दिल्ली की बड़ी सड़कों और भीड़-भाड़ के बीच, छोटे-छोटे सपनों को लेकर आई थी सुनीति ठाकुर। AI इंजीनियर बनने का सपना पूरा हो चुका था। जॉब मिल गई थी, और अब उसे बस अपने पैरों पर खड़ा होना था।
सुनीति कमरे में सामान रखते हुए।
सुनीति (सोचते हुए) -
“ये रूम अच्छा है… छोटा है पर आराम से रह सकती हूँ। अब मेरी असली ज़िन्दगी की शुरुआत होगी।”
तीन दिन तक सब सामान्य रहा।
रात का समय – सुनीति लैपटॉप पर काम कर रही है)
हवा हल्के से परदे हिलाती है।
सुनीति (धीरे से) बोली -
“ये खिड़की तो मैंने बंद की थी… हवा अंदर कैसे?”
वो खिड़की चेक करती है – पर सब बंद था।
उसे अहसास होता है जैसे कोई उसके कंधे पर झुका हो, उसकी साँसें महसूस कर रहा हो।
सुनीति (डरी हुई) बोली -
“क… कौन है वहाँ?”
कमरे में सन्नाटा।
तीन दिन बाद से, हर रात उसे एहसास होता जैसे कोई उसे देख रहा हो, बहुत करीब से… पर दिखाई कभी नहीं देता।
सुनीति बिस्तर पर सो रही है। अचानक महसूस होता है कि किसी ने उसके बालों को हल्के से छुआ।
सुनीति (घबराकर) बोली -
“कृपया सामने आओ… मैं डर जाऊँगी अगर ऐसे ही करते रहे तो।”
कमरे में हल्की आवाज़ गूंजती है, जैसे किसी ने पहली बार अपनी मौजूदगी जताई हो।
सुनीति कमरे का हर कोना टॉर्च से चेक कर रही है।)
सुनीति (अपने आप से) बोली -
“कहीं कोई स्पाई कैमरा तो नहीं लगा? ये सब मेरा वहम है या सच में… कोई है यहाँ?”
वो दीवारें, अलमारी, बिस्तर सब टटोलती है। लेकिन कुछ नहीं मिलता।
जितना ज्यादा वो ढूँढती, उतना ही रहस्य गहराता जाता।
रात में सुनीति बिस्तर पर लेटी है। कमरे में हल्की रोशनी है।
धीरे-धीरे उसे लगता है जैसे कोई उसकी लटों को उंगलियों से सुलझा रहा है।
सुनीति (सिहरकर) बोली -
“को… कौन है?”
वो डर से सिकुड़ जाती है, कंबल को कसकर पकड़ लेती है। आँखें बंद कर लेती है।
उस रात उसने ठान लिया कि अगर भगवद गीता साथ रखेगी तो सब ठीक हो जाएगा।
सुनेति अगले दिन गीता अपने तकिये के नीचे रखती है।
रात में वो चैन से सोने की कोशिश करती है। गीता उसके पास रखी है।
लेकिन फिर वही अहसास… बालों पर हल्का स्पर्श… और इस बार गाल पर किसी की साँस की गरमी।
सुनीति (डरी हुई फुसफुसाकर) बोली -
“हे भगवान… ये क्या हो रहा है मेरे साथ?”
उसका दिल तेजी से धड़कने लगता है।
अब ये कोई वहम नहीं था। कोई अदृश्य ताक़त सचमुच उसके बहुत करीब थी।
सुनीति करवट बदलती है। उसकी आँखें बंद हैं, पर चेहरे पर साफ महसूस होता है कि किसी की साँस उसकी त्वचा से टकरा रही है।
सुनीति (काँपते हुए) बोली -
“अगर सच में कोई है… तो सामने आओ। मुझे डराओ मत। मैं सह नहीं पाऊँगी।”
कमरे में सन्नाटा। फिर बहुत धीमी, गहरी आवाज़ गूंजती है।
आवाज़ (धीरे से) बोली -
“डरना मत, सुनीति… मैं तुम्हें कभी चोट नहीं पहुँचाऊँगा।”
सुनीति (अचंभित सी) बोली -
“क…कौन? कहाँ हो तुम?”
आवाज़ बोली -
“मैं तुम्हारे बहुत करीब हूँ… जितना तुम सोच भी नहीं सकती।”
सुनीति का शरीर सिहर उठता है। उसकी आँखों में डर और जिज्ञासा दोनों हैं।
सुनीति अकेली बैठी है, आँखों में आँसू।
सुनीति (धीरे से) बोली -
“ये सपना है या हकीकत? मैं क्यों महसूस कर रही हूँ किसी को, जो दिखाई ही नहीं देता? ये इंसान है… या कोई आत्मा?”
काँच की खिड़की पर हल्की-सी धुंध बनती है और उसमें उभरता है एक नाम – Kaushik.
काँच की खिड़की पर धुंध में नाम Kaushik उभरता है।
सुनीति (आश्चर्य से) बोली -
“कौशिक… लेकिन ये नाम मेरे कमरे में क्यों?”
सुनीति पास जाकर खिड़की को छूती है, धुंध मिट जाती है। नाम भी गायब हो जाता है।
अगले दिन –
सुनीति बिल्डिंग के नीचे खड़ी होकर आसपास के लोगों से पूछताछ करती है।
सुनीति बोली -
“भाईसाहब… ये कमरा पहले किसके पास था?”
पड़ोसी (हिचकिचाते हुए) बोला -
“बेटी, इस कमरे की बात मत करो। यहाँ पहले एक लड़का रहता था… नाम था कौशिक ठाकुर।”
सुनीति (चौंककर) बोली -
“कौशिक ठाकुर? वही नाम…”
पड़ोसी बोला -
“बहुत ही हैंडसम लड़का था। अनाथ था, माँ-बाप दो साल पहले ही गुजर चुके थे। अकेले ही पढ़ाई करता था… होनहार था। सब कहते थे कि बड़ा इंजीनियर बनेगा। लेकिन… एक दिन वो अचानक ग़ायब हो गया। फिर कभी वापस नहीं आया।”
सुनीति (धीरे से) बोली -
“मतलब… कोई नहीं जानता वो कहाँ गया?”
पड़ोसी (सिर झुकाते हुए) बोला -
“नहीं बेटी। कुछ लोग कहते हैं… उसकी आत्मा अब भी इस कमरे में भटकती है।”
सुनीति अपने कमरे में लौटती है, सोच में डूबी।
सुनीति (अपने आप से) बोली -
“नहीं… ये सब अंधविश्वास है। मैं भूत-प्रेत जैसी बातों पर यकीन नहीं करती। ये सब मेरे दिमाग का खेल है। शायद नया शहर, नई नौकरी, नया माहौल… इसी वजह से मुझे ऐसा लग रहा है।”
(वो गहरी सांस लेती है और गीता को हाथ में थाम लेती है।)
सुनीति (जोर से) बोली -
“ये मेरा वहम है। बस वहम।”
रात में सुनीति लैपटॉप पर काम कर रही है। अचानक टेबल पर रखी पेन अपने आप गिर जाती है।
सुनीति (चौंककर) बोली -
“ये कैसे…?”
रात – कमरे में सन्नाटा है। खिड़की से चाँदनी अंदर आ रही है। सुनीति गहरी नींद में है।
अचानक उसे महसूस होता है कि कोई उसके पास लेटा है… बहुत करीब, जैसे उसे बाहों में भर लिया हो।
सुनीति (नींद में सिहरते हुए) बोली -
“ये… ये कैसा अहसास है…?”
वो अचानक घबराकर उठ जाती है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं।
सुनीति (हकबकाई हुई) बोली -
“कोई… कोई मेरे पास था… इतना करीब… ये मुमकिन ही नहीं।”
सुनीति बिस्तर से उतरकर कोने में बैठ जाती है। उसका चेहरा डर से पीला पड़ चुका है। आँसू बहने लगते हैं।
सुनीति (रोते हुए, काँपती आवाज़ में) बोली -
“हे भगवान… ये क्या हो रहा है मेरे साथ? मैं… मैं यहाँ अकेली हूँ न?”
वो फूट-फूट कर रो पड़ती है।
सुनीति अपने आँसू पोंछने की कोशिश करती है। तभी उसे एहसास होता है कि कोई और उसके गाल से आँसू पोंछ रहा है… नरम, पर अदृश्य हाथों से।
सुनीति अचानक काँप उठती है।
सुनीति (भयभीत होकर) बोली -
“क… कौन है? मुझे मत छुओ… प्लीज़… मैं बहुत डर रही हूँ।”
उसकी सिसकियाँ और तेज़ हो जाती हैं।
कमरे में हल्की हवा बहती है। पर्दे हिलते हैं। और फिर वही धीमी, गहरी आवाज़ सुनाई देती है।
आवाज़ (नरमी से) बोली -
“मत रो, सुनीति… मैं तुम्हें कभी नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। तुम्हारे आँसू मुझे बेचैन कर देते हैं।”
सुनीति (डरी और उलझी हुई) बोली -
“तुम… तुम आखिर हो कौन? क्यों मेरे इतने करीब हो? क्यों मुझे महसूस कराते हो, पर सामने नहीं आते?”
आवाज़ (धीरे से) बोली -
“क्योंकि मैं इस दुनिया में होते हुए भी… दिखाई नहीं देता। और तुम ही वो हो, जो मुझे सबसे ज़्यादा महसूस कर सकती हो।”
सुनीति की आँखें आँसुओं से भीगी हैं। वो डर और करुणा के बीच उलझी रहती है।
उसका मन कहता – ये सब उसका वहम है। पर दिल मानने को तैयार नहीं था। क्योंकि वो एहसास… किसी सच्चे इंसान का ही था।
आखिर आगे क्या होगा? क्या कौशिक सुनीति को नुकसान पहुंचाएगा? क्या कौशिक मरने के बाद भूत बना था या कुछ और राज था ? क्या हुआ था कौशिक के साथ?