भाग 1: अनजान राहें
इलाहाबाद के पास एक छोटा सा गाँव था—मुरारीपुर। कहने को तो यह गाँव था, लेकिन यहाँ की हवाओं में एक अजीब सी भारीपन और सन्नाटा था। समीर, एक शहर का पढ़ा-लिखा लड़का और पेशे से आर्किटेक्ट, अपने पुराने पारिवारिक इतिहास को खोजने इस गाँव आया था। उसे पता चला था कि उसके परदादा की एक पुरानी हवेली यहाँ खंडहर बनी खड़ी है।
गाँव के चाय वाले, बूढ़े काका ने जब समीर को हवेली जाते देखा, तो टोक दिया— "बेटा, सूरज ढलने से पहले लौट आना। उस हवेली की दीवारों के भी कान नहीं, बल्कि रूहें होती हैं।"
समीर हँस पड़ा। "काका, यह सब पुरानी बातें हैं। मैं बस कुछ तस्वीरें लेने जा रहा हूँ।"
भाग 2: हवेली का साया
जैसे ही समीर हवेली के पास पहुँचा, उसे अपनी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन महसूस हुई। हवेली एक विशाल पत्थर की इमारत थी, जिस पर जंगली बेलों ने अपना जाल बिछा रखा था। मुख्य द्वार की कुंडी जंग खाई हुई थी, और जैसे ही उसने उसे छुआ, वह खुद-ब-खुद चरमराते हुए खुल गई।
अंदर का नजारा डरावना था। फर्श पर धूल की मोटी परत थी, और छत से मकड़ियों के जाले झूल रहे थे। समीर ने अपना कैमरा निकाला और तस्वीरें लेनी शुरू कीं। अचानक, ऊपर की मंजिल से किसी के चलने की आहट आई।
'टप... टप... टप...'
जैसे कोई नंगे पाँव गीले फर्श पर चल रहा हो। समीर रुक गया। "कोई है?" उसने पूछा। जवाब में सिर्फ सन्नाटा मिला।
भाग 3: दर्पण का रहस्य
समीर सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर के कमरे में गया। वहाँ एक बहुत बड़ा आदमकद आईना लगा था। धूल जमने के बावजूद वह आईना चमक रहा था। जब समीर उसके सामने खड़ा हुआ, तो उसे अपनी परछाई के पीछे कुछ और भी दिखाई दिया।
एक धुंधली सी आकृति, जिसके बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे और उसकी आँखें कोयले की तरह काली थीं। समीर ने झटके से पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। जब उसने वापस आईने में देखा, तो वह आकृति अब उसके ठीक बगल में खड़ी थी और उसका हाथ समीर के कंधे की ओर बढ़ रहा था।
समीर की धड़कनें तेज हो गईं। उसने खुद को समझाया— "यह सिर्फ रोशनी का खेल है।" लेकिन तभी कमरे का तापमान अचानक गिर गया। उसकी सांसें भाप बनकर निकलने लगीं।
भाग 4: बंद दरवाज़ा
समीर भागकर नीचे जाना चाहता था, लेकिन अचानक कमरे का भारी दरवाजा खुद-ब-खुद बंद हो गया। उसने उसे खोलने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। कमरे के कोने से एक धीमी सी आवाज़ आई— "तुम वापस क्यों आए? क्या तुम्हें यहाँ का कर्ज चुकाना है?"
समीर ने अपना टॉर्च उस कोने की ओर घुमाया। वहाँ एक बूढ़ी औरत बैठी थी, जिसकी त्वचा पीली पड़ चुकी थी और उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं। वह अपनी हड्डियों जैसे हाथों से कुछ बुन रही थी।
"यह घर उन लोगों का है जो कभी मरे ही नहीं," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
भाग 5: जलता हुआ सच
समीर ने देखा कि वह औरत जो बुन रही थी, वह एक कफ़न था, और उस पर समीर का ही नाम लिखा था। घबराहट में समीर ने कमरे की खिड़की का शीशा तोड़ने की कोशिश की। तभी उसे एहसास हुआ कि हवेली की दीवारों से खून रिसने लगा है। पुरानी तस्वीरों में चेहरे अब समीर की तरफ मुड़कर देख रहे थे और उनके चेहरे पर एक भयावह मुस्कान थी।
उसे याद आया कि उसके बैग में एक पुरानी माचिस थी। उसने एक तीली जलाई। जैसे ही रोशनी फैली, वह बूढ़ी औरत चिल्लाई और धुएँ में गायब हो गई। समीर ने समझ लिया कि ये साये रोशनी से डरते हैं।
उसने पास पड़े पुराने पर्दों में आग लगा दी। आग की लपटें जैसे ही बढ़ीं, हवेली के अंदर से भयानक चीखें सुनाई देने लगीं। समीर ने अपनी पूरी ताकत लगाकर दरवाजे पर लात मारी और वह खुल गया।
भाग 6: पलायन
समीर बिना पीछे मुड़े भागता रहा। जब वह गाँव की सीमा पर पहुँचा, तो सूरज पूरी तरह ढल चुका था। उसने पीछे मुड़कर देखा, हवेली आग की लपटों में घिरी हुई थी, लेकिन उन लपटों के बीच उसे वही आदमकद आईना साफ दिखाई दे रहा था। आईने के भीतर वह खुद को खड़ा देख रहा था, जो जल नहीं रहा था, बल्कि उसे हाथ हिलाकर विदा कर रहा था।
अगले दिन जब गाँव वाले वहाँ पहुँचे, तो वहाँ हवेली का कोई नामोनिशान नहीं था। वहाँ सिर्फ खाली जमीन थी, जैसे वहाँ कभी कुछ था ही नहीं। समीर के पास उस रात की याद के तौर पर सिर्फ उसका कैमरा बचा था। जब उसने बाद में कैमरे की चिप चेक की, तो उसमें कोई फोटो नहीं थी—सिर्फ काली तस्वीरें और एक आखिरी तस्वीर, जिसमें समीर के कंधे पर एक सफेद हाथ साफ दिखाई दे रहा था।