Paths - 5 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 5

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राहें - 5

अकेलापन

भरी दोपहरी में भी सड़क सूनसान, चारों ओर सन्नाटा और
पुलिस वालों की मात्र पहरेदारी थी। अन्नू अपने 7 वर्षीय बच्चे को
स्कूटी में बैठाकर हास्पीटल जाने के लिये घर से निकली। स्कूल,
कालेज सब बंद है, घर काम वाली महिला कर्मचारियां भी नही आ
रही हैं, इसलिये बच्चे अतुल को अस्पताल ले जाना पड़ता है। घर में
छोटे बच्चे को छोड़े भी तो किसकी देखरेख में छोड़े अन्नू ने अपनी
चुन्नी सिर में बॉँधी और स्कूटी से वह अस्पताल पहुँच गई । अस्पताल
में इन दिनों ज्यादा भीड़ थी,सब अपने अपने मरीज के उपचार हेतु
दौड़ भाग कर रहे थे। कोई अपने मरीज के ठीक होने के लिये अपने
अपने ईष्ट से प्रार्थना भी कर रहे थे, तो कोई उचित देखभाल के लिये
प्रयास कर रहे थे। अन्नू भी सबसे बचती हुयी अतुल का हाथ पकड़े
ससुर के रूम में गई- ससुर शेखर गुप्ता करोना से पीड़ित होकर
कई दिनों से यहाँ भर्ती हैं ।
अन्नू ने दूर से ही उनसे पूछा- पापा आप कैसे हैं?
मैं ठीक हँ - पापा ने कहा ।
अन्नू ने फिर पूछा - कुछ चीज की जरूरत हो तो ला दूँ।
आपने खाना खाया कि नहीं?
हॉ बेटी मैं खाना खा चुका हूँ, भूख नहीं लगती है, खाना खाया
ही नहीं जाता है, शेखर ने ऑखों को सजल करते हुये बड़ी दीनता
से कहा फिर बोले - तुम सब कैसे हो?
अन्नू बोली - हम सब ठीक हैं, उसने नही बताया कि इसी
अस्पताल में सासु माँ प्रभा और उसका पति आदित्य भी करोना
पॉजीटिव होने के कारण भर्ती हैं। ससूर के पीले पड़ते और निराशा
में डूबे चेहरे को देखकर वह यह नहीं बता पाई या उसने उन्हें बताना
उचित नहीं समझा। थोड़ी देर वह ससुर के पास खड़ी रही और
ईश्वर से उनके ठीक होने की प्रार्थना भी की।
उन्होनें अन्नू से कहा किे अस्पताल अतुल को मत लाया कर
अन्नू पापा को केसे बतायें, अतुल को अस्पताल में लाना मजबूरी
हैं, घर में कोई नहीं हैं जिसके पास वह बच्चे को छोड़ सके। महिला
वार्ड में जाकर अन्नू अपनी सासू मॉ प्रभादेवी से और दूसरे वार्ड में
जाकर पति आदित्य का हालचाल लेकर वह घर आ गई। रास्ते भर
में वह अस्पताल भर्ती मरीजों की स्थिति के बारे में सोचती रही।
वहीं उसने एक मरीज के शव को अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा ले
जाते हुए देखा। परिजन, मित्रजन कोई भी उसके साथ नहीं थे। एक
व्यक्ति दूर दूर से उस शव के पीछे चल रहा था। घर आने पर वह
दृश्य उसकी ऑखों के सामने घूमते रहे।
इतने बड़े घर में अन्नू बिल्कूल अकेली रात भर डरती रही, और
तरह तरह के विचार उसके मन में कौंधते रहे, वह रात भर सो नहीं
पाई। अनेंक कुशंकायें उसे घेरे थीं । आदित्य व प्रभादेवी को मालूम
था कि शेखर गुप्ता अस्पताल में भर्ती हैं, परन्तु शेखर गुप्ता को किसी
ने नहीं बताया था कि आदित्य व प्रभादेवी भी अस्पताल में भर्ती हैं।
शेखर की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी। इसलिये उन्हें
कुछ भी बताना ठीक नहीं था।
अन्नू अकेली घबराती रहती थी। बच्चा कभी कभी किसी बात
पर जिद करता तो वह उसे भी डॉट देती या फिर थप्पड मार देती
फिर रोते हुये अतुल को खुद ही बहलाती, अतुल कुछ भी नहीं
समझता था। स्कूल जाना नहीं था घर में पापा, दादा-दादी जिनके
साथ वह मस्ती करता था, कोई नहीं था आखिर वह भी दिन भर क्या
करे? दिन भर चिड़चिड़ाता रहता
इसी बीच अस्पताल से शेखर गुप्ता के खत्म होने की खबर
आई। अन्नू इस समाचार को सुनकर घबरा गई। पति व सास दोनो
क्वारेन्टाइन में अस्पताल में भर्ती हैं वह अकेले करें भी तो क्या करें?
उसने आदित्य को फोनकर बताया पापा तो खत्म हो गये हैं अब
मैं क्या करू?
आदित्य पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर घबरा गये और
पिता के अंतिम समय उनकी देखभाल ना कर पाने का मन में
अफसोस भी बहुत था। उनको समझ में कुछ नहीं आया। फिर कुछ
सोचकर बोले "मैं राजनांद्गॉँव में चाचा को फोन लगाता हूँ उनसे
बात करता हूँ क्या किया जाये ।" और आदित्य ने अपने चाचा केशव
शरण गुप्ता का फोन लगाकर सब स्थिति बतायी।
केशव शरण जी राजनांदगॉव से रायपूर आये अंतिम संस्कार
तो सरकारी प्रक्रिया के अनुसार होना था वैसा ही हुआ। चाचा के
पहुँच जाने से उन्होंने पारिवारिक रीति रिवाज का थोड़ा बहुत पालन
करते हुये अंतिम संस्कार भाग लिया। ना ढंग से अंतिम संस्कार
हुआ ना परिजन संस्कार में शामिल हो पाये। अन्नू घर में अकेली
रोती रही व घबराती रही उसे समझ नही आ रहा था कि वह क्या
करें?
शेखर गुप्ता के खत्म होने की खबर उनकी पत्नी को अस्पताल
से वापस आने के बाद दी गई । तेरहवीं में वो भी राजनांदगॉव केशव
(देवर) के घर बतौर मेहमान पहुँच पाई, करोना काल के कारण
यातायात साधन बसें व ट्रेने बंद थी। रिश्तेदार भी नहीं पहुँच पाये।
ना गरूड़पुराण हुआ ना ही ब्राम्हणों को नियमानुसार भोजन हो
पाया। सूखा भोजन व वस्त्र ब्राम्हणों के घर भिजवा दिया गया।
आदित्य को अस्पताल से छुट्टी नहीं मिली थी क्योंकि उनका
क्वैरन्टाइन समय पूरा नहीं हुआ था। वह मन ही मन छटपटाता रहा,
सोचता रहा, अंतिम समय ना तो वह पापा के दर्शन कर पा रहा है।
और ना ही पापा का अंतिम संस्कार कर पा रहा है, लोग इसी दिन
के लिये पुत्र को पालते पोसते व बच्चों की जिन्दगी भर सेवा करते
हैं परन्तु वह कुछ भी नहीं कर पाया। एक ग्लानि भाव मन में लिये
और रोता रहा। राजनॉदगॉव में पिता के अंतिम कार्यक्रमों के बाद
वह पहुँचा, चाचा के गले लगकर बहुत रोया, उसे अपने पर बार बार
ग्लानि हो रही थी।
                          *****

                                     डॉ. शिरोमणि माथुर 
                                     दल्ली राजहरा
   shriomanimathur@gmail.com 
9893742299