(मशीन का भारी दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो जाता है। बाहर की आवाज़ें कट जाती हैं।)
(अंदर—
पूरा अंधेरा। कोई स्क्रीन नहीं, कोई बटन नहीं। सिर्फ़ साँसों की आवाज़।)
ये कोई लैब नहीं थी…ये तो जैसे दृश्य और अदृश्य के बीच का ख़ालीपन था।
(सुनीति अंधेरे में हाथ बढ़ाती है। उंगलियाँ काँप रही हैं।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“कौशिक जी…आप यहीं हो न?”
(कौशिक तुरंत उसे अपनी ओर खींच लेता है।)
कौशिक बोला -
“मैं यहीं हूँ…और कहीं नहीं जाना।”
(वो सुनीति को कसकर सीने से लगा लेता है।)
(दोनों की धड़कनें एक-दूसरे में घुलने लगती हैं।)
(अंधेरे में सिर्फ़ दिलों की आवाज़।)
सुनीति (रोते हुए) बोली -
“अगर ये आख़िरी पल हुए तो?”
कौशिक (माथा उसके सिर से लगाकर) बोला -
“तो भी… मैं इन्हें तुम्हारे साथ जी रहा हूँ।”
(मशीन के अंदर हल्की-सी हिस्स की आवाज़।)
(ऊपर से बहुत हल्की गैस गिरने लगती है, ठंडी, सिहरन भरी।)
सुनीति (सिहरकर) बोली -
“ये शुरू हो गया…”
(कौशिक अपनी बाहों को और कस लेता है।)
कौशिक बोला -
“डरो मत… मुझे छोड़ना मत।”
(सुनीति अपनी आँखें बंद कर लेती है। उसका चेहरा कौशिक की छाती में छुपा है।)
सुनीति बोली -
“अगर हम बदल गए…अगर हम पहले जैसे न रहे…”
कौशिक (धीमी, पक्की आवाज़ में) बोला -
“तो भी पहचान दिल की होगी।”
(वो सुनीति के बालों में उँगलियाँ फेरता है।)
(गैस घनी होने लगती है। अंधेरे में हल्की-हल्की चमक।)
जब शरीर सीमाओं से बाहर जाता है… तो आत्मा यादों को पकड़ लेती है।
(सुनीति के चेहरे पर हल्की मुस्कान।)
सुनीति बोली -
“याद है…पहली बार आप अदृश्य थे और फिर भी मेरे सबसे क़रीब थे?”
कौशिक (हल्की हँसी के साथ) बोले -
“और आज…दिखाई देकर भी हम उसी अंधेरे में हैं।”
(गैस अब चारों ओर है। साँसें भारी होने लगती हैं।)
(कौशिक सुनीति को और ज़ोर से थाम लेता है, जैसे उसे इस दुनिया से बाँध लेना चाहता हो।)
कौशिक (फुसफुसाकर) बोला -
“कुछ भी हो…मुझे छोड़ना मत।”
सुनीति (धीमे स्वर में) बोली -
“अब…कभी नहीं।”
(अंदर पूरी तरह सन्नाटा। केवल साँसों की धीमी लय।)
(अंधेरे में दो दिल एक-दूसरे से चिपके हुए।)
मशीन के भीतर कोई विज्ञान नहीं था… कोई फार्मूला नहीं… सिर्फ़
दो लोग थे—
जो हर हाल में एक-दूसरे को थामे रहना चाहते थे।
(मशीन के बाहर, लैब में सन्नाटा। केवल मशीन की बीप… बीप… की आवाज़।)
(Mr. राणा स्क्रीन पर डेटा देख रहे हैं। उनके माथे पर पसीना।)
Mr. राणा (घबराई आवाज़ में) बोले -
“प्रेशर स्टेबल है… गैस का फ्लो सही है…
हे भगवान… बस काम कर जाए…”
(राधिका दरवाज़े के पास खड़ी है, हाथ जोड़े हुए।)
राधिका (धीरे से) बोली -
“ये सिर्फ़ experiment नहीं है…ये दो ज़िंदगियाँ हैं।”
(पंडित जी आँखें बंद कर मंत्र बुदबुदाते हैं।)
(अंदर, गैस और घनी हो चुकी है।)
(सुनीति की साँसें तेज़ हो जाती हैं।)
सुनीति (काँपती आवाज़ में) बोली -
“कौशिक जी…मुझे कुछ अजीब लग रहा है…”
(वो अपने हाथ देखती है, उंगलियों की रेखाएँ हल्की-हल्की चमकने लगती हैं।)
कौशिक (हैरानी से) बोला -
“सुनीति…तुम्हारा हाथ…”
(वो उसका हाथ पकड़ता है, दोनों के हाथों से एक-सी रोशनी निकलती है।)
(अचानक कौशिक का कंधा हल्का-सा दिखने लगता है,जैसे धुंध से बाहर आ रहा हो।)
सुनीति (हांफते हुए) बोली -
“आप…आप दिख रहे हो…”
कौशिक (आँखें भरकर) बोला -
“और तुम…तुम महसूस हो रही हो…पूरी तरह…”
(अगले ही पल, वो हिस्सा फिर से धुंधला।)
ये वापसी आसान नहीं थी। अदृश्यता जाने को तैयार नहीं थी।
(मशीन के अंदर तेज़ कंपन।)
(सुनीति अचानक सिहरकर कौशिक की बाहों में गिर जाती है।)
कौशिक (घबराकर) बोला -
“सुनीति!
आँखें खोलो!”
सुनीति (कमज़ोर मुस्कान के साथ) बोली -
“डर लग रहा है…पर तुम्हारे पास…कम लग रहा है।”
(कौशिक उसे और कसकर पकड़ लेता है।)
कौशिक बोला -
“तुम्हें कुछ नहीं होगा…मैं हूँ।”
(कंपन के बीच अचानक शांति।)
(दोनों की आँखों के सामने पुरानी यादें, मंदिर, डायरी, हँसी, डर, अदृश्य रातें।)
सुनीति (धीरे) बोली -
“शायद…यही टेस्ट है…”
कौशिक बोला -
“अगर ये हमें अलग कर दे?”
सुनीति (पक्के स्वर में) बोली -
“तो हम फिर मिलेंगे…क्योंकि प्यार कभी अदृश्य नहीं होता।”
(बाहर अचानक तेज़ बीप-बीप!)
Mr. राणा (चौंककर) बोले -
“नहीं… नहीं…ये फेज़ अनस्टेबल हो रहा है!”
(स्क्रीन पर रेड लाइन ऊपर जाती है।)
राधिका (घबराकर) बोली -
“कुछ तो करिए!”
Mr. राणा बोले -
“अगर अब मशीन बंद की…तो सब खत्म!”
(पंडित जी तेज़ स्वर में मंत्र पढ़ते हैं।)
(अंदर गैस का अंतिम फेज़।)
(कौशिक और सुनीति एक-दूसरे की आँखों में देखते हैं।)
कौशिक (धीमे से) बोला -
“जो भी हो…साथ।”
सुनीति (मुस्कुराकर) बोली -
“साथ।”
(दोनों माथे से माथा लगाते हैं। रोशनी तेज़ हो जाती है।)
ये सिर्फ़ दिखने या न दिखने की लड़ाई नहीं थी… ये तय कर रही थी
कि विज्ञान जीतेगा या विश्वास।