नील बिस्तर पर बैठा था।
सामने आईना रखा था।
चेहरे के लाल धब्बे अब गहरे पड़ चुके थे। बायाँ गाल सूज गया था—इतना कि आँख आधी बंद दिखती थी। त्वचा तनी हुई, असमान। पहचान में न आने वाली।
एक हाथ में ड्रिप लगी थी। पारदर्शी द्रव धीरे-धीरे नसों में उतर रहा था।
वह आईने में खुद को देख रहा था।
जैसे किसी और को देख रहा हो।
दरवाज़ा खुला।
दामिनी भीतर आई। पेट अब साफ़ दिखता था। वह धीरे-धीरे चल रही थी।
नील ने तुरंत आईना उठाकर बिस्तर के किनारे फेंक दिया। काँच की हल्की आवाज़ हुई। वह झुककर अस्पताल के बिल पलटने लगा—जैसे वही सबसे ज़रूरी चीज़ हो।
दामिनी मुस्कराई। थकी हुई, पर कोमल।
“पता है, नील,” उसने धीरे कहा, “मैंने प्रिंसिपल सर से बात की है। वो कह रहे थे दो महीने की सैलरी एडवांस मिल जाएगी… पूरे चालीस हज़ार। धीरे-धीरे सारे बिल चुक जाएँगे।”
नील का चेहरा पत्थर-सा हो गया।
“याद है,” उसने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा, “एक बार माउंट-लेक होटल में हमने दो लाख रुपये ऐसे ही उड़ा दिए थे।”
कमरे में चुप्पी भर गई।
दामिनी अंदर से टूट गई। रोना चाहती थी। पर रोई नहीं।
बस एक आँसू चुपचाप गाल पर उतर आया।
वह मुड़ी।
बाथरूम में चली गई।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।
वह बाहर आई—नकली टीचर वाला चश्मा, हल्का-सा बाथरोब। वही पुरानी शरारत की झलक।
“मिस्टर नील,” उसने हल्केपन से कहा, “बड़े शरारती हो गए हो।”
नील ने ऊपर देखा। फीकी हँसी।
“अरे… ये वही सेक्सी-टीचर रोल-प्ले?”
दामिनी उसके पास आई।
उसका पेट हल्का बाहर निकला हुआ था। वह और भी स्नेहिल लग रही थी।
नील बिस्तर से उठा।
उसके करीब आया।
चश्मे के शीशे में उसे अपना चेहरा दिखा—सूजा हुआ, बदसूरत, अपरिचित।
उसने दामिनी को कसकर पकड़ लिया।
और फूट पड़ा।
आवाज़ दबाने की कोशिश नहीं की। बस खुलकर रो रहा था। शायद पहली बार।
दामिनी ने उसे चुप नहीं कराया।
बस बाँहें कस लीं।
यह रोना शायद ज़रूरी था।
–
अगली सुबह
दामिनी की आँख खुली।
बिस्तर का उसका हिस्सा खाली था।
नील नहीं था।
तकिए के पास एक मुड़ा हुआ काग़ज़ रखा था।
दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
काँपते हाथों से उसने काग़ज़ खोला।
उस पर लिखा था—
“मैं तो ख़त्म हो चुका हूँ। पर तुम्हारी और हमारे बच्चे की ख़ुशियों पर मैं और ग्रहण नहीं बनूँगा। मुझे मत ढूँढना।”
दामिनी ने काग़ज़ को दोनों हाथों से थाम लिया।
कमरे में सन्नाटा था।
बाहर सुबह हो चुकी थी।
–
मुंबई
एक पोश इलाके की चौड़ी सड़क पर काली मर्सिडीज आकर रुकी।
ऊँची ग्रिल वाला फाटक।
पत्थर की नक्काशीदार दीवारें।
अंदर फैला हुआ पुराना, शाही-सा बंगला।
एक सिक्योरिटी गार्ड भागता हुआ आया और गाड़ी का दरवाज़ा खोला।
दामिनी धीरे-धीरे उतरी।
एक हाथ अपने उभरे पेट पर।
दूसरे कंधे पर बड़ा बैग।
चेहरा भीगा हुआ—जैसे आँसू अभी-अभी थमे हों।
सफ़ेद दाढ़ी वाला बुज़ुर्ग, घर का पुराना खानसामा, आगे बढ़ा।
“अरे बिटिया, बैग दीजिए हमें।”
दामिनी ने हल्की मुस्कान दी। “कैसे हो, मुरारी अंकल?”
“सब बढ़िया, बेटा। आइए। बड़े साहब अंदर हैं।”
नक्काशीदार भारी दरवाज़ा खुला।
अंदर लकड़ी की पॉलिश की गंध थी। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें। ऊँची छत।
स्टडी के भीतर विश्वजीत सोलंकी बैठे थे।
घने मगर सफ़ेद बाल।
साफ़, चमकदार सफ़ेद कमीज़।
काली ब्रांडेड पतलून।
आँखों में वही ठहराव जो वर्षों की ताक़त से आता है।
दामिनी को देखते ही वे तुरंत उठे।
दो कदम में उसके सामने।
“पापा…” बस इतना कहा दामिनी ने—और बाँहों में ढह गई।
विश्वजीत ने उसे थाम लिया।
मजबूती से।
“बस, बेटा… बस,” उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा। “इस हालत में रोना नहीं। तू मेरी शेरनी है। पूरी दुनिया से लड़ सकती है।”
दामिनी ने खुद को सँभालने की कोशिश की।
विश्वजीत ने नकली गुस्सा दिखाया। “और अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगा। यहीं रहो मेरे पास।”
दामिनी ने उनकी ओर देखा।
“पापा… नील की कोई खबर?”
एक पल के लिए विश्वजीत का चेहरा सख़्त हुआ।
“मैंने आईजी साहब से बात कर ली है,” उन्होंने शांत स्वर में कहा।
“एक पुलिस टीम लगी है। और तुम्हारे देशमुख अंकल ने भी एक प्राइवेट एजेंसी लगा दी है। We will find him.”
फिर वे चुप हो गए।
उन्होंने अपनी बेटी से झूठ बोलना कभी नहीं सीखा था।
उसे सोफ़े पर बैठाया।
धीरे से बोले—
“बेटे… ऐसे मामलों में… जब अड़तालीस घंटे, बहत्तर घंटे यूँ ही निकल जाते हैं… तो मिलने की उम्मीदें कम होती जाती हैं।”
कमरे में सन्नाटा उतर आया।
दामिनी ने सिर उठाया।
आँखें लाल थीं, पर स्थिर।
“नहीं, पापा,” उसने धीमे मगर साफ़ कहा।
“मेरा नील है।
वो कहीं है।
और वो लौटेगा।”
विश्वजीत ने कुछ नहीं कहा।
पर पहली बार उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखी।