वर्धान ने द्वार पर दस्तक दी।
"आइए।"
शोभित खिड़की के पास खड़े थे। सुबह की पहली रोशनी उनके सफ़ेद पंखों पर पड़ रही थी। उम्र थी चेहरे पर — पर आँखें अभी भी तेज़ थीं। वही आँखें जो वर्धान को बचपन से पढ़ लेती थीं।
उन्होंने पलटकर देखा।
बेटे को देखा।
आँखों के नीचे काले घेरे। चेहरे पर थकान। पर जबड़ा कसा हुआ — जैसे कमज़ोरी दिखाने से डर लग रहा हो।
"रात भर जागे?" शोभित ने सीधे पूछा।
वर्धान ने एक पल रुककर कहा —
"जी।"
शोभित कुछ नहीं बोले। बस इशारे से बैठने को कहा।
वर्धान बैठ गया। पर बात शुरू नहीं हुई तुरंत।
कुछ देर चुप्पी रही — वो चुप्पी जो पिता-पुत्र के बीच होती है... जहाँ शब्दों से ज़्यादा साँसें बोलती हैं।
फिर वर्धान ने कहा —
"पिताजी... मुझे कुछ दिनों के लिए बाहर जाना है।"
"ब्रह्म लोक?" शोभित ने हल्के से कहा।
वर्धान ने उनकी आँखों में देखा।
उनमें सवाल था — पर दबाव नहीं।
"नहीं।" वर्धान धीरे बोला। "धरती।"
शोभित ने एक लंबी साँस ली। खिड़की से बाहर देखा।
"उस लड़की के लिए?"
वर्धaan चुप रहा — जो अपने आप में जवाब था।
शोभित उठे। धीरे-धीरे चलकर बेटे के पास आए। उसके कंधे पर हाथ रखा।
"वर्धान..."
आवाज़ में डाँट नहीं थी। फ़िक्र थी।
"मैं तुम्हारा पिता हूँ। गरुड़ लोक का पूर्व राजा बाद में।"
वर्धान ने ऊपर देखा।
"जो काम तुम कर रहे हो... वो ख़तरनाक है। अगर परिषद को पता चला कि उस लड़की के पास अभी भी शक्तियाँ हैं — तो सिर्फ़ वो नहीं, तुम भी निशाने पर आ जाओगे।"
"मुझे पता है।"
"फिर भी जा रहे हो।" (शोभित)
"फिर भी जाना होगा।" (वर्धान)
शोभित ने बेटे को देखा — देर तक।
उस चेहरे में उन्हें अपनी जवानी दिखी। वही ज़िद। वही आग। वही ग़लती करने का हौसला जो सिर्फ़ तब होता है जब दिल किसी के लिए धड़कता हो।
वो मुस्कुराए — थोड़ा। बस थोड़ा।
"सय्यूरी को शक हो गया है।"
वर्धान की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं।
"मैं उसे सँभाल लूँगा।" (वर्धान)।
शोभित: "पर तुम जल्दी लौटना। और..."
उन्होंने वर्धान का कंधा थपथपाया।
"ख़याल रखना अपना। वहाँ तुम अकेले हो — और मुझे मेरा बेटा जिंदा चाहिए
वर्धान खड़ा हुआ। झुककर पिता के चरण छुए।
शोभित ने सिर पर हाथ रखा — और कुछ नहीं कहा।
कभी-कभी आशीर्वाद शब्दों में नहीं होता।
वर्धान निकल पड़ा।
और शोभित खिड़की पर वापस आ गए —
बेटे को जाते हुए देखते रहे।
जब तक वो दिखा।
उधर धरती पर
परास दरवाज़े पर खड़ा था।
कवच चमक रहा था। सैनिक कतार में थे। घोड़े तैयार थे। हर चीज़ अपनी जगह थी।
बस एक चीज़ नहीं थी।
वर्धान।
परास ने आसमान की तरफ़ देखा — और समझ गया। की वो जरूर आएगा: उसकी आंखों में मुझ सच्चाई दिखी है
प्राणली का कक्ष
दासियाँ उसे तैयार कर रही थीं।
लाल और सोने का जोड़ा। माथे पर मांग टीका। हाथों में मेहंदी जो कल रात लगी थी — अभी भी गहरी थी।
प्राणली दर्पण में खुद को देख रही थी।
चेहरे पर भाव नहीं थे।
एक दासी ने धीरे से कहा — "देवी... आप बहुत सुंदर लग रही हैं।"
प्राणली ने हल्के से मुस्कुराई।
पर वो मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
🌿 अविराज का कक्ष
अविराज तैयार था।
शाही वस्त्र। सोने का मुकुट। हर चीज़ राजकुमार जैसी।
वो दर्पण में देख रहा था — खुद को।
और सोच रहा था।
बचपन से।
बचपन से उसने प्राणली को देखा था। उसकी हँसी सुनी थी। उसके साथ खेला था। और कहीं न कहीं — उसी हँसी में खो गया था।
पर प्राणली ने कभी उसे उस तरह नहीं देखा।
कभी नहीं।
और अब...
उसकी मुट्ठी हल्की सी भिंची।
कुछ महीने। बस कुछ महीनों में किसी ने वो कर दिया जो मैं सालों में नहीं कर पाया।
कौन है वो?
कैसा है वो?
क्या है उसमें जो मुझमें नहीं?
वो इन्हीं सोचों में डूबा था —
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"दूल्हे राजा... बहुत जच रहे हो।"
आवाज़ में शरारत थी। और कुछ और भी — जो पकड़ना मुश्किल था।
अविराज ने पलटकर देखा।