(लैब में लाल बत्ती घूम रही है। अलार्म तेज़ हो चुका है—
बीप—बीप—बीप—!)
कंप्यूटर वॉइस —
“⚠️ WARNING…
SYSTEM OVERLOAD…
10… 9… 8…”
(Mr. राणा की उंगलियाँ काँप रही हैं।)
Mr. राणा (चिल्लाकर) बोले -
“अब पीछे हटने का वक्त नहीं है!”
(राधिका बच्चों को सीने से लगाए खड़ी है।)
राधिका (रोते हुए) बोली -
“हे भगवान… इन्हें बचा लो…”
(पंडित जी ज़मीन पर बैठकर आँखें बंद कर मंत्र पढ़ते हैं।)
(अंदर दीवारें काँप रही हैं। रोशनी अब सफ़ेद से नीली हो रही है।)
(सुनीति को तेज़ दर्द होता है।)
सुनीति (कराहते हुए) बोली -
“कौशिक…लग रहा है जैसे शरीर टूट रहा हो…”
(कौशिक उसे कसकर पकड़ लेता है।)
कौशिक (आँखों में आँसू लिए) बोला -
“अगर ये आख़िरी पल है…तो मैं खुश हूँ कि तुम्हारे साथ हूँ।”
(अचानक, उनके शरीर का अदृश्यपन तेज़ी से बदलने लगता है।)
(पहले दिल की धड़कन दिखती है…फिर नसें…फिर त्वचा।)
(काउंटडाउन—)
कंप्यूटर वॉइस:
“3… 2… 1…”
Booooooom.....
💥 धमाका!
(पूरा लैब सफ़ेद रोशनी से भर जाता है। शीशे टूटते हैं। हवा का तेज़ झोंका।)
(राधिका चीखती है।)
राधिका बोली -
“सुनीति!!!”
(धुआँ…हर तरफ़ धुआँ।)
(मशीन पूरी तरह जल चुकी है। अंदर का दरवाज़ा खुला हुआ।)
(कुछ सेकंड तक पूरी शांति।)
(Mr. राणा धुएँ में से अंदर झाँकते हैं।)
Mr. राणा (काँपती आवाज़ में) बोली -
“क… कौशिक?
सुनीति?”
(कोई जवाब नहीं।)
(राधिका रोने लगती है।)
राधिका बोली -
“सब खत्म हो गया…”
(अचानक धुएँ के बीच से खाँसने की आवाज़।)
कौशिक (कमज़ोर आवाज़ में) बोला -
“पानी…”
(सब चौंक जाते हैं।)
(धुआँ हटता है वहाँ कौशिक बैठा है, खून लगा हुआ… पर पूरी तरह दिखाई दे रहा है।)
Mr. राणा (हैरानी से) बोले -
“वो…वो दिख रहा है!”
(फिर कौशिक के पीछे से सुनीति निकलती है।)
(उसके बाल बिखरे हैं, आँखें नम…पर वो भी पूरी तरह दृश्य।)
(सुनीति अपने हाथ देखती है। फिर कौशिक को छूती है।)
सुनीति (रोते हुए हँसकर) बोली -
“मैं…मैं दिख रही हूँ…”
(कौशिक उसे गले लगा लेता है।)
कौशिक (भर्राई आवाज़ में) बोले -
“हम वापस आ गए…”
(राधिका दौड़कर आती है और सुनीति को गले लगा लेती है।)
राधिका बोली -
“तुम दोनों…जिंदा हो…और नॉर्मल हो!”
(पंडित जी आँखें खोलते हैं।)
पंडित जी (मुस्कुराकर) बोले -
“विज्ञान ने रास्ता दिखाया…पर जीत नियत और प्रेम की हुई।”
(Mr. राणा जली हुई मशीन को देखते हैं।)
Mr. राणा (गंभीर आवाज में) बोले -
“मशीन पूरी तरह नष्ट हो गई है…ये प्रक्रिया दोबारा कभी नहीं हो सकेगी।”
सुनीति (शांत स्वर में) बोली -
“कोई बात नहीं…हमें अपनी ज़िंदगी वापस मिल गई है।”
(कौशिक बच्चों की ओर देखता है।)
कौशिक बोला -
“और शायद…अब हम नयी शुरुआत कर सकते हैं।”
एक विस्फोट ने सब कुछ तोड़ा…पर उसी मलबे से दो ज़िंदगियाँ
फिर से बनीं।
अदृश्य दुनिया पीछे छूट गई थी…पर उसकी यादें हमेशा साथ रहेंगी।
(हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही है।
कमरे में सन्नाटा है लेकिन ये सन्नाटा अब डरावना नहीं,शांत है।)
(सुनीति बिस्तर पर लेटी है। धीरे-धीरे आँखें खोलती है।)
(वो अपनी हथेली को रोशनी में उठाकर देखती है।
उँगलियाँ…
रेखाएँ…सब साफ़ दिख रहा है।)
सुनीति (खुद से, धीमे) बोला -
“मैं…मैं सच में यहाँ हूँ…”
(उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं—
इस बार दर्द के नहीं, ज़िंदगी के।)
(कौशिक करवट बदलता है। उसकी आँखें खुलती हैं।)
(पहली चीज़ जो वो देखता है सुनीति का चेहरा। बिल्कुल सामने।
बिल्कुल साफ़।)
(वो एक पल को डर जाता है, जैसे सपना टूट न जाए।)
(धीरे से सुनीति के गाल को छूता है।)
कौशिक (भर्राई आवाज़ में) बोला -
“तुम…दिख रही हो…”
(सुनीति हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाती है।)
सुनीति बोली -
“और आप भी...दिख रहे हो…”
(दोनों एक-दूसरे को कसकर गले लगा लेते हैं।)
(सुनीति बिस्तर से उठती है। पैर ज़मीन पर रखती है।)
(ठंडा फ़र्श—पहली बार इतनी असली लगती है।)
सुनीति (हँसते हुए) बोली -
“कौशिक जी…फ़र्श ठंडा है!”
(कौशिक मुस्कुरा देता है।)
कौशिक बोला -
“छोटी-छोटी बातें…कितनी बड़ी लगती हैं न,जब खो चुकी हों।”
(सुनीति रसोई में जाती है। चूल्हा जलाती है।)
(आग की लौ। सीटी बजाती केतली।)
(कौशिक दरवाज़े पर खड़ा देख रहा है—चुपचाप।)
कौशिक (भावुक सा) बोला -
“मुझे लगा था मैं तुम्हें कभी ऐसे खाना बनाते नहीं देख पाऊँगा।”
(सुनीति रुक जाती है।)
सुनीति बोली -
“और मुझे लगा था आप मेरे साथ कभी नाश्ता नहीं कर पाओगे।”
(दोनों की आँखें भर आती हैं।)
(अचानक दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक।)
आवाज़ (बाहर से) बोली -
“अंकल…आंटी…?”
(कौशिक दरवाज़ा खोलता है।)
(बाहर आरुषि और आरव खड़े हैं। हाथ में फूल।)
आरुषि (मुस्कुराकर) बोली -
“आप आज भी दिख रहे हो…”
(सुनीति घुटनों के बल बैठकर दोनों को गले लगा लेती है।)
सुनीति बोली -
“अब हमेशा दिखेंगे,पक्का।”
(आरव मासूमियत से पूछता है।)
आरव बोला -
“तो आप लोग अब कहीं गायब नहीं हो जाओगे न?”
(कौशिक बच्चों के सिर पर हाथ रखता है।)
कौशिक बोला -
“नहीं…अब नहीं।”
(राधिका दूर से देख रही है। उसकी आँखों में सुकून है।)
राधिका (मन ही मन) बोली -
“शायद भगवान ने इस घर को फिर से ज़िंदा कर दिया है।”
(सुनीति और कौशिक बरामदे में खड़े हैं। सूरज पूरी तरह निकल चुका है।)
सुनीति बोली -
“हमने मौत देखी…अदृश्य दुनिया देखी…
अब मुझे बस साधारण ज़िंदगी चाहिए।”
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“साधारण…पर साथ में।”
(वो उसका हाथ पकड़ लेता है। इस बार कोई डर नहीं।)
ये सुबह कोई चमत्कार नहीं थी… ये उस प्रेम की जीत थी जो अदृश्य होकर भी कभी कमज़ोर नहीं पड़ा।
रातें पीछे छूट चुकी थीं… और ज़िंदगी फिर से दरवाज़ा खटखटा रही थी।