love buried in ashes in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | राख में दबी मोहब्बत

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राख में दबी मोहब्बत

राख में दबी मोहब्बत

पटना की पुरानी गलियों में बसी एक छोटी-सी कोठी थी, जहाँ हवा हमेशा उदास लगती। शाम ढलते ही सूरज की किरणें खिड़की से आकर फर्श पर लंबी-लंबी परछाइयाँ डालतीं, मानो कोई अनदेखा मेहमान चुपके से आ धमका हो। इस कोठी में रहती थी नेहा – एक 28 साल की लड़की, जिसकी आँखों में हमेशा एक खालीपन तैरता रहता। उसके कमरे का कोना एक पुरानी लकड़ी की मेज़ से सजा था, जिस पर सैकड़ों ख़त बिखरे पड़े थे। हर ख़त अधूरा था, हर ख़त में वही नाम – 'अर्जुन'।नेहा हर महीने एक ख़त लिखती। पहला ख़त लिखा था तीन साल पहले, जब अर्जुन की मौत की खबर मिली थी। वो हादसा था – पटना के उस पुल पर, जहाँ गंगा की लहरें चैन से बह रही थीं। अर्जुन, नेहा का कॉलेज का प्रेमी, मोटरसाइकिल से तेज़ी से आ रहा था। बारिश हो रही थी, सड़क फिसलन भरी। एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। डॉक्टरों ने कहा, 'इंस्टेंट डेथ'। नेहा को यकीन नहीं हुआ। वो अस्पताल पहुँची, तो अर्जुन का चेहरा शांत था, जैसे सो रहा हो। लेकिन नेहा जानती थी, वो कभी जागेगा नहीं।उस रात नेहा ने पहला ख़त लिखा। "अर्जुन, आज तुम्हारे बिना पहली रात है। मैं सो नहीं पा रही। तुम्हारी वो हँसी याद आ रही है, जब हम बिहार विश्वविद्यालय के लॉन में बैठे चाय पीते थे। तुम कहते थे, 'नेहा, हमारी शादी पटना के मंदिर में होगी। गंगा जी गवाह बनेंगी।' लेकिन अब? मैं अकेली हूँ।" ख़त खत्म नहीं हुआ। नेहा ने उसे मोड़ लिया और अलमारी में रख दिया। भेजा नहीं। क्योंकि जिसे पढ़ना था, वो अब इस दुनिया में नहीं था।दिन बीतते गए। नेहा की माँ, कमला देवी, एक विधवा थीं। पति की मौत के बाद उन्होंने नेहा को संभाला था। लेकिन अब वो चिंतित रहतीं। नेहा नौकरी करती – एक स्कूल में टीचर। लेकिन शाम होते ही वो कमरे में बंद हो जाती। कमरे के कोने में अर्जुन की तस्वीर रखी थी – ब्लैक एंड व्हाइट, जिसमें वो मुस्कुरा रहा था। नेहा रोज़ उस तस्वीर से बातें करती। "आज बहुत कुछ कहना था तुमसे, अर्जुन। स्कूल में बच्चे पूछते हैं, 'मैम, आप उदास क्यों रहती हैं?' मैं मुस्कुरा देती हूँ, लेकिन आँसू रोक नहीं पाती। तुम्हारे बिना ये ज़िंदगी अधूरी लगती है।"हर महीने की अमावस्या को नेहा ख़त लिखती। दूसरा ख़त: "अर्जुन, आज तुम्हारा जन्मदिन है। मैंने केक बनाया, लेकिन अकेले काटा। याद है, तुम चॉकलेट केक पसंद करते थे। मैंने मोमबत्ती जलाई, और बोला – 'हैप्पी बर्थडे, माय लव।' लेकिन तुम कहाँ?" तीसरा: "बारिश हो रही है। हम गंगा घाट पर घूमने जाते थे। तुम्हारा हाथ थामे चलना... वो स्पर्श अब भी महसूस होता है।" चौथा: "माँ कहती हैं, शादी कर लो। लेकिन अर्जुन, तुम्हारे बिना कौन?"समय के साथ ख़तों की संख्या बढ़ती गई। 36 ख़त हो गए। हर एक में नेहा का दर्द गहराता जाता। रातें अनिद्रा भरी। कभी-कभी सपने आते – अर्जुन आता, हाथ बढ़ाता, लेकिन छूते ही गायब हो जाता। एक रात, अमावस्या की काली रात में, कुछ अजीब हुआ। नेहा ख़त लिख रही थी। "अर्जुन, आज गंगा किनारे एक छाया दिखी। तुम्हारी तरह लगी। क्या तुम आते हो मुझे मिलने?" तभी कमरे की लाइट झिलमिलाई। हवा चली, तस्वीर हिली। नेहा ने देखा – तस्वीर में अर्जुन की आँखें चमक रही थीं। वो चीखी, "अर्जुन!" लेकिन कुछ नहीं। सिर्फ हवा का शोर। नेहा ने सोचा, शायद भ्रम है। लेकिन उसके बाद supernatural घटनाएँ शुरू हो गईं।रोज़ रात को दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आती। नेहा जागती, दरवाज़ा खोलती – कोई नहीं। अलमारी से ख़तों के पन्ने सरसराने लगे। एक रात, नेहा ने देखा – कमरे में धुंधला साया। अर्जुन जैसा। वो बोला, "नेहा... मुझे छोड़ दो..." आवाज़ हवा में घुल गई। नेहा डर गई, लेकिन खुश भी। "तुम हो? लौट आए?" साया गायब। अगली सुबह, तस्वीर पर पानी की बूँदें थीं, जैसे आँसू। नेहा ने माँ को बताया, लेकिन कमला देवी ने टाला। "भ्रम है, बेटी। भूल जा।"कमला देवी परेशान थीं। पड़ोसियों की बातें सुन-सुनकर। "तेरी बेटी पागल हो गई है। भूत-प्रेत की बातें करती है। शादी करा दे।" एक दिन उन्होंने फैसला लिया। नेहा स्कूल गई थी। कमला देवी ने कमरा साफ़ किया। अलमारी खोली – ख़तों का ढेर। उन्होंने सब इकट्ठा किया, आँगन में आग जलाई। एक-एक ख़त जलाया। "ज़िंदगी आगे बढ़ानी होती है, नेहा। ये अर्जुन अब नहीं रहा। तू जी।" आग की लपटें चलीं। कागज़ जलते हुए नेहा के शब्द हवा में उड़ गए। "अर्जुन... अगर तुम ज़िंदा होते..."नेहा शाम को लौटी। कमरा सूना। तस्वीर वैसी ही, लेकिन अलमारी खाली। "माँ, मेरे ख़त?" कमला देवी बोलीं, "जला दिए। अब ये सब भूल जा। कल रिश्ता आ रहा है।" नेहा चुप रही। आँखों में आग। लेकिन बोली कुछ नहीं। रात हुई। घर शांत। नेहा कमरे में बैठी। कलम उठाई। आख़िरी ख़त लिखा। "अर्जुन, आज माँ ने सब जला दिया। मेरी सारी बातें, हमारी सारी यादें। अगर तुम ज़िंदा होते, तो शायद मैं भी जी रही होती। अब मैं थक गई। तुम्हारे बिना ये दुनिया बोझ है। कल से मैं कुछ लिखूँगी नहीं। शायद कभी बोलूँगी भी नहीं। अलविदा, माय लव।"ख़त लिखा, मोड़ा। तस्वीर के पास रखा। बत्ती बुझाई। नींद नहीं आई। बाहर हवा जोरों से चली। कमला देवी जागीं। उन्हें लगा, कोई रो रहा है। नेहा के कमरे की ओर गईं। दरवाज़ा खटखटाया। "नेहा?" अंदर से कोई जवाब नहीं। धक्का दिया – खुला। कमरा अंधेरा। सिर्फ कोने में तस्वीर चमक रही। नेहा बिस्तर पर लेटी, आँखें बंद। लेकिन साँस नहीं चल रही। पास में वो आख़िरी ख़त। कमला देवी चीखीं। पड़ोसी आए। डॉक्टर बुलाया। "हार्ट अटैक। स्ट्रेस से।"सुबह हुई। कमरे में सिर्फ राख थी – आख़िरी ख़त भी जल चुका था। हवा ने उसे आग लगा दी थी। तस्वीर पर धुंधला साया। कमला देवी रोती रहीं। "मैंने जला दिया सब... मेरी बेटी..." लेकिन कोई नहीं सुन रहा। गंगा किनारे नेहा की चिता जली। राख बह गई। उसी रात, पटना के उस पुल पर लोग चिल्लाए – एक साया मोटरसाइकिल पर। अर्जुन जैसा। नेहा के साथ। हँसते हुए गंगा की ओर। फिर गायब।अब वो कोठी खाली है। लेकिन रातों में ख़तों की सरसराहट सुनाई देती है। अधूरे ख़तों की।  आपको यह कहानी कैसी लगी प्लीज बताइए