(सुबह की धूप कमरे में आ रही है।)
(कौशिक आईने के सामने खड़ा है — पूरी तरह साफ़ दिख रहा है।)
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“मैं सच में ठीक हूँ, सुनीति।”
(सुनीति राहत की साँस लेती है।)
सुनीति बोली -
“आज पहली बार डर नहीं लग रहा।”
(वो दोनों साथ नाश्ता करते हैं — बिल्कुल आम कपल की तरह।)
(ड्रॉइंग रूम – पूरा परिवार मौजूद है।)
राकेश बोला -
“अब कोई परछाईं नहीं, कोई अदृश्यपन नहीं।
सब कुछ नॉर्मल है।”
राधिका (हँसते हुए) बोली -
“लगता है किस्मत ने आखिरकार चैन दे दिया।”
(कौशिक सबको देखकर सिर झुकाता है — कृतज्ञता में।)
(ऑफिस – कौशिक लैपटॉप पर काम कर रहा है।)
कौशिक फिर से ज़िंदगी की रेस में लौट आया था।
जैसे वो कभी गायब ही नहीं हुआ हो।
(सहकर्मी उससे हाथ मिलाते हैं।)
मैनेजर बोला -
“Welcome on board, Kaushik.”
(कौशिक हल्की मुस्कान के साथ काम में लग जाता है।)
– सुनीति और कौशिक साथ चाय पीते हैं
– हँसते हैं
– देर रात बातें करते हैं
– बिना डर के सब सोते हैं
कुछ दिन सच में सब ठीक रहा।
ना कोई डर, ना कोई साया।
(शाम – किचन में राधिका और राकेश बातें कर रहे हैं।)
राधिका बोली -
“इतना सब झेलने के बाद…
अब दोनों को साथ कर देना चाहिए।”
राकेश बोला -
“हाँ।
शादी का समय आ गया है।”
(ड्रॉइंग रूम।)
राकेश (गंभीर पर प्यार से) बोला -
“सुनीति… कौशिक…
हमने सोचा है…”
(सुनीति और कौशिक एक-दूसरे को देखते हैं।)
राकेश बोला -
“अब तुम दोनों की शादी कर देनी चाहिए।”
(सुनीति शर्म से सिर झुका लेती है।)
कौशिक (धीरे से) बोला -
“अगर सुनीति तैयार है…
तो मैं पूरी ज़िंदगी उसका साथ निभाऊँगा।”
(सुनीति मुस्कुरा देती है।)
(घर में हलचल:)
– कपड़ों की लिस्ट
– पंडित से बात
– डेट तय करने की चर्चा
घर में खुशियाँ लौट आई थीं।
हर किसी को लग रहा था…
अब सब ठीक हो जाएगा।
(रात।)
(सुनीति और कौशिक बालकनी में खड़े हैं।)
सुनीति बोली -
“डर लगता है…
इतनी खुशी के बाद।”
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“अब कुछ नहीं होगा।”
(कौशिक के पैरों की परछाईं…
धीरे-धीरे हल्की पड़ने लगती है।)
(कौशिक को इसका एहसास नहीं होता।)
शायद खतरा टला नहीं था…
बस कुछ समय के लिए छुप गया था।
(शादी का मंडप सजा हुआ है। फूलों की खुशबू, शहनाइयों की मधुर धुन।)
(सुनीति लाल जोड़े में दुल्हन बनी बैठी है। आँखों में घबराहट और खुशी दोनों।)
जिस ज़िंदगी में डर, साया और अदृश्यपन था…
आज उसी ज़िंदगी में मंगल गीत गूँज रहे थे।
(कौशिक सेहरा बाँधे मंडप में आता है।)
(सब उसे साफ़ देख पा रहे हैं — बिल्कुल सामान्य इंसान की तरह।)
राकेश (मन ही मन) बोला -
“भगवान का शुक्र है…”
(सुनीति और कौशिक एक-दूसरे के सामने खड़े होते हैं।)
(सुनीति काँपते हाथों से जयमाला पहनाती है।)
कौशिक (धीरे से) बोला -
“अब कभी अदृश्य नहीं होऊँगा… वादा।”
(कौशिक जयमाला पहनाता है।)
(तालियाँ गूँज उठती हैं।)
(पंडित मंत्र पढ़ते हैं।)
पंडित बोले -
“पहला फेरा — साथ निभाने का वचन…”
(आग के चारों ओर दोनों फेरे लेते हैं।)
हर फेरे के साथ
डर पीछे छूटता जा रहा था…
या शायद छुपता जा रहा था।
(कौशिक सुनीति की माँग में सिंदूर भरता है।)
(एक पल के लिए हवा तेज़ चलती है।)
(दीपक की लौ काँपती है।)
सुनीति (आँखें बंद करके) बोली -
“अब सब ठीक हो जाएगा…”
(कौशिक मंगलसूत्र पहनाता है।)
कौशिक बोला -
“अब तुम सिर्फ़ मेरी नहीं…
मेरी ज़िम्मेदारी हो।”
(सुनीति की आँखों से आँसू छलक जाते हैं।)
पंडित (मुस्कुराकर) बोला -
“अब ये दोनों पति-पत्नी हैं।”
(शंख, तालियाँ, हँसी।)
शादी पूरी हो चुकी थी।
काग़ज़ों में, समाज में, भगवान के सामने।
(सुनीति पीछे मुड़कर मंडप देखती है।)
(उसे अचानक वही पुराना एहसास होता है —
जैसे कोई साया पास खड़ा हो।)
(वो कौशिक का हाथ पकड़ती है।)
सुनीति बोली -
“तुम हो न?”
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“अब हमेशा।”
(कौशिक की परछाईं…
फिर से ज़मीन से हल्की-सी उठी हुई लगती है।)
सात फेरे पूरे हो गए थे…
पर क्या किस्मत के फेरे भी पूरे हुए?
या अदृश्य सच
अभी पूरी तरह विदा नहीं हुआ था?
(कमरा फूलों से सजा है। हल्की रोशनी। खिड़की से चाँदनी अंदर आ रही है।)
(सुनीति और कौशिक पलंग के किनारे बैठे हैं।)
सुनीति (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
“आज सब किसी सपने जैसा लग रहा है।”
कौशिक बोला -
“हाँ… जैसे बहुत कुछ सहने के बाद
ज़िंदगी ने थोड़ा सुकून दिया हो।”
(दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। कोई जल्दबाज़ी नहीं, सिर्फ़ अपनापन।)
(बात करते-करते सुनीति की आँखें भारी होने लगती हैं।)
कौशिक (प्यार से) बोला -
“सो जाओ… आज बहुत थक गई हो।”
(वो सुनीति को अपने सीने में भर लेता है।)
(धीरे-धीरे उसकी पीठ थपथपाने लगता है।)
जिस सीने ने कभी अदृश्य होकर
उसे सहारा दिया था…
आज वही सीना सामने था।
(सुनीति गहरी नींद में चली जाती है।)
(कुछ देर बाद…)
(सुनीति की नींद टूटती है।)
(वो हाथ बढ़ाकर कौशिक को टटोलती है…
लेकिन पास कोई नहीं।)
सुनीति (घबराकर) बोली -
“कौशिक जी…?”
(वो उठकर चारों ओर देखती है।)
कमरा खाली।
बिस्तर ठंडा।
सुनीति (काँपती आवाज़ में) बोली -
“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता…”
(वो कमरे में इधर-उधर ढूँढती है।)
सुनीति (पुकारते हुए) बोली -
“कौशिक जी… कहाँ हो आप?”
(कोई जवाब नहीं।)
(उसकी आँखों से आँसू गिरने लगते हैं।)
शादी की खुशी
एक पल में डर में बदल गई थी।
(सुनीति पलंग पे लेटकर सिसकने लगती है।)
(तभी… वही जाना-पहचाना एहसास।)
(जैसे किसी ने पीछे से
उसे बाहों में भर लिया हो।)
(वो सिहर जाती है।)
(वो गर्म साँसें…
वो धड़कन…
वो अपनापन…)
(सुनीति धीरे-धीरे शांत होती है।)
सुनीति (काँपती पर पहचान भरी आवाज़ में) बोली -
“कौशिक जी…?”
(कमरे में सन्नाटा।)
(फिर वही धीमी, भरोसेमंद आवाज़ उसके कानों में।)
कौशिक (धीरे से) बोला -
“मैं यहीं हूँ, सुनीति…”
(सुनीति की आँखों से आँसू बहते हैं — डर के नहीं, राहत के।)
(सुनीति उसकी बाहों में ही रहती है, पर उसे दिख नहीं पाती।)
सुनीति (डरते हुए) बोली -
“आप… फिर से…?”
कौशिक (दुखी मुस्कान के साथ) बोला -
“शायद… मैं पूरी तरह ठीक नहीं हुआ।”
(हवा हल्की-सी ठंडी हो जाती है।)
(दीपक की लौ काँपती है।)
शादी ने उन्हें बाँध तो दिया था…
पर विज्ञान और किस्मत की डोर
अब भी ढीली थी।
कौशिक
पति था…
साथी था…
पर शायद
पूरी तरह इंसान नहीं।
क्या कौशिक फिर से अदृश्य हो रहा है?
क्या सुनीति इस सच को सह पाएगी?
या प्यार को फिर एक नई लड़ाई लड़नी होगी?
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