सिया 🌸 के जुड़े में अटक गई।

एक छोटी-सी गुलमोहर 🌺 की सूखी पंखुड़ी उसके बालों में उलझ गई थी।

वह बहुत धीरे से उसके और करीब आया।

सिया 🌸 की साँस जैसे एक पल को थम गई।

अर्जुन 🖤 ने बेहद नर्मी से वह पंखुड़ी उसके बालों से निकाल दी।

उसकी उँगलियाँ बस एक क्षण के लिए उसके बालों को छूकर पीछे हट गईं...

जैसे उसने खुद को याद दिलाया हो कि कुछ सीमाएँ कभी पार नहीं करनी चाहिए। 🤍

उसने हल्की-सी मुस्कान 😊 के साथ धीमे स्वर में कहा—

"क्या सोच रही थीं... राजकुमारी?" 👑

सिया 🌸 की आँखें बड़ी हो गईं।

उसे सचमुच लगा था कि अर्जुन 🖤...

वह सोचकर ही उसका चेहरा शर्म से गुलाबी हो गया। 🌷

उसने जल्दी से नज़रें झुका लीं।

"म... मैं... वो... कुछ नहीं..." 🫣

उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई।

शब्द साथ छोड़ चुके थे।

अचानक जैसे उसे होश आया।

उसने हल्के से अर्जुन 🖤 को पीछे किया और तेज़ कदमों से कमरे से बाहर निकल गई।

उसकी चाल तेज़ थी...

लेकिन दिल उससे भी तेज़ भाग रहा था। 💗

"ये... ये मुझे क्या हो रहा है?" 🥺

उसने हॉल में रुककर अपने सीने पर हाथ रखा।

गाल अब भी तप रहे थे।

होंठों पर अनजानी-सी मुस्कान थी... 😊

जिसे वह लाख कोशिश करके भी छिपा नहीं पा रही थी।

🤍🤍🤍

और अर्जुन 🖤...

वह वहीं खड़ा रह गया।

उसकी नज़रें दरवाज़े पर टिकी थीं, जहाँ से सिया 🌸 अभी-अभी गई थी।

उसके होंठों पर अनायास एक सच्ची मुस्कान आ गई। 💙

शायद पहली बार...

उसे लगा कि उसकी ज़िंदगी की तमाम लड़ाइयों के बीच भी कोई ऐसा है...

जिसकी एक मुस्कान उसके भीतर के हर तूफ़ान को शांत कर सकती है। 🍂

उसी पल उसके मन में एक ही शब्द गूँजा—

"गुलमोहर..." 🌺

उसने बहुत धीमे से मुस्कुराकर खुद से कहा—

"तुम्हारी मुस्कान... सचमुच मेरे हर अँधेरे की रोशनी है।" ❤️

🤍🤍🤍

"के... क्या ये... फिर से कोई सपना है?" 😶

सिया 🌸 ने खुद से बुदबुदाते हुए कहा।

तभी सामने से रोशनी ✨ आती दिखाई दी।

"क्या हुआ दीदी?"

"रोशनी..."

"तू... मुझे चिमटी काट।"

"क्या... चिमटी?" 😅

"हाँ, जल्दी!"

रोशनी ✨ ने हैरानी से उसके माथे पर हाथ रखा।

"दीदी, आप ठीक तो हैं? बुखार भी नहीं है..."

"जो कहा है वो कर।"

इस बार सिया 🌸 ने झुंझलाकर कहा।

रोशनी ✨ ने धीरे से उसकी बाँह पर चिमटी काटी।

"आह..." 😣

सिया 🌸 को दर्द हुआ।

उसकी आँखें फैल गईं।

"तो... ये सब सच था..." 😳

वह धीरे-से बुदबुदाई।

रोशनी ✨ अब और भी परेशान हो गई।

"दीदी... मुझे लगता है अर्जुन भैया 🖤 को बुलाना पड़ेगा।"

"नहीं...!" 😳

सिया 🌸 लगभग चीख पड़ी।

रोशनी ✨ चौंककर उसे देखने लगी।

उसी समय...

पीछे से एक गंभीर, परिचित मर्दाना आवाज़ गूँजी—

"क्या हुआ?" 🔥

सिया 🌸 का दिल जैसे एक पल को रुक गया। 💓

उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा...

और सामने खड़े इंसान को देखते ही उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। 👀

उसके होंठों से अनायास निकला—

"...आप?" 😲🔥

जारी रहेगा...
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आपकी एक छोटी-सी ⭐ रेटिंग मेरे लिए बहुत मायने रखती है। यही आपका प्यार और सहयोग मुझे हर हफ्ते आपके लिए नए अध्याय लिखने की प्रेरणा देता है। 🌸💗

मिलते हैं अगले अध्याय में... ❤️✨

आपकी अपनी,
Diksha ✍️🌷