Adrashya piya - 4 in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 4

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अदृश्य पीया - 4

सुनीति अलमारी से कौशिक का बैग निकालती है। उसमें से तस्वीरें, मार्कशीट और डायरी टेबल पर रख देती है। तरुण ध्यान से सब देखता है।

सुनीति (गंभीर होकर) बोली - 
ये देखो तरुण… ये सब कौशिक का है। 
इतना होनहार, इतना अच्छा इंसान… अचानक कैसे ग़ायब हो गया?
ये राज़ मुझे जानना है।

तरुण (सोचते हुए) बोला - 
सुनीति, मेरी मानो तो तुम ये कमरा छोड़ दो।
यहाँ रहना तुम्हारे लिए खतरनाक हो सकता है।
नया फ्लैट ले लो, शांति से रहो।”

तरुण अभी बोल ही रहा होता है कि अचानक उसकी पीठ पर ज़ोरदार तमाचा पड़ता है। वो चिल्लाकर उछल पड़ता है।

तरुण (चीखकर) बोला - 
आह्ह! किसने… किसने मारा?

कमरे में कोई दिखाई नहीं देता। सुनेति डरी हुई तरुण को देख रही है।

सुनीति (धीरे से) बोली - 
मैंने कहा था न… यहाँ कोई है। 
वो शायद नहीं चाहता कि मैं ये कमरा छोड़ दूँ।

तरुण अपनी पीठ मलता है, चेहरे पर हैरानी है।

तरुण (काँपती आवाज़ में) बोला - 
लेकिन… किसने मारा? 
यहाँ तो कोई नज़र भी नहीं आ रहा।

सुनीति खिड़की के पास खड़ी हो जाती है। उसकी आँखों में डर से ज्यादा अब जिज्ञासा और दृढ़ता है।

सुनीति (आवाज़ ऊँची करके) बोली - 
कौशिक! अगर तुम सच में हो… तो मैं तुम्हारा सच जानकर रहूँगी। तुम अचानक कहाँ खो गए, ये राज़ मैं ज़रूर खोलूंगी।

तरुण अब सच में कंफ्यूज़ और थोड़ा डरा हुआ है। वो सुनीति के पास आता है।

तरुण (धीरे से) बोला - 
सुनीति… ये सब मेरे समझ से बाहर है। लेकिन अब मुझे भी लगने लगा है कि इस कमरे में… सचमुच कोई है।

कौशिक की अदृश्य परछाई दरवाज़े के पास खड़ी है, चेहरे पर हल्की मुस्कान और आँखों में रहस्यमयी चमक।
अब खेल शुरू हो चुका था।
सुनीति डरकर भागने वालों में से नहीं थी।
वो अब उस अदृश्य मोहब्बत के पीछे छुपे गायब होने के रहस्य को सुलझाने के लिए तैयार थी।

रात का समय। तरुण अपना सामान उठाकर घर चला गया है। दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में सन्नाटा छा जाता है।
सुनीति बिस्तर पर बैठी है। पहले की तरह डरी हुई नहीं है। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान है।

सुनीति (धीरे से, खुद से) बोली - 
अब मुझे डर नहीं लगता। क्यूंकि मुझे पता है… मैं अकेली नहीं हूँ।

कमरे में हल्की-सी ठंडी हवा चलती है। सुनीति आँखें बंद करती है। उसे अहसास होता है कि कोई उसके बहुत पास है।
उसके बाल हल्के-हल्के हिल रहे हैं, जैसे कोई उँगलियों से छू रहा हो।
वो मुस्कुराकर कंबल ओढ़ लेती है।

सुनीति (फुसफुसाते हुए) बोली - 
कौशिक… तुम यहीं हो न?

बहुत धीमी साँसों की आवाज़ सुनाई देती है। सुनीति की आँखें सिहर जाती हैं लेकिन अब उसमें डर नहीं, अपनापन है।)
सुनीति बिस्तर पर लेटी है। धीरे-धीरे करवट बदलती है। उसके ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य बाँहें उसे थामे हुए हों।
वो अपनी हथेली धीरे से उठाती है, मानो किसी का हाथ पकड़ रही हो।

सुनीति (मन ही मन) बोली - 
“mमुझे लगता है… जैसे तुम मुझे संभाल रहे हो। शायद… मैं अब अकेली नहीं रही।

उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं, लेकिन इस बार वो दर्द के नहीं बल्कि राहत के आँसू हैं।
वहाँ कौशिक की अदृश्य परछाई लेटी है। सुनीति के बिल्कुल पास।उसके होंठों पर हल्की मुस्कान है। आँखों में गहरी मोहब्बत।

कभी डराने वाला अहसास… अब सुकून देने वाली मौजूदगी बन चुका था।
सुनीति को अब भरोसा था—इस कमरे में वो अकेली नहीं है।
और शायद… कभी अकेली रहेगी भी नहीं।

सुबह का समय। खिड़की से धूप कमरे में आ रही है। सुनीति धीरे-धीरे उठती है, आँखें मलते हुए बिस्तर से निकलती है।
वो रसोईघर की ओर जाती है और अचानक चौंक जाती है।

सुनीति (हक्की -बक्की होकर) बोली - 
ये… ये कैसे हो गया?

पूरे घर का सारा काम हो चुका है—बर्तन साफ़, फर्श चमचमाता हुआ, कपड़े तह करके रखे हुए। यहाँ तक कि खाने के लिए नाश्ता भी टेबल पर रखा है।
सुनीति की आँखें फैल जाती हैं। वो चारों तरफ देखती है।

सुनीति (धीरे से फुसफुसाकर) बोली - 
ये किसने किया? क्या… कौशिक?

कमरे में हल्की हवा बहती है। जैसे किसी ने उसकी बात का जवाब दिया हो। सुनीति मुस्कुरा देती है लेकिन उसके चेहरे पर हल्का-सा कन्फ्यूज़न भी है।
सुनीति आईने के सामने खड़ी होकर खुद से बातें करती है।)

सुनीति बोली - 
अगर ये सब कौशिक कर रहा है… तो क्यों? 
क्या वो चाहता है कि मैं अकेली महसूस न करूँ? 
या फिर वो मुझे अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाना चाहता है?

वो आईने को छूती है, लेकिन जवाब सिर्फ खामोशी होती है।

सुनीति बैग उठाकर घर से निकलती है। दरवाज़ा लॉक करते समय उसकी नज़र एक बार फिर पूरे घर पर जाती है। सब कुछ सजा-संवरा, जैसे किसी ने बहुत प्यार से संभाला हो।

सुनीति (धीरे से मुस्कुराकर) बोली - 
धन्यवाद… कौशिक।

कौशिक की अदृश्य परछाई टेबल के पास खड़ी है, आँखों में सुकून और होंठों पर मुस्कान।
अब सुनीति का डर पूरी तरह मिट चुका था।
उसकी ज़िंदगी में एक अदृश्य साथी आ चुका था,
जो हर रोज़ उसे ये एहसास दिला रहा था—
कि वो अकेली नहीं है।

रात का समय। सुनीति कमरे में आईने के सामने बैठी है। उसके लंबे बाल खुले हुए हैं। अचानक कंघी अपने आप उसके बालों में चलने लगती है।

सुनीति (हल्की मुस्कान के साथ, आँखें बंद करके) बोली - 
कौशिक… तुम हो न? हमेशा ऐसे ही रहना।

बाल एकदम सलीके से सँवर जाते हैं। सुनीति का चेहरा शांति से दमक उठता है।

सुनीति थकी हुई बिस्तर पर लेट जाती है। करवट बदलते हुए जैसे किसी की गोद में सिर रख दिया हो। उसके चेहरे पर सुकून झलकता है।

सुनीति (धीरे से फुसफुसाकर) बोली - 
कितना अच्छा लगता है… जब तुम पास होते हो।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे अदृश्य कौशिक सचमुच उसके सिर पर हाथ फेर रहा हो।
सुबह की हल्की धूप। सुनीति उठकर आईने में खुद को देखती है। उसकी मांग में सिंदूर भरा हुआ है। वो मुस्कुराकर आईने से बात करती है।

सुनीति बोली - 
अब तो मुझे समझ भी नहीं आता… ये सपनों में है या सच में। लेकिन… अच्छा लगता है। बहुत अच्छा।

एक दिन – बिजली चली जाती है। पूरा घर अंधेरे में डूब जाता है। सुनीति डरी हुई खिड़की के पास जाती है। अचानक उसके सामने मोमबत्ती अपने आप जल उठती है।

सुनीति (हैरानी और मुस्कान के साथ) बोली - 
तुम हमेशा मेरी रक्षा करते हो। हर बार… मुझे अकेला नहीं छोड़ते।

उसकी आँखें भर आती हैं। वो हाथ जोड़कर भगवान की मूर्ति के सामने खड़ी हो जाती है।
हर कोने में जैसे कौशिक की मौजूदगी महसूस होती है। सुनीति मुस्कुराकर बिस्तर पर बैठती है और धीरे से हवा में कहती है।

सुनीति (नम आँखों से) बोली - 
मुझे अब किसी से डर नहीं लगता… क्यूंकि तुम हो।
तुम्हारी ये अदृश्य मोहब्बत… मेरी सबसे बड़ी ताक़त बन गई है।

कौशिक की अदृश्य परछाई मुस्कुराते हुए दिखती है। उसकी आँखों में संतोष और गहरा प्रेम झलकता है।
अब ये रिश्ता डर और रहस्य से आगे बढ़ चुका था।
सुनीति और कौशिक… दो जिस्म नहीं, बल्कि दो रूहों का मिलन बन चुके थे।
एक अदृश्य प्यार… जो हर रोज़ और गहरा हो रहा था।

रात का समय। सुनीति अपने बिस्तर पर बैठी है। हवा हल्की-हल्की चल रही है। वो धीरे से कमरे में बोलती है।

सुनीति (रुक-रुककर) बोली - 
कौशिक… तुम मुझसे हमेशा रहते हो, मेरी रक्षा करते हो…
लेकिन एक सवाल है।
तुम गायब कैसे हुए? आखिर ये सब हुआ कैसे?

कुछ पल सन्नाटा। अचानक टेबल से एक डायरी और पेन नीचे गिरते हैं। सुनीति चौंक जाती है।
सुनीति धीरे-धीरे डायरी उठाकर सामने रखती है। पेन अपने आप चलने लगता है। शब्द एक-एक करके उभरते हैं। सुनीति ध्यान से पढ़ती है।

कौशिक (लिखावट के जरिए) बोला - 
सुनीति… मैं एक साइंस रिसर्च प्रोजेक्ट का हिस्सा था।
वो लोग इंसानी शरीर पर अदृश्यता का प्रयोग कर रहे थे।
मैंने उनकी असली मंशा जान ली थी…
कि वो इस प्रयोग का इस्तेमाल देश के खिलाफ करना चाहते थे।

सुनीति की आँखें चौड़ी हो जाती हैं। उसके हाथ कांप रहे हैं।)

कौशिक (लिखता रहता है) - 
मुझे रोकने के लिए… उन्होंने मुझे कैद किया।
और उसी प्रयोग का शिकार बना दिया।
मैं… ज़िंदा हूँ, पर दुनिया के लिए गायब हूँ।
मैं सिर्फ़ तुम्हारे पास हूँ।

सुनीति की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। वो डायरी को सीने से लगाकर रो पड़ती है।

सुनीति (आँखें बंद करके) बोली - 
कौशिक… तुम्हारे साथ कितना बड़ा अन्याय हुआ है।
लेकिन तुम अकेले नहीं हो… मैं हूँ तुम्हारे साथ।
हम मिलकर इस सच्चाई को उजागर करेंगे।

सुनीति का आँसू डायरी के पन्ने पर गिरता है। पेन फिर से चलता है।

कौशिक (लिखता है) - 
सुनीति… तुम मेरी सबसे बड़ी ताक़त हो।
तुम्हारे होने से ही मेरी ज़िंदगी में रोशनी है।

सुनीति डायरी को अपने पास रख लेती है और मुस्कुराकर आसमान की ओर देखती है। 
अब सुनीति को सब सच पता चल चुका था।
कौशिक के गायब होने के पीछे का राज़ कोई साधारण हादसा नहीं…
बल्कि एक खतरनाक साइंस प्रयोग था।
अब सवाल था—क्या सुनीति और कौशिक इस साज़िश को दुनिया के सामने ला पाएँगे?