Bis Minit - So Mil - Ek Shart - 2 in Hindi Drama by Varun books and stories PDF | बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 2: डेथ ब्रिज

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बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 2: डेथ ब्रिज

रेस से दो हफ्ते बाद

नील एक इमारत के सबसे ऊपरी माले पर, छज्जे के किनारे पर खड़ा था।

नीचे शहर फैला था—लाइटों का जाल, कारों की रेंगती हुई रेखाएँ, और बीच-बीच में हवा का सन्नाटा।

उसकी आँखों में आँसू थे, चेहरा पसीने से भरा। बाल बिखरे हुए। कोट एक ओर फेंका पड़ा था। टाई ढीली। एक पैर किनारे से आगे निकला हुआ—जैसे शरीर अब दिमाग़ से आगे निकल गया हो।

उसने नीचे देखा।

और फिर—

दो घंटे पहले

पार्टी रोशनी और शोर से भरी थी। ग्लास टकरा रहे थे। कैमरे घूम रहे थे। संगीत इतना ऊँचा कि बातचीत इशारों में बदल जाए।

दामिनी सोफ़े पर बैठी थी, एक हाथ सिर पर रखे।

“नील… मुझे ठीक नहीं लग रहा,” उसने धीमे कहा। “शायद हल्का बुख़ार है।”

नील तुरंत झुका।

“चलो, चलते हैं।”

इंद्राणी बीच में आ गई। मुस्कान वही, आवाज़ हल्की।

“अरे ऐसे कैसे? मेरे स्पेशल गेस्ट्स आए हैं। और फिर—डेथ ब्रिज भी है।”

दामिनी मुस्कराई, जैसे बात टालनी हो।

“You continue,” उसने कहा। “ड्राइवर मुझे घर छोड़ देगा।”

नील ने उसकी आँखों में देखा।

“Are you sure?”

दामिनी ने उसके गाल पर हल्का-सा किस किया, पर्स उठाया और उठ खड़ी हुई।

“Don’t be late,” उसने कहा—और चली गई।

इंद्राणी ने आँख से इशारा किया।

नील ने उसका पीछा किया।

अंदर का कमरा अलग था—रोशनी कम, हवा भारी।

बीच में एक बड़ी मेज़। उस पर सिक्कों के ढेर, चिप्स की ऊँची स्टैक्स और बिखरे हुए ताश के पत्ते। चारों तरफ़ चेहरे—बड़े कारोबारी, एक राजनेता, और एंटोन स्टैंकोव, जिसे नील ने पिछली बार हराया था।

खेल भी वही चल रहा था—डेथ ब्रिज का।

डेथ ब्रिज साधारण ताश का खेल नहीं था।

इसमें पत्ते कम मायने रखते थे, नसें ज़्यादा।

इस खेल में जीतने वाला अक्सर वह नहीं होता था जिसके पास अच्छे पत्ते हों।

जीतता वही था जो आख़िरी सेकंड तक सामने वाले को ब्लफ करता रहे और यकीन दिला दे कि वह डूबने को तैयार है।

नील को आते देख एंटोन मुस्कराया।

“It’s a big game, Neel. इस बार लाखों नहीं, करोड़ों की बाज़ी है। अगर डर रहे हो तो अभी भी मुड़ सकते हो।”

नील ने कोट का बटन खोलते हुए कुर्सी खींची।

“नील वरदराजन डरता नहीं, सिर्फ़ जीतता है।”

एक ड्रिंक सामने रखी गई।

ग्लास के तल में कुछ सफ़ेद-सा धीरे-धीरे घुल रहा था।

नील ने ध्यान नहीं दिया।

एक बड़ा घूँट लिया।

सफ़ेद दस्ताने पहने, और कोट-पैंट में सजे डीलर ने अपना परिचय दिया, खेल के नियम बताए और पत्ते बाँट दिए।

कुछ समय बीता।

नील की हँसी धीमी हुई।

नज़रें गहरी हो गईं।

कुछ बाजियों के बाद उसने अपनी महँगी घड़ी मेज़ पर रख दी थी।

डीलर ने अगले राउंड के पत्ते बाँटे।

हल्के कपड़े पहनी वेट्रेस नील के लिए एक और ड्रिंक ले आई, और नील के सामने झुकी।

नील ने आँखें मलीं और फिर खेलने लगा।

कुछ देर बाद उसकी कार की चाबियाँ दाँव पर लगी थीं।

चेहरे पर शिकनें उभर आई थीं।

डीलर ने अगला राउंड चलाया।

पत्ते फिर बाँटे गए। देखे गए।

नील ने ज़ोर से मेज़ पर हाथ मारा।

एंटोन ने दाँतों के बीच लकड़ी की पतली स्टिक घुमाई—बिना कुछ कहे।

उसे बोलने की ज़रूरत नहीं थी। खेल वही चला रहा था।

कभी-कभी हार शोर नहीं करती।

खेल आगे बढ़ता गया।

आख़िर में नील मेज़ पर सिर पकड़े बैठा था।

कमरा खाली हो चुका था।

एंटोन हँसते हुए सारे चिप्स समेट रहा था।

नील कुछ बुदबुदाया—शब्द टूटे हुए थे।

पीछे से इंद्राणी आई। “अरे ब्रदर, क्या हुआ?”

नील ने ऊपर देखा। “मेरा पेंटहाउस… सारा बैंक बैलेंस… मेरी कार्स,” उसकी आवाज़ बैठ गई। “सब… मैं पागल हो गया था, इंद्राणी। सब हार गया।”

इंद्राणी ने डीलर की ओर देखा। वह हल्के-से मुस्कराया।

इंद्राणी की आँखें चमकीं। फिर उसने दुखी चेहरा बना लिया।

“कोई बात नहीं,” उसने कहा। “बैड लक, ब्रदर। तुम घर जाओ। फिर कभी।”

नील ने हाथ बढ़ाया। “थोड़ा उधार… मैं अब भी जीत सकता हूँ।”

इंद्राणी का चेहरा बदल गया। “तुझे उधार कौन देगा, कंगले?” उसने कड़े स्वर में कहा। “चल निकल। बाहर से ऑटो पकड़।”

नील स्तब्ध रह गया। “इंद्राणी? तुमने… ये गेम मुझे फँसाने के लिए—”

एंटोन छाती चौड़ी कर खड़ा हो गया।

इंद्राणी ने उसकी कमर में हाथ डाल लिया। “क्या रे?” उसने कहा। “डैड की वसीयत में मुझे एक फूटी कौड़ी नहीं मिली थी। जो ज़िल्लत मुझे उस वक़्त महसूस हुई थी—आज तुझे महसूस हो रही है।”

नील की आँखें फैल गईं।

“डैड की जायदाद?” उसने कहा। “एक बार… एक बार माँग लेती, मैं ख़ुशी से आधा दे देता।”

“चुप!” इंद्राणी चीखी। चेहरा लाल था, नथुने गुस्से से फूले हुए।

“मैं भिखारिन नहीं हूँ, जो माँगती फिरूँ,” उसने दाँत भींचकर कहा। “अपना हक़ छीनकर लिया है मैंने।”

उसने इशारा किया।

“कल सुबह तक पेंटहाउस खाली चाहिए। बाउंसर्स—इसे बाहर निकालो।”

नील धीमे क़दमों से बाहर निकल गया।

दरवाज़ा बंद हुआ।

इंद्राणी वहीं खड़ी रही। आँखें अब भी जल रही थीं। जबड़ा काँप रहा था। और तभी—ज़हन में एक पुरानी तस्वीर कौंधी।

एक छोटी-सी लड़की। हाथ में गुड़िया। बिस्तर पर बीमार माँ।

“मम्मी, पापा क्यों चले गए?” नन्ही इंद्राणी ने पूछा था।

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा था।

“बेटी… उनका एक और परिवार भी है। तुम्हारा भाई नील भी है।”

“मेरा कोई भाई नहीं है!”

गुड़िया ज़मीन पर गिरी थी।

वह ज़मीन पर बैठकर रोने लगी थी। “मुझे पापा चाहिए…”

इंद्राणी वर्तमान में लौटी। पीछे चलता हल्का क्लब म्यूजिक, बगल में खड़ा एंटोन।

गालों पर उतरते आँसुओं को झटके से पोंछ दिया।

धीमे से बुदबुदाई—“मेरा कोई भाई नहीं है।”

थोड़ी देर बाद, उसी इमारत की टॉप फ़्लोर पर

नील बिल्कुल किनारे खड़ा था।

नीचे शहर था।

ऊपर आसमान।

हवा ने उसके चेहरे से पसीना पोंछ दिया—जैसे आख़िरी मदद।

उसने आँखें बंद कीं।

और एक क़दम आगे बढ़ा।

उसका एक पैर अब किनारे से आगे था।

फोन उसकी जेब में काँपा।

एक बार।

फिर दूसरी बार।

उसने अनसुना करने की कोशिश की—लेकिन कंपन रुक नहीं रहा था।

नील छज्जे से पीछे हटा और काँपते हाथों से फोन निकाला।

स्क्रीन पर नाम चमका—दामिनी।

उसकी छाती जैसे सिकुड़ गई।

फोन कान तक ले गया।

आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।

गला सूख गया था।

कई सेकंड बाद, उसने किसी तरह कहा—

“ह… हेलो।”

उधर से दामिनी की आवाज़ आई—हल्की हाँफती हुई, खुशी से भरी हुई।

“नील,” उसने कहा, “जल्दी घर आ जाओ।”

नील ने आँखें बंद कर लीं।

हवा तेज़ हो गई थी।

“खुशख़बरी है,” दामिनी बोली।

एक पल रुकी—जैसे शब्द खुद भी मुस्करा रहे हों।

“I am pregnant.”

नील का हाथ ढीला पड़ गया।

फोन अभी भी कान से लगा था, पर शब्द दूर चले गए।

उसके सामने शहर धुँधला हो गया।

लाइटें फैल गईं—जैसे आँखों में पानी भर आया हो।

“नील? नील, सुन रहे हो?”

उसने जवाब नहीं दिया।

फोन धीरे-धीरे नीचे सरक गया।

कॉल कब कट गई—उसे पता भी नहीं चला।

नील दीवार की तरफ़ एक कदम चला।

फिर दूसरा।

और फिर वहीं बैठ गया—एक कोने में सिमटता हुआ।

घुटनों को सीने से लगाए।

सिर झुका हुआ।

पहले आवाज़ नहीं निकली।

सिर्फ़ कंधे हिलते रहे।

फिर जैसे कोई बाँध टूट गया।

नील फूट-फूट कर रो पड़ा।

उसके आँसुओं में न हार थी, न ग़ुस्सा—सिर्फ़ एक डर था।

वह अंदर से मर-सा चुका था, पर किस्मत उसे मरने की इजाज़त नहीं दे रही थी—अभी तो नहीं।