दोषी कौन?
पंकज की शादी में उसके बड़े भाई सौरभ के मित्र राजीव की
मम्मी शोभा शादी से एक सप्ताह पूर्व ही आ गई थी। शादी के प्रत्येक
काम में शोभा, ममता (पंकज की मम्मी) का हाथ बटाती थी। उनकी
कोशिश रहती कि वे अधिक से अधिक काम करके ममता की
सहानुभूति प्राप्त करलें, शादी के बाद विदाई के समय ममता ने उन्हें
बहुत से उपहार, साड़ियाँ व मिठाईयाँ देकर उनके प्रति अपने प्रेम व
सहानुभूति को प्रकट किया।
चलते-चलते शोभा ने ममता से कहा - "आप मुझे 20 हजार
रूपये दे दीजिये ताकि मैं उन पैसों से अपना बड़ी, पापड, अचार व
मसाले बनाने का काम ठीक से कर सकूं और इस बार आपको यह
पैसे वापस लेने ही होंगें ।"
ममता ने पूछा - "क्यों क्या बात है?
शोभा ने कहा - "आप कभी भी पैसे वापस नहीं लेतीं इस तरह
मुझे भी शर्म आती है, आप पैसे वापस नहीं लेती तो हम भी लापरवाह
हो जाते हैं ।'
ममता ने कहा - "बहनों में कोई हिसाब किताब होता है क्या? मैं तो
आपको सदैव से अपनी बहन मानकर व्यव्हार करती हूँ, इसलिये कभी
कोई हिसाब ही नही रखती। ममता जान रही थी- शोभा पैसा वापस
नहीं कर पायेगी, पहले भी वह कई बार शोभा की आर्थिक मदद कर
चुकी हैं, ना तो शोभा देने की स्थिति में होती, ना ममता की आत्मा
उससे पैसे वापस लेने की आज्ञा देती हैं- शोभा की विवशता व
लाचारी देखकर ममता का मन दया से भर जाता है।
पंकज की शादी में भी सौरभ का दोस्त राजीव नहीं आया, वह
कलकते में है, राजीव की माँ शोभा ही आई है।ममता
को शोभा का पिछला जीवन याद हो आया कि राजीव के
पिता गौतम राय भिलाई स्टील प्लांट में बड़े अधिकारी थे। बड़े
समझदार व अनुशासन प्रिय अफसर रहें हैं, अपनी हर ड्यूटी के प्रति
ईमानदार ,व्यवहार कुशल व्यक्ति थे। राजीव उनका इकलौता व बहुत
खूबसूरत बेटा हैं, दो बेटियाँ और राजीव को मिलाकर तीन बच्चों में
राजीव ज्यादा चंचल व आकर्षक था। बड़े प्यार से उन्होनें बच्चों को
पाला था। घर में कोई कमी नहीं थी। बच्चों को हर शौक पूरा करते थे। राजीव सबसे छोटा और चंचल था तो उसके प्रति
सबका ध्यान ज्यादा ही रहता था, उसकी हर जिद पूरी होती थी।
प्यार से सब उसे राजू कहकर बुलाते थे।
राजीव और सौरभ साथ-साथ पढ़ते थे। पढ़ते-पढ़ते दोनों में
घनिष्टता बढ़ती गई, और धीरे- धीरे दोनों मित्रों की घनिष्ठता से
सौरभ व राजीव की माताओं में भी घनिष्टता बढ़ी और वह घनिष्टता
बहन-बहन के रिश्तो में बदल गई।
अनुशासन प्रिय गौतम राय का बच्चों पर भी पूरा अनुशासन था।
समय पर घर आना, स्कूल जाना, होमवर्क पूरा करना सब उनकी
नजर में रहता था। राजीव शुरू से ही शोभा का लाडला था। बड़े
होने पर पिता के डर से वह रात को आठ बजे तक घर आ जाता
परन्तु बाहर घूमने की उसकी आदत के कारण वह माँ को कई बहाने
बनाता। कभी किसी दोस्त का जन्मदिन, कभी किसी दोस्त के भाई
का जन्मदिन या किसी दोस्त की शादी के नाम पर वह घर के पिछले
दरवाजे से निकल जाता और पिछले दरवाजे की एक चाबी उसी के
पास रहती थी वो अपने हिसाब आता
जाता रहता था. पिता दिन भर अपने आफिस व कार्यस्थल
पर व्यस्त रहते। रात में थककर सो जाते। राजीव की इन हरकतों
की जानकारी उन तक कौन पहुँचाता? बड़े साहब का बेटा है तो कुछ
बातें तो वैसे भी कोई नहीं बोलता, दबी जबान से उन्हें कुछ हल्का सा
आभास भी हुआ ,तो रात 7 और 8 बजे राजीव को घर में देखकर वे
राजीव की ओर से आश्वस्त रहते । माँ का समर्थन सदैव राजीव के
साथ था। गौतम राय के रिटायरमेंट पर मिलने वाली बड़ी धन राशि
पर माँ बेटे बैठकर बड़ी- बड़ी योजनायें बनाते थे।
राजीव का मन पढ़ाई लिखाई में नही लगता था। परिवार के
दबाव के कारण जैसे तैसे वो बी.ए. पास कर पाया।इधर जैसे-जैसे गौतम
राय की आयु बढ़ती जा रही थी ,उन्हें अपने परिवार की चिंता सताये
जा रही थी। उन्होनें बड़ी बेटी रेणु की शादी अच्छा लड़का देखकर
कर दी। राजीव के प्रति वे ज्यादा चिंतित रहते थे। पत्नी व बेटे की
सलाह पर उन्होनें राजीव को कपड़े की दूकान खुलवा दी। राजीव
को व्यापारिक कार्यों का अनुभव नहीं था। पिता के आग्रह व दोस्तों
की सलाह पर उसने कपड़े की दुकान खोल तो ली परन्तु अनुभव ना
होने के कारण दुकान सम्हालना उसे कठिन हो रहा था। गौतम राय
भी उसे समझाते- "धीरे -धीरे काम करोगे तो अनुभव होगा और काम ठीक से चलेगा.
उन्होनें सदैव उसे प्रोत्साहित किया । वे सोचते कि रिटायरमेंट के बाद यह दुकान
उनके भी बैठने की जगह बनेगी । राजीव की दुकान कुछ दिन तो चली। धीरे-धीरे राजीव की
लापरवाही व उधारी सामान देने और पैसे की वसूली ना होने पर
उसने घर में पैसे की और मॉग की। उसी समय गौतम राय रिटायर हो
चुके थे, रिटायरमेंट के बाद उन्हें एक मोटी राशि भिलाई- स्टील - प्लांट
से मिली थी इसलिये उन्होनें उसे दुबारा दुकान जमाने का अवसर भी
दिया।
रिटायरमेंट के पहले से ही उन्हानें भिलाई में प्लाट लेकर एक
मकान बनवाना शुरू कर दिया था। रिटायरमेंट तक उन्होनें एक
आलीशान बंगला अपने व परिवार के रहने के लिये बना लिया था।
गौतम राय परिवार सहित उस घर मे आंनदपूर्वक रहते थे।
इसी बीच गौतम साहब ने राजीव की शादी प्रियंका से और
छोटी बेटी लेखा की शादी भी बड़ी धुम-धाम से कर दी ,इन दोनों
शादियों में काफी खर्चा हो गया। बहू प्रारम्भ में तो कुछ दिन ठीक
से रही। धीरे -धीरे उसकी असलियत सामने आने लगी वो मनमानी करती थी । अब वह एक बच्चे की माँ बन गई थी, फिर भी
उसे इस परिवार से लगाव नहीं था। सदैव घूमना, फैशन करने व
किटी पार्टियों व क्लबों में घूमना उसे अच्छा लगता था। बच्ची को
सासू शोभा के सहारे छोड़कर वह देर रात तक पार्टियों में घूमती
रहती।
एक दिन प्रियंका काफी रात को घर आई उसकी बच्ची की
तबियत ठीक नहीं थी। शोभा बच्ची को सम्हालते-सम्हालते थक गई
थी- बह प्रियंका के देर से आने पर शोभा ने कहा -"थोडा जल्दी
आ जाया करो, मुझसे बच्ची नहीं सम्हलती।
प्रियंका बोली- "जब पार्टी खत्म होगी तभी तो आऊंगी।" पहले
कैसे आऊंगी? रोज-रोज जल्दी आने के लिये कहती हो।
शोभा ने कहा- "तो तुम बच्ची को साथ में ले जाया करो।"
प्रियंका तमककर बोली- "वैसे तो दिन भर कहती हो बच्ची मेरी
है, मेरी है, अब पार्टी में बच्ची को ले जाने कह रही हो । मै उसे लेकर
कैसे पार्टी में जाऊंगी? तुम्हारी बच्ची है, तुम्हीं सम्हालों, मैं क्या
मायके से बच्ची लायी हूँ जो मैं उसे सम्हालूं?" शोभा को प्रियंका का
यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा वह बर-बार घर का वातावरण, ठीक
रखने की कोशिश करती पर प्रियंका की मनमानी व बच्ची के प्रति
लापरवाही से वह खिन्न भी थी, प्रियंका स्वछन्द महिला थी, उसे घर,
परिवार, बच्ची व टोका टाकी अच्छी नही लगती थी, इस कारण घर
का वातावरण तनाव पूर्ण रहता था।
इसके बाद से ना तो प्रियंका ने बच्ची सम्हाली और ना पार्टियों
में जाना बंद किया। एक दिन बच्वी को सास के पास छोड़कर पूरे
आभूषण लेकर वह अपने मायके चली गई और फिर कभी लौट कर
नही आई। उसको मायके से यहाँ लाने के बहुत प्रयास किये गये
परन्तु सब व्यर्थ,
अनुभवहीन राजीव की दुकान ठीक से नहीं चल पा रही थी।
पुरानी उधारी वसूल नहीं हो पा रही थी और राजीव पुरानी वसूली के
चक्कर में ग्राहकों को और कपड़े उधारी में दे देता था। इस तरह पैसे के लिए
पिता पुत्र में कई बार विवाद भी हो चुका था। पत्नी के चले जाने
और दुकान में प्रतिवर्ष घाटे के कारण राजीव परेशान रहने लगा और
दोस्तों के साथ शराब पीने लगा, प्रतिवर्ष घाटे के कारण उसे दुकान
भी बंद करनी पड़ी।
गौतम राय की जिम्मेदारियों बढ़ती जा रही थी। बेटी लेखा की
शादी में उन पर कुछ कर्जा हो गया था। धीरे - धीरे कर्जा (मूल और
व्याज) बढ़ता गया, दुकान ना चलने के कारण आमदनी नही थी।
साहूकार जब तब आकर तगादा करते और गौतम साहब को
अपमानित करते, इस कारण गौतम साहब भी दुखी रहने लगे और
अब उनकी तबियत भी खराब रहने लगी। घर के खर्चे, बीमारी के
खर्चे और गुह क्लेश से भी राजीव ने कुछ भी नही सीखा, वह अपनी
मनमानी करता व माता पिता को जली कटी सुनाता। आखिर दुखी
होकर गौतम साहब ने अपना आलीशान बंगला बेच दिया और
साहूकार का करजा उतारा।
मकान बेचने से जो पैसा मिला, उससे साहूकार का करजा पटाने
के बाद बचे पैसों से राजीव ने होटल खोल लिया। राजीव के साथ-
साथ बूढ़े गौतम साहब व शोभा भी काम करते थे। शोभा छोटी बच्ची
निन्नी की देखभाल करती, घर व होटल का भी काम करती ,कभी कभी
वह बहुत परेशान हो जाती थी। राजीव निन्नी के प्रति अपनी कोई भी
जिम्मेदारी नही समझता था, कभी- -कभी बड़ी बहन रेणु आती और
भाई राजीव से कहती "माँ को दिन भर काम हो जाता है तू शादी
करले।"
तो राजीव कहता -- मैं भी तो दिन भर काम करता हूँ तो कभी
कुछ नही कहेगी, यह दीदी भी मम्मी को भड़काने आती है। मम्मी
काम करती है तो कोई एहसान है, , सब खाते हैं तो काम भी सब
करेंगें।
इसी बीच राजीव की दोस्ती चित्रा नामक एक नर्तकी (डांसर)
से हो गई और दोनों की मित्रता शादी में परिवर्तित हो गई। शादी हो
जाने पर राजीव का ध्यान फिर से पार्टियों की ओर जाने लगा। चित्रा
पार्टियों व अन्य कार्यक्रमों में नृत्य करती थी, इसलिये उसकी
दिनचर्या उसी तरह रहने लगी। घर के कामों में उसकी रूचि नहीं
थी। राजीव उसी के चक्कर में भिलाई में माता पिता व निन्नी को
छोड़कर कलकत्ता चला गया और वहीं चित्रा के साथ नृत्य कार्यक्रमों
में सहयोग देता रहता।
बूढ़े माता पिता निन्नी को सम्हालते व होटल चलाते थे, किसी
तरह अपना गुजारा करते थे। रेणु ने कई बार राजीव को मॉँ पापा की
देखभाल करने के लिये कहा तो राजीव का कहना था कि "थोड़ा हम
लोगों को सेट हो जाने दो तो मै माँ पापा को अपने साथ कलकत्ता
ले जाऊगा।
रेणु बार बार बीमार पिता का हवाला देती कि पिताजी बीमार
रहने लगे हैं, उनसे होटल का काम नहीं होता परन्तु राजीव हर बार
टाल देता। एक दिन गुस्सा में भर कर उसने रेणु से कह दिया
"प्रियंका मॉँ की टोका टाकी के कारण चली गई, अब आप लोग मुझे
यहाँ भी रहने नहीं देते हो- मेरी भी अपनी जिन्दगी है, क्या सदैव माँ
पापा को ढोता रहूंगा?
आखिरकार रेणू से बीमार पिता, बुढ़ी माँ की हालत नहीं देखी
गई, वह अपने घर माँ पिता व निन्नी को ले आयी और होटल बंद कर
दिया। पिता की मृत्यु पर राजीव भिलाई आये और निन्नी को लेकर
वापस कलकत्ता चले गये। रेणू के कुछ कहने पर राजीव का कहना
था "अभी बच्ची को ले जाता हूँ , माँ को थोड़े दिन यहीं रहने दो।"
कलकत्ता जाकर राजीव ने कभी भी माँ की सुध नही ली।
राजीव ने निन्नी को ले जाकर कलकत्ते में अपने निसंतान मित्र
निशांत को दे दिया और निशांत बच्ची का लालन पालन करने लगा।
मंहगाई के जमाने में सभी को परिवार चलाने में समस्यायें आती
हैं। महंगाई ही नही ,आजकल की जीवन पद्धति बच्चों के शौक व
महत्वाकांक्षायें सभी तो सामने आती है, रेणु के पति पलाश के मम्मी
पापा भी है, जिनकी जिम्मेदारी पलाश व रेणू पर है। रेणू स्वयं भी दो
बच्चों की माँ है। फिर भी वे लोग शोभा की देखभाल करते थे। छोटी
बेटी लेखा ने राजीव के गलत रहन सहन व व्यौहार के कारण माता,
पिता, भाई, बहन सबसे रिश्ते तोड़ लिये थे।
शोभा रेणू के घर में रहती थी। खाना तो वह रेणू के घर में
खाती थी परन्तु दामाद पलाश से उसको संकोच लगता था। अपने
अन्य खचों के लिये वे किसी को कुछ कह नही पाती थी। ममता
शोभा की इस स्थिति को समझती थी, इसीलिये वह समय समय पर
शोभा को आर्थिक मदद करती थी।
ममता जानती थी कि शोभा स्वयं के खर्चे के लिये परेशान है,
तो वह ममता से लिये हुये पैसे कहाँ से लौटाती ? इसलिये ममता पैसे
लेने से स्वयं ही मना कर देती थी। कई बार ममता को शोभा पर बहुत
दया आती थी। वो सोचती जिन्दगी क्या क्या दिन दिखाती है, शोभा कभी
बड़े ठाट बाट से रहती थी,बड़ा सा बंगला था। नौकर उसके घर में
काम करते थे। आज बुढ़ापे में एक एक रूपये के लिये संघर्ष करते हैँ।
जबकि शोभा और गौतम दोनो ही बड़े सज्जन व्यक्ति रहे हैं।
दामाद व बच्चों के व्यवहार से कभी - कभी शोभा स्वयं को
उपेक्षित महसूस करती थी परन्तु कुछ कह नही पाती थी। रेणू का
परिवार भी उनकी उपेक्षा नही करते थे, परन्तु शोभा अपने मन में हीन भावना
पाले रहती थी। इसलिये उस के मन में स्वयं का छोटा मोटा
काम करने का विचार आया तो उसने ममता से 20 हजार रूपये
लेकर बड़ी पापड व अचार मसालों का काम करने की सोची थी।
ममता जानती है, बड़ी पापड़ बनाकर उन्हें बेचना भी एक समस्या है,
कौन खरीदेगा इनसे यह सामान? बाजार में बड़े बड़े मॉल व शोरूम
हैं व आकर्षक पैकिंग के सामने शोभा का बनाया सामान कहाँ
टिकेगा? इतनी मेहनत बूढ़ी शोभा कहा कर पायेगी? परन्तु फिर भी
उन्होनें शोभा को पैसे देकर शोभा का मनोबल बढ़ाया, वह अच्छी
तरह जानती हैं शोभा ये पैसे भी वापस नहीं दे पायेगी।
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
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