Bis Minit - So Mil - Ek Shart - 3 in Hindi Drama by Varun books and stories PDF | बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 3: दामिनी

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बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 3: दामिनी

अपने आलिशान पेंटहाउस के बाहर वे दोनों खड़े थे।

ऊँची काँच की दीवारों वाली वह इमारत दूर से ही अलग दिखती थी। नीचे फैला हुआ सजा-सँवरा लॉन—क़रीने से कटी झाड़ियाँ, समतल घास, बीच में पत्थर की महँगी कलाकृतियाँ, जिन पर हल्की धूप चमक रही थी। दोनों ओर पतले पानी के फव्वारे लगातार उठते और गिरते, जैसे इस जगह को कभी शोर की ज़रूरत ही न रही हो। संगमरमर की चौड़ी सीढ़ियाँ उस लॉबी तक जाती थीं जहाँ हमेशा हल्की ख़ुशबू तैरती रहती थी।

आज वही जगह चुप थी।

नील और दामिनी—

साधारण कपड़ों में। ऐसे, जैसे किसी और की ज़िंदगी पहन ली हो।

घर का कुछ फ़र्नीचर बाहर सड़क के किनारे पर पड़ा था। सोफ़ा, एक छोटी मेज़, दो कुर्सियाँ—जिन पर अब कोई नाम नहीं था।

वकीलों का एक समूह पेंटहाउस के भीतर-बाहर आ-जा रहा था, दीवारें नापता हुआ, काग़ज़ों पर निशान लगाता हुआ। उनकी आवाज़ें सपाट थीं, जैसे वे घर नहीं, आँकड़े देख रहे हों।

पीछे एक काली-पीली टैक्सी आकर रुकी।

दामिनी बिना कुछ कहे उसमें बैठ गई।

नील पीछे डिक्की में सूटकेस रख रहा था—एक, फिर दूसरा। हाथ अपने आप चल रहे थे। तभी बारिश शुरू हो गई। पहले बूँदें, फिर धार।

दामिनी ने आवाज़ दी।

“नील… चलो।”

नील ने नहीं सुना।

वह सामने पड़े फ़र्नीचर को देख रहा था—

बारिश की धारें कुशन में समा रही थीं, लकड़ी गीली हो रही थी। जैसे कोई चीज़ धीरे-धीरे पिघल रही हो।

“नील,” दामिनी ने फिर कहा।

वह मुड़ा। टैक्सी में बैठा। दरवाज़ा बंद हुआ। गाड़ी चल पड़ी।

करीब एक घंटे बाद टैक्सी ने उन्हें एक पगडंडी के किनारे छोड़ दिया था, आगे का रास्ता कच्चा था।

कुछ देर चलने के बाद वे दोनों छोटे मकानों की एक भूलभुलैया के बीच गलियों में से चलते जा रहे थे। घरों के नंबर और नाम मन ही मन पढ़ते हुए।

कच्ची सड़क।

पानी से भरे गड्ढे।

नील के हाथों में सूटकेस।

दामिनी के हाथ में एक बैग।

कुछ मिनट बाद उनकी मंज़िल आई।

एक सँकरी गली के आख़िर में एक मटमैला-सा घर था। सीढ़ियाँ संकरी। दीवारों पर सीलन। भीतर हल्की-सी रोशनी।

नील अंदर रुका।

कमरा छोटा था।

एक पलंग।

एक अलमारी।

एक खिड़की—जिससे बाहर कुछ नहीं दिखता था।

नील की आँखें भर आईं।

पीछे से दामिनी ने उसे थाम लिया।

एक पल के लिए।

नील ने साँस खींची—और आँसू वापस दबा लिए।

दो हफ्ते बाद

एक सरकारी स्कूल का दफ़्तर छोटा था।

दामिनी साड़ी पहने, फ़ाइलें दबाए खड़ी थी।

सामने बैठे स्कूल के प्रिंसिपल ने चश्मे के ऊपर से देखा।

“सोलंकी साहब की सिफारिश लेकर आई हैं आप, तो हम मना नहीं कर सकते। आपकी जान-पहचान के हैं?”

“जी… वो मेरे पापा हैं—” दामिनी एक पल को ठिठकी। गला हल्का-सा भर आया। “मेरे पापा… उनके पास काम करते थे।”

“अच्छा अच्छा,” प्रिंसिपल ने फ़ाइल के पन्ने पलटे। “पाँच साल पहले टीचर थीं आप। काफ़ी लंबा गैप है।”

दामिनी ने बोलने की कोशिश की। “जी, वो—”

“कोई नहीं,” वह बीच में बोला। “पाँचवीं क्लास पढ़ानी होगी।”

एक पल रुका।

“ऑन पेपर हम चालीस हज़ार का साइन करवा लेंगे… पर बीस हज़ार से ज़्यादा नहीं दे सकते।”

दामिनी ने बिना रुके सिर हिलाया। “ठीक है।”

कुछ हफ़्तों बाद

डॉक्टर का कमरा साफ़ था। ठंडा।

दामिनी टेबल पर लेटी थी। पेट हल्का-सा बाहर निकला हुआ। अल्ट्रासाउंड स्क्रीन पर धुंधली-सी आकृति हिल रही थी।

दामिनी मुस्करा रही थी।

“देखो,” उसने नील को पुकारा।

“बेबी हिल रहा है।”

नील एक तरफ़ देख रहा था—खोया हुआ।

“नील?” दामिनी ने कहा।

आवाज़ में हल्का-सा दर्द।

वह मुड़ा।

फीकी-सी मुस्कान।

दामिनी की आँखें भर आईं।

कुछ दिन बाद

घर में शाम उतर आई थी।

दामिनी के स्कूल में एक फ़ंक्शन था, उसे देर होने वाली थी।

नील अपने घर में फर्श पर बैठा था। हाथ में सस्ती शराब की बोतल। ढक्कन पहले ही खुला हुआ।

दाढ़ी बढ़ चुकी थी।

बाल बिखरे हुए।

सुबह का बना खाना उसने छुआ भी नहीं था।

वह फोन पर पुरानी तस्वीरें स्क्रॉल कर रहा था—

ट्रैक।

हेलमेट।

शैंपेन।

एक-एक करके।

बोतल का स्तर नीचे जाता गया।

कमरे में सिर्फ़ स्क्रीन की रोशनी थी।

और बाहर बारिश की आवाज़।

नील को सिर में हल्का-सा दर्द महसूस हुआ।

उसने पास की दराज़ में हाथ डाला।

एक पेन-किलर का पत्ता मिला।

दो-तीन गोलियाँ निकालकर निगल लीं।

सरदर्द से फट रहा था।

दो गोलियाँ और खा लीं।

फिर पैकेट पर नज़र गई।

यह पेन-किलर नहीं थी।

उसने शराब के कुछ और घूँट लिए।

पेट में तेज़ गुड़गुड़ हुई।

वह बाथरूम की तरफ़ भागा और वॉशबेसिन में उलटी कर दी।

चेहरे पर जलन-सी महसूस हुई।

उसने आईने में देखा—

गालों और माथे पर लाल-सा रिएक्शन उभर आया था।