Paths - 8 in Hindi Human Science by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 8

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राहें - 8

नमक हराम

संध्या का समय, झीने धुंधलके के कारण वातावरण धूमिल था। देखते ही देखते सड़क पर तीव्र गति से आता ट्रक दाई ओर एक पेड़ से टकराकर गिर गया, एक चीख वातावरण में गुंज गई। बाई ओर की खिड़की से ट्रक मालिक राधे सड़क पर कूद पड़ा और सहयात्री दाई ओर से जोर से चिल्लाया, ,- मुझे बचाओ, निकालो मुझे, मुझे बचा ले राधे, मेरी बेटी की सुबह बारात आने वाली है, कल शादी है उसकी।  
राधे के होठों पर घबराहट न आकर एक कुटिल मुस्कान आ गई, वह अपने चिल्लाते मित्र की ओर घूरे जा रहा था उसकी तीक्षण बुद्वि ने एक्सीडेंट के फौरन बाद ही बड़ी गहराई से सोचकर योजना बना डाली थी। धीरे- धीरे चिल्लाहट कम होती गई। राधे धीरे-धीरे मित्र की दिशा में आगे बढ़ा और अपने हाथो से उसे उठाने का प्रयत्न भी किया परन्तु उसे निकाल पाने में अपनी असमर्थता समझकर वह रूक गया और मित्र एक दर्दनाक चीख के बाद सहयात्री बेहोश हो गया था, शायद खीचने में उसका पैर कहीं जोर से दब गया था।  
राधे ने उसकी जेबें टटोली। इधर उधर देखा, कोई भी दिखायी नहीं दिया। फिर नये हरे-हरे नोटों की गड़िड्यां झट से अपनी जेब के हवाले कर ली। उसे पहले से ही मालूम था कि उसका मित्र पूरे दस लाख रूपये बैंक से निकाल कर शहर अपनी बेटी की शादी में व्यय करने हेतु लिये जा रहा है। अन्धेरा गहरा हो गया। सायं साय करती तेज हवा चल रही थी। कभी-कभी पत्तों की सरसराहट होती। उसने सड़क पर दोनों ओर दृष्टि दौड़ाई दूर कोई साईकिल से आता हुआ दिखायी पड़ा। कुछ आशा बंधी। अपने परिचित महावीर को देखकर वह आश्वस्त हआ, ईश्वर को शुक्रया दिया, जो उसने सहायता के लिये दूसरा इन्सान इतनी देरी के बाद ठीक समय पर भेजा।  
चेहरे पर चरम विषाद का भाव धारण करके बड़े दुखित स्वर में राधे ने पुकारा "महावीर"। महाबीर ने पूंछा -"क्यों क्या हुआ?" राधे बोला -ट्रक एक्सीडेंट हो गया है, प्रिंसिपल को निकालो। मैने निकालने की बहुत कोशिश की परन्तु निकाल नही सका । हड़बड़ाया सा महावीर कभी ट्रक को देखता तो कभी राधे को जिसे खरोंच भी न आई थी और कभी बेहोश प्रिंसिपल के चेहरे को, जिस दिशा में वह खड़ा था उधर से उसे प्रिंसिपल का चेहरा ही दिखायी दे रहा था। दोनों ने मिलकर प्रिंसिपल को निकालना प्रारंभ किया उनकी टांगे कहीं बुरी तरह फंस गयी थी जोर से खींचने पर टांगों की हड़िड्यां टूट गई। उन्होने उन्हे निकाल कर एक पेड़ के नीचे जमीन पर लिटा दिया।  
सौभाग्य से बस जाने का समय हो गया था। महावीर के संरक्षण में प्रिंसिपल के बेहोश शरीर को छोड़कर राधे ने आती हुई बस को रूकवाया और उसमें बैठ गया। कस्बे के अस्पताल में उसने सरकारी एम्बुलेंस मांगी परन्तु डाक्टर के यह कहने पर कि एम्बुलेंस हम तभी देते है जब पेशेन्ट हमारे हास्पिटल में लाया जाये, वह परेशान हो गया छोटे से कस्बे मे टैक्सी भी तो नही मिलती जो किराये पर लेकर वह प्रिंसिपल को रामपुरा वापस ले जाये। यहाँ तो वह किसी भी कीमत पर उन्हें ला नही सकता। दूसरा कस्बा यहां डाक्टर नया, पुलिस वाले नये फिर उसके पास लाइसेंस भी तो नही है ट्रक ड्राइविंग का और ट्रक तो वही चला रहा था यहां लाकर तो वह स्वयं बुरी तरह फंस जायेगा। 
यकायक उसे ख्याल आया यहां उसके एक मित्र के पास भी तो ट्रक है चलकर उसी से बात की जाये। दौड़ा दौड़ा वह अपने उस मित्र के घर जा पहुंचा। 
वहां से ट्रक लेकर वह महावीर व प्रिंसिपल को लेता हुआ वापस रामपुरा आ गया। रात के बारह बजे ही उसने रामपुरा के अस्पताल में प्रिंसिपल को भरती करवा दिया।  
घर आकर वह तकिये के सहारे पलंग पर लेट गया उसे नींद नही आई, सिगरेट जलाकर कस खींचते हए उसने अपने उन्मीलित नेत्रों से छत की ओर देखा, किन्ही विचारों में खो गया वह।--- प्रिंसिपल की पत्नी के उपर प्रभाव जमाने का अच्छा मौका हाथ लगा है, उसके पति को अस्पताल में भती कराया --- उसकी बीमारी का खर्चे स्वयं उठाया ,कितना एहसान मानेगी वह। बारात के बिदा होते ही वह इधर ही आयेगी सबसे पहले लाचार मुरझाये चेहरे से मुझसे मिलेगी मेरे सामने सिसकियां लेकर रोयेगी,--- गिड़गिड़ायेगी। जैसे ही वह अपने पास पैसे की कमी की बात कहेगी मै इत्मीनान से कहूँगा --पैसे के लिये क्यों परेशान होती हो भाभी, मैं तो सदैव हाजिर हूँ आपकी सेवा में, ---यदि वह दो सौ रूपये मांगेगी तो मैं चार सौ दूंगा --- एक कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पर थिरक गई। रूंधे कंठ से एहसान को जीवन भर न भूलने का वचन देगी फिर कभी अवसर हाथ लगा तो---- मन ही मन सिहर उठा वह एक सुखद स्वप्न--- उसकी आंखों के सामने नाचने लगा किसी सुनहरी कल्पना से उसका पापी मन पुलक उठा ,---। तीन बच्चों की मां है तो क्या हुआ। बड़ी लड़की सोलह वर्ष की है, कोई कह ही नही सकता उसकी बेटी होगी। मां बेटी -- छोटी बडी बहने लगती है। कैसा भरा भरा शरीर है,--- सुडौल आकर्षक गोलाइयां, ----मन में कुछ और ही कौध गया उसके। सब कुछ सोच कर उसकी अंखों में चमक आ गयी। वह सोचता ---प्रिंसिपल की पत्नी एवं बच्चों के साथ वह कुछ खर्च भी कर देगा जिससे सब उसकी प्रशंसा करेंगे। करना तो उसे अपने पास से कुछ भी नही है ---इन्ही दस लाख में से तीन चार हजार खर्च कर यश पालेगा, एवं उसकी प्रतिष्ठा में चार चांद लग जायेंगे--- वह इन रूपयों का तकादा भी नही करेगा। परन्तु ऐसा सोचते समय राधे यह बिल्कुल भूल गया कि प्रिंसिपल साहब व उनकी पत्नी ने उसकी कितनी सहायता की है उसकी आज की सुदुढ़ स्थिति के आधार पर वे ही है। जब उसके बड़े भाई ने "पड़े-पड़े खाते हो निकल जाओ घर से" कहकर उसे घर से निकाल दिया था तो प्रिंसिपल ने ही उसे अपने घर रखकर पूरे छ: महीने खाना खिलाया था उसे अपनी खुद की दुकान चलाने के लिये चार लाख रूपये दिये थे जिसे उसने धीरे धीरे किस्तों मे तीन वर्षों में चुकाया था।  
ऐसी खबरे जल्दी ही फैल जाया करती है। छोटी सी बस्ती और बाजार में फैल भी गयी। सुबह तड़के ही राधे ने पुलिस द्वारा अपने ड्राइवर को गिरफ्तार करवा दिया। पुलिस वाले तो पहले से पटे पटाये थे। सुबह सात बजे रामपुरा के सम्पन्न प्रतिष्ठित व्योवृद्ध रणधीर राधे से मिलने उसके घर जा पहुंचे। प्रिंसिपल की गंभीर हालत के विषय में सभी एकमत थे उनका शरीर जीवन की घड़िया गिन रहा था, यही विवार रणधीर का भी था, उन्होंने उसे समझाया तेरे हाथं से एक्सीडेंट हुआ है। तृू अभी शहर चला जा और उसकी लड़की का कन्यादान अपने हाथों से कर दे। तेरे चले जाने से उनकी पत्नी को थोड़ा संतोष रहेगा। राधे बोला --यहां भी तो प्रिंसिपल की देखरेख को आदमी चाहिये। रणधीर सुलझे हुए प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं बोले--"यहां तो हम् लोग सम्हाल लेंगे। तू अपने हाथो लड़की को विदा करके उसके पिता की अनुपस्थिति में पिता का फर्ज पूरा कर दे।  
राधे टस से मस नहीं हुआ, भयानक कुटिलता एवं क्रूरता छा गई उसके अन्तर्मन पर। वहां जाकर वह लडकी को क्या क्या उत्तर देगा ? यहां जो आयेंगे उन्हें वह दिखा देगा कि वह कितनी तत्परता से प्रिंसिपल की देखभाल कर रहा है अपने अभिन्न मित्र के लिये पैसा पानी की तरह बहा रहा है। प्रिंसिपल की मृत्यु परान्त उनकी पत्नी और बच्चे आये। राधे की कल्पनाओं के विपरीत वे उस से मिले भी नहीं ,वही गया उनसे मिलने, उसके सामने न कोई गिड़गिड़ाया और न किसी ने उसकी प्रशंसा में एक शब्द कहा, एक चुप्पी छाई रही उस समय घर में।  
वह कुढ़ गया उसका दंभी मन सोचता रहा ---लगता ही नही इस घर में मौत हुई है। कोई भी तो सहायता हेतु उससे कुछ याचना नही करता ---। मत करने दो, कितने दिन चलेगी प्रेंसिपल की कमाई।--- फिर जब खाने के लाले पड़ेंगे तो सब उसी के पास दौड़े आयेंगे।  
तेरह दिन तक शोक मनाने के बाद प्रिंसिपल की पत्नी पहली बार रणधीर के घर पहुंची उनकी प्रतिष्ठा एवं न्यायिक बातचीत से उन्हे विश्वास था कि वे राधे व उनके बीच कोई आपसी समझौता करा देंगे तो कोर्ट कचहरी करने की झंझट समाप्त।  
रणधीर ने राधे को बुलाया उनके घर पहुंचते ही रणधीर ने कहा "तुम्हारे हाथो हुयी अपने पति की मृत्यु के फलस्वरूप यह तुमसे कुछ हरजाना चाह रही है। एक क्षण के लिये उसकी इच्छा हुई कि दोनो की गर्दन मरोड़ दे--- फिर दूसरे ही क्षण उसकी आंखो में चमक आ गई।  
पत्नी ने पति के मृत्यु के फलस्वरूप पचास लाख रुपए मांगे ,चालीस, पैंतीस, तीस और फिर पच्चीस पर आकर रूक गई वे। और राधे तीन - चार, पांच छः बहुत मुश्किल से सात लाख पर रूक गया। एक पैसा भी अधिक देना स्वीकार नही किया उसने। रणधीर की स्थिति विचित्र थी कैसे वे प्रिंसिपल की पत्नी को बोल दे कि वे सात लाख लेकर संतोष कर लें। आखिर किसी विश्वास के सहारे ही तो उनके घर आई और पंचायत ने उन्हे प्रमुख बनाया था। कैसे वे न्याय से डिग जायें सब कुछ जानते बूझते, उसे भी तो मालूम है कि उस दिन जाते समय प्रिंसिपल ने बैंक से दस लाख ड्रा किये थे।  
राधे को तो विश्वास था कि यदि वह एक कौड़ी भी न दे तो एक विधवा उसका क्या कर लेगी ?  
X ४ X  
प्रिंसिपल की पत्नी केस लड़ती रही। साल भर बाद राधे के उपर एक करोड़ की ड़िग्री आ गई। तब उसे लगा सबने मिलकर षडयन्त्र रचा है। उसका चेहरा लाल हो गया और बदन थर थर कांपने लगा।-- कितना नपुंसक है उसका क्रोध - --कितना प्रभावहीन है उसका व्यवहारिक ज्ञान!  

डॉ श्रीमति शिरोमणि माथुर
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