Paths - 10 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 10

Featured Books
Categories
Share

राहें - 10

जीवन की डगर
बादल गरज रहे थे, अंधेरा घिर आया था सतीश साहब घर के बरामदे में बैठे, बदले मौसम का आनन्द ले रहे थे।
तभी एक रिक्शा वाले ने सतीश गुप्ता से गिड़गिड़ाते हुये बोला- साहब मेरी बाई (पत्नी) अस्पताल में भरती है, मुझे कुछ पैसों की जरूरत है, मैं गरीब आदमी हूँ मेरी मदद करो, साहब बच्चा होने वाला है।
सतीश साहब ने उसे तीन हजार रूपये देते हुये कहा-इतने से काम चल जायेगा? और उन्होनें तीन हजार रूपये रिक्शे वाले को दे दिये।
सतीश गुप्ता का पुत्र अतुल-बड़े घृणित भाव से कभी पिता को देखता और कभी रिक्शे वाले को देखता रहा। दुआयें देते हुये रिक्शे वाला चला गया, उसके जाने के बाद, अतुल बोला- पापा आप इस आदमी को जानते हो?
सतीश गुप्ता बोले-इसे कई बार देखा है ये रिक्शा चलाता है पर इसका नाम नहीं जानता।
अतुल-पापा आप इस तरह कितना पैसा लुटाते हो? अभी कुछ दिन पहले ही सुनील की मम्मी को भी आपने सुनील की परीक्षा की फीस भरने के लिये पॉच हजार दिये थे इस तरह हम लोगों का घर कैसे चलेगा? और हम लोग सड़क पर आ जायेंगें।
सतीश बोले-बेटा गरीबों की मदद करनी चाहिये -
अतुल बोला-कोई गरीब नहीं है सब मजे में है, आप देते हो तो लोग आपको लूटने चले आते हैं, वह मन ही मन कुढ़ता रहा।
अतुल अन्दर कमरे में आकर कुर्सी पर बैठ गया पिता के अपव्यय पर कुढ़ता रहा, उसे लगता था, पापा उसके हिस्से का पैसा दूसरों पर लुटाते हैं और वह भी थोड़ी सी वाह वाही लूटने के लिये यह सब करते हैं, फिर वह अपनी पत्नी नेहा से बोला मैं तो पापा की लुटाने की आदत से परेशान हो गया हूँ, घर में ही भिखमंगो की कमी नही है फिर बाहर वालों पर भी दिन भर पैसे लुटाते हैं। चाचा ,चाची और उनके बच्चों का पूरा खर्च उठाते हैं, उतने से मन नही भरता तो बाहर वालों को देते रहते हैं। मीठी चुपड़ी बातें बनाकर लोग पापा को लूटते रहते हैं। कहने को इतने बड़े अधिकारी हैं इनका रहन सहन व घर देखकर कोई कहेगा चीफ इन्जीनियर का घर है? मुझे तो अपने दोस्तों को भी घर लाने में शर्म आती है। पढ़ते समय हमने कितने दुख उठाये हैं हम जानते हैं,कहने को पापा सरकारी अधिकारी हैं परन्तु चाचा , मामा और अन्य रिश्तेदारों की मदद करने के कारण पापा हमारे साथ सदैव अन्याय करते रहे, हम हवाई चप्पल पहनकर और फटी पुरानी पेन्ट कमीज में स्कूल कालेज जाते थे- एक सांस में अतुल सब कुछ कह गया।
नेहा ने पूछा-क्यों पापा कपड़े नहीं बनवाते थे?
अतुल बोला-दूसरों को बॉटने के बाद हमारे लिये कुछ बचता ही नहीं था। वह तो हम लोग रायपुर में हैं इसलिये हमारी पढ़ाई भी हो गई, यहाँ सब साधन हैं। घर में खाना खाये, जो मिला सो पहने और कालेज चल दिये। मैं और छोटा भाई वरूण क्लास में सदैव फर्स्ट आते थे हमारे लिये पापा के पास ना समय रहा ना ही पैसे।
पापा को कहने के लिये है कि मेरा एक बेटा डाक्टर है और एक बेटा इन्जीनियर है-वह तो हम जानते हैं कि हम कैसे पढ़े हैं?
कुछ देर रूक कर वह फिर बोला-मैने अपना बंगला बुक करवा लिया है 3-4 महीनें में तैयार हो जायेगा-हम लोग वहीं रहेगें यहाँ की किचकिच से छुट्टी मिलेगी-
नेहा बोली-ठीक है मेरा स्कूल भी वहाँ से नजदीक रहेगा मुझे भी आने जाने में सुविधा रहेगी, हम लोग अब नये घर में रहेंगें। मन ही मन नेहा नये घर में जाने के सपने देखने लगी। चाची सास व चाचा ससुर के पुराने ढंग के रहन सहन से वह पहले ही चिढ़ती थी।
अतुल को सतीश ने एम. टैक तक पढ़ाया था सिंचाई विभाग में वह कार्यपालन अभियंता के पद पर पदस्थ हैं, पढ़ा लिखा उच्च पद पर पदस्थ अधिकारी है। उसकी पत्नी नेहा सरकारी स्कूल में टीचर है, दोनों की अच्छी आय है। थोड़े दिनों में उनका बंगला तैयार हो गया। वे दोनों अपने नये घर में रहने चले गये। बहाना था नेहा का स्कूल उस घर से नजदीक पड़ता है। अतुल को अपने चाचा के परिवार व अन्यों पर मदद करने वाली पापा की प्रवृति पसन्द नहीं थी। छोटे भाई वरूण के मन में भी उसने यही बातें भर दी थी। वरूण भी एम.बी.बी.एस. करने के बाद एम.डी. कर चुका था। उसकी भी सरकारी नौकरी बिलासपुर में लग गई थी तो वह भी सपरिवार बिलासपुर में रह रहे थे।
लगभग साल भर बाद सतीश साहब रिटायर हो गये। जिस घर में वे रहते थे उसी घर के एक हिस्से में उनका छोटा भाई मुकुन्द अपने बच्चों के साथ रहता था। घर के मुख्य भाग में सतीश साहब रहते थे।
एक दिन नेहा के पापा नरेश अपनी बेटी नेहा के पास मिलने आये, तो सतीश गुप्ता के घर भी औपचारिक भेंट करने आ गये, दोनों हम उम्र अपने घर परिवार की बातचीत करने लगे। सतीश बोले- मैं खुश हूँ मैने अपने दोनो बच्चों की जिम्मेदारी पूरी कर दी। उन्हें पढ़ा लिखाकर समर्थ बना दिया, वे अपना कमा खा रहें हैं। भाई मुकुन्द के लिये भी दो बार दुकान डाल चुका हूँ परन्तु उसकी किस्मत में क्या है? पता नही। इसकी दुकान नही चलती, मेहनत भी करता है परन्तु दोनों बार दुकान ठप्प हो गयी। पहले लेथ मशीन डाल कर दी, सोचा चलायेगा वह भी नही चली, फिर किराने की दुकान डाली वह भी नही चली। इसको ड्राइवरी आती है अभी किसी की गाड़ी चलाता है। क्या करे? सब अपनी अपनी किस्मत है मैने उसको पढ़ाने की बहुत कोशिश की परन्तु उसको पढ़ने में बिल्कुल भी रूचि नहीं हैं।
नरेश गुप्ता ने कहा-मुकुन्द के परिवार के कारण ही नेहा व अतुल उस घर में चले गये हैं आप इन लोगों पर अधिक खर्च करते हो।
सतीश ने कहा-मैं उन लोगों की नाराजगी समझता हूँ दूसरों की मदद करने के मेरे
स्वभाव से उन्हें तकलीफ है। मैं अपनी कहानी सुनाता हूँ दूसरों की मदद से ही मैं यहाँ तक पहुँचा व सारा जीवन मैने उस अहसान को माना और उसी की प्रेरणा पर यह सब कर पा रहा हूँ। बारहवीं पास करने के बाद मैं खाली घूमता था, मैं बहुत गरीब था मेरे छोटे से नगर में बारहवीं तक की पढ़ाई का स्कूल था कैसे भी करके मैने बारहवीं तक पढ़ाई पूरी की। माता पिता दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। मुकुन्द की जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर थी। मैं मजदूरी पर जाने लगा, रोजी में काम करता था। एक दिन मुझे पेपर पढ़ता देखकर ठेकेदार का मुंशी मुझसे बोला कहाँ तक पढ़ा है तू , मुंशी बुजुर्ग सा व्यक्ति था।
मैने कहा- 12वीं तक पढ़ा हूँ, मुंशी को मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा सर्टिफिकेट व मार्कशीट लाकर दिखा। 
मैं अपने सर्टिफिकेट व मार्कशीट की फाइल लेकर मुंशी के पास गया, उसी फाइल में हॉकी व फुटबाल टूर्नामेंट के भी सट्रिफिकेट लगे हुए थे। मैं पढ़ाई के साथ साथ हॉकी व फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी भी था। मैं हॉकी व फुटबाल का खिलाड़ी हूँ यह जानकर मुंशी जी बहुत खुश हुये। 10वीं व 12वीं की परीक्षा में मेरे नम्बर 88 प्रतिशत से अधिक थे, दसवीं कक्षा में ही अच्छे अंक आने के कारण मुझे स्कालरशिप मिल गई और मैं 12वीं तक
की पढ़ाई कर पाया। मुंशी जी ने मुझसे पूछा-आगे पढ़ना चाहते हो? मैने कहा-पढ़ना तो चाहता हूँ परन्तु आगे पढ़ने के लिये मेरे पास पैसे नहीं है, और माताजी पिताजी का देहांत एक दुर्घटना में हो गया, छोटे भाई की भी जिम्मेदारी मेरे कंधो पर है, इसलिये मजदूरी कर रहा हूँ। मुंशीजी बुजुर्ग व भले आदमी थे उन्होने मेरी बाते
सहानुभूतिपूर्वक सुनी और मुझे बहुत सहयोग दिया।
मुंशी ने कहा-मैं मालिक से बात करता हूँ उन्होनें अपने मालिक से मेरे बारे में बातचीत की। उन्हें मेरे हित में समझाया कि लड़का पढ़ने लिखने में होशियार है, फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी भी है आगे पढ़ना भी चाहता है परन्तु माँ बाप ना होने के कारण आगे पढ़ नहीं पा रहा है।
सेठ ऊँची पहुँच वाले भले आदमी थे। इसी बीच नगर में फुटबॉल टूर्नामेंट हुआ, मैं भी उस टूर्नामेंट में खेला, मेरी टीम जीत गई। उस मैच का आनन्द वही सेठ जी ले रहे थे जो मेरे खेल के बारे में मुंशी जी से सुन चुके थे, मेरे खेल को देखकर सेठ जी बहुत प्रभावित हुये। उनके मित्र का रींवा में इन्जीनियरिंग कालेज था जिसमें सेठ जी ने मेरा एडमिशन करा दिया और फीस भर दी उन्होनें मेरी बहुत मदद की।
खाने पहनने के लिये मुझे और मुकुन्द को कुछ काम तो करना पड़ता। मुकुन्द की रूचि पढ़ने में बिल्कुल नहीं थी, बारबार समझाने पर भी वह स्कूल नहीं जाता था। मैं खाली समय ट्यूशन पढ़ाता और मुकुन्द मजदूरी करता था। यदि मुकुन्द मजदूरी नही करता तो मैं कैसे पढ़ पाता? टयूशन तो साल भर मिलते नहीं और अपनी परीक्षाओं के समय मैं ट्यूशन भी नही कर सकता था। जिन्दगी एक मकड़जाल है, मैने गरीबी को बहुत नजदीक से देखा और भोगा है। हम दोनों भाई किसी तरह अपना जीवन चला रहे थे।
उन दिनों पढ़े लिखे इन्जीनियर कम मिलते थे। बी.ई. की परीक्षा देने के साथ ही मेरी सरकारी नौकरी लग गई। छत्तीसगढ़ उन दिनों पिछड़ा क्षेत्र माना जाता था नये नियुक्त लोगों को यहाँ भेज देते थे। इस तरह से मेरी पोस्टिंग रायपुर में हो गई और मैं यहाँ बस गया। उस समय छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था।
अगर मुंशीजी ने अपने सेठ से मेरे लिये बात नहीं की होती और उनके कहने पर यदि सेठजी ने मुझे आगे ना पढ़ाया होता तो मैं क्या करता? उनकी मदद से ही आज मैं इतना समर्थ हो पाया और बच्चों को कुछ
बना पाया हूँ।बच्चों को शिकायत रहती है कि मैं दूसरों की मदद करता रहा, उनको सुविधायें नही दे पाया-उनकी शिकायत अपनी जगह ठीक है परन्तु मैं अपने परिवार, रिश्तेदारों व मित्रों व जरूरतमंद लोगों के लिये कुछ भी कर पाया तो ये मेरा सौभाग्य है। पत्नी के भाई के बच्चों को भी अपने पास रखकर पढ़ाया। 
यह मकान भी मैने 22 हजार रूपये में खरीदा था तब 22 हजार रूपये भी बहुत होते थे-बड़ी मुश्किल से व्यवस्था किया था पैसों की। आज तो ये भाग शहर के बीचोबीच है और यह मकान कई करोड़ का है।
ईश्वर भी कम परीक्षा नही लेता है इस बीच पत्नी काजल का स्वर्गवास हो गया अब मैं अकेला रहता हूँ, मुकुन्द व उसका परिवार मकान के दूसरे हिस्से में रहते हैं।
मुकुन्द अपनी जिम्मेदारी को समझे इसलिये वर्षों से उन्हें अलग रखा हूँ, परन्तु उसके बच्चों की पढ़ाई का खर्चा मैं ही उठाता हूँ इन बच्चों की शादी भी मुझे ही करनी है। पत्नी काजल के स्वर्ग सिधारने के बाद मुकुन्द ने अपने यहाँ खाने के लिये बहुत बोला परन्तु मैं अपना खाना स्वयं बना लेता हूँ वैसे काम वाली बाई भी आती है खाना भी
बना देती है। मैं निश्चिंत हूँ भगवान जो कर रहा है या जो हो रहा है ठीक ही है, शेष समय मंदिर व सत्संग में बीत जाता है। सरकार से पेंशन मिल रही है, मेरा जीवन ठीक चल रहा है।
शाम हो गई थी चॉदनी छिटक गई थी।
सतीश गुप्ता की आपबीती सुनकर नरेश गुप्ता बहुत प्रभावित हुये और वहाँ से सीधे अपनी बेटी और दामाद के नये घर में पहुँचें। सतीश गुप्ता के दूसरों की मदद करने की प्रवृति के बारे में उन्हें समझाया। नेहा और अतुल अपनी ओछी सोच पर बहुत शर्मिन्दा हुये, उन्हें समझ में आ गया कि एक दूसरे के मदद के बिना कोई जीवन में सफल नहीं हो सकता है। 
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ श्रीमति शिरोमणी माथुर
पूर्व व्याख्याता शासकीय नेमीचंद जैन कालेज राजहरा

Shiromanimathur@gmail.com 
9893742299
Dalli Rajhara