नीलगिरी की हवेली: एक खौफनाक दास्तान
हिमाचल की वादियों में बसा एक छोटा सा गाँव, जहाँ धुंध इतनी गहरी होती थी कि हाथ को हाथ सुझाई न दे। उसी गाँव के छोर पर स्थित थी—नीलगिरी हवेली। गाँव वालों का मानना था कि उस हवेली की दीवारों में रूहें बसती हैं। सालों से वह हवेली बंद थी, उसके गेट पर लगे जंग खाए ताले इस बात की गवाही देते थे कि वहाँ इंसानों का नहीं, बल्कि सायों का बसेरा है।
आर्यन, जो एक मशहूर 'पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर' (पिशाच अन्वेषक) था, अपने दो दोस्तों—समीर और रिया—के साथ वहाँ पहुँचा। आर्यन को पुरानी और डरावनी जगहों का सच सामने लाने का जुनून था। वह किंवदंतियों पर यकीन नहीं करता था, उसे सबूत चाहिए थे।
"क्या तुम्हें वाकई लगता है कि यहाँ कुछ मिलेगा?" समीर ने हवेली के टूटे-फूटे फाटकों को देखते हुए पूछा। उसकी आवाज में हल्की घबराहट थी।
रिया ने अपना कैमरा सेट करते हुए कहा, "लोग कहते हैं कि यहाँ आधी रात को नाचने की आवाजें आती हैं। अगर यह सच है, तो हमारे पास आज तक का सबसे बेहतरीन फुटेज होगा।"
हवेली में प्रवेश
जैसे ही आर्यन ने ताला तोड़ा, एक भारी आवाज के साथ दरवाजा खुला। अंदर की हवा ठंडी और भारी थी, जैसे किसी ने सालों से साँस न ली हो। दीवारों पर लगी पुरानी पेंटिंग्स की आँखें मानो उनका पीछा कर रही थीं।
हवेली के बीचों-बीच एक विशाल झूमर लटका था, जो बिना हवा के भी धीरे-धीरे हिल रहा था। फर्श पर धूल की मोटी परत थी, लेकिन अजीब बात यह थी कि उस धूल पर नंगे पैरों के ताजे निशान बने हुए थे।
"ये निशान किसके हैं?" रिया ने फुसफुसाते हुए पूछा।
आर्यन ने टॉर्च की रोशनी उन निशानों पर डाली। वे निशान मुख्य हॉल से होकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे। "शायद कोई और भी यहाँ है," आर्यन ने शांत रहने की कोशिश करते हुए कहा, लेकिन उसके दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी।
पहली डरावनी रात
रात के करीब 12 बज रहे थे। तीनों ने हवेली के बड़े हॉल में अपना डेरा जमाया। अचानक, ऊपर की मंजिल से किसी के चलने की आवाज आई। ठक... ठक... ठक... जैसे कोई लकड़ी की सैंडल पहनकर टहल रहा हो।
समीर ने कांपते हुए कहा, "मैंने सुना था कि इस हवेली की मालकिन, सुमित्रा देवी, एक नर्तकी थीं। उनकी मौत रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई थी। कहते हैं उनकी रूह आज भी अपने आखिरी नृत्य को पूरा करने की कोशिश कर रही है।"
तभी, पूरे हॉल का तापमान अचानक गिर गया। आर्यन के पास रखे EMF मीटर (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड मीटर) की सुई पागलों की तरह नाचने लगी।
"वह यहाँ है," आर्यन ने धीमी आवाज में कहा।
अचानक, एक मधुर लेकिन दर्द भरी धुन सुनाई देने लगी। यह घुंघरूओं की आवाज थी। छन-छन... छन-छन... आवाज धीरे-धीरे उनके करीब आ रही थी। रिया ने कैमरा घुमाया, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ धुंधला सा साया दिखाई दे रहा था।
रूह का सामना
सीढ़ियों के पास एक परछाई उभरी। वह एक औरत थी, जिसने लाल रंग की फटी हुई साड़ी पहनी थी। उसका चेहरा बालों से ढका था, लेकिन उसकी आँखों से निकलता हुआ सफेद प्रकाश रोंगटे खड़े कर देने वाला था।
वह धीरे-धीरे नाचने लगी। उसके पैरों की हरकतें इतनी तेज थीं कि इंसानी आंखों के लिए उसे देख पाना मुश्किल था। नाचते-नाचते वह समीर के पास आई और रुक गई। समीर की चीख निकल गई, लेकिन उसके गले से आवाज नहीं निकली। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसका गला घोंट दिया हो।
आर्यन ने अपनी जेब से पवित्र जल निकाला और उस पर छिड़का। जैसे ही जल उस साये को लगा, एक भयानक चीख पूरे कमरे में गूँज उठी। वह साया गायब हो गया, लेकिन दीवार पर खून से लिखा हुआ एक संदेश उभर आया:
"मेरा संगीत अधूरा है... इसे पूरा करना होगा।"
हवेली का काला रहस्य
अगली सुबह, आर्यन ने गाँव के एक बुजुर्ग से संपर्क किया। बुजुर्ग ने बताया कि सुमित्रा देवी को हवेली के ही एक गुप्त तहखाने में उनके पति ने जिंदा चुनवा दिया था क्योंकि उन्हें उनका नृत्य करना पसंद नहीं था। मरने से पहले सुमित्रा ने कसम खाई थी कि जब तक वह अपना आखिरी नृत्य पूरा नहीं कर लेतीं, वह किसी को चैन से नहीं रहने देंगी।
आर्यन को समझ आ गया कि सुमित्रा की आत्मा को शांति दिलाने के लिए उसे वह तहखाना ढूँढना होगा।
शाम होते ही वे फिर हवेली लौटे। तहखाने का रास्ता रसोई के पीछे एक छिपे हुए दरवाजे से होकर जाता था। जैसे ही वे नीचे उतरे, उन्हें हड्डियों के ढेर और सड़े हुए कपड़ों के अवशेष मिले। वहाँ एक पुरानी ग्रामोफोन मशीन रखी थी।
अंतिम नृत्य
रात के 12 बजते ही सुमित्रा की रूह फिर प्रकट हुई। इस बार वह और भी भयानक दिख रही थी। उसके चेहरे का मांस गल चुका था। उसने आर्यन की तरफ इशारा किया।
आर्यन ने हिम्मत जुटाई और ग्रामोफोन की सुई को रिकॉर्ड पर रखा। जैसे ही संगीत बजा, सुमित्रा ने नाचना शुरू किया। वह नाच नहीं था, वह एक तड़प थी। वह तब तक नाचती रही जब तक कि रिकॉर्ड खत्म नहीं हो गया।
जैसे ही संगीत रुका, सुमित्रा के चेहरे पर एक अजीब सी शांति आ गई। उसने आर्यन की तरफ देखा और एक हल्की मुस्कान के साथ धुएं में विलीन हो गई। हवेली की वह भारी हवा अब हल्की हो चुकी थी।
निष्कर्ष
आर्यन और उसके दोस्त सुबह होते ही वहाँ से निकल गए। उन्होंने वह फुटेज कभी सार्वजनिक नहीं की, क्योंकि उन्हें लगा कि कुछ राज दफन ही अच्छे होते हैं। नीलगिरी की हवेली आज भी वहीं खड़ी है, लेकिन अब वहाँ से घुंघरूओं की आवाज नहीं आती। बस कभी-कभी हवाओं में एक उदास धुन सुनाई देती है।