लाइब्रेरी की आखिरी किताबपुरानी दिल्ली की गलियों में छिपी एक प्राचीन लाइब्रेरी थी – हज़रत निज़ामुद्दीन लाइब्रेरी। सदियों पुरानी यह इमारत, जहाँ हवा में किताबों की स्याही और धूल की खुशबू घुली रहती थी। ऊँची-ऊँची अलमारियाँ, लकड़ी के फर्श जो हर कदम पर चरमराते, और खिड़कियों से झाँकती शाम की सुनहरी किरणें। यहाँ समय रुक सा जाता था।ज़ोया वहाँ पहुँची तो दोपहर के दो बज चुके थे। उसके हाथ में एक पुरानी कैमरा थी – कैनन की पुरानी मॉडल, जो उसके दादाजी की याद दिलाती थी। वो एक फोटोग्राफर थी, फ्रीलांस, जो शहर की अनकही कहानियों को कैद करना पसंद करती। आज उसकी नज़र पड़ी एक धूल भरी किताब पर – 'गुमनाम प्रेम कथाएँ'। कवर पर सोने की कढ़ाई उकेरी हुई थी, शायद मुग़ल काल की। ज़ोया ने किताब निकाली, पन्ने पलटे, और कैमरा उठा लिया। क्लिक! क्लिक! लेंस से वो किताब को अमर कर रही थी।तभी पीछे से एक आवाज़ आई, "एक्सक्यूज़ मी, वो किताब... क्या मैं देख सकता हूँ?" ज़ोया मुड़ी। सामने एक लंबा सा लड़का खड़ा था – कबीर। चश्मा लगाए, कुर्ता-पायजामा पहने, हाथ में एक पुरानी डायरी। उसके चेहरे पर उत्सुकता की चमक थी। "ये किताब रेयर है," उसने कहा, "मैंने इसके बारे में सुना था। क्या आप फोटो खींच रही हैं?"ज़ोया ने मुस्कुराते हुए किताब बढ़ा दी। "हाँ, ये इतनी खूबसूरत है। आप पढ़ना चाहते हैं?" कबीर ने किताब ली, पन्ने पलटे। "ये 18वीं सदी की है। इसमें दिल्ली के गुमनाम प्रेमियों की कहानियाँ हैं।" वो ज़मीन पर बैठ गया, किताब गोद में रखकर पढ़ने लगा। ज़ोया भी पास बैठ गई। दोनों की बातें शुरू हो गईं। कबीर इतिहासकार था, दिल्ली यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर। वो किताबों की दुनिया में खोया रहता। ज़ोया ने अपना कैमरा उठाया और चुपके से उसकी फोटो खींच ली – किताब पढ़ते हुए, आँखें चमकती हुईं।"ये क्या?" कबीर ने हँसते हुए कहा। "मैं मॉडल नहीं हूँ।" ज़ोया ने शरमाते हुए फोटो दिखाई। "ये परफेक्ट कैप्चर है। किताब और इंसान – दोनों की कहानी।" बस, यहीं से उनकी कहानी शुरू हो गई। नंबर एक्सचेंज हुए, और अगले दिन कबीर ने मैसेज किया – "किताब पढ़ ली। कल मिलें?"दोस्ती की शामेंअगले कुछ हफ्ते, दिल्ली के पुराने कोनों में उनकी दोस्ती पनपी। कबीर ज़ोया को ले गया चाँदनी चौक की गलियों में। "देखो ये हवेली," वो इशारा करता, "ये 300 साल पुरानी है। यहाँ एक शायर रहता था, जिसकी महबूबा के लिए लिखी शायरी आज भी दीवारों में बसी है।" ज़ोया कैमरा निकालती, फोटो खींचती। "तुम्हें इतिहास कैसे आता है?" वो पूछती। कबीर हँसता, "किताबों से। और तुम्हें ये लेंस जादू कैसे आता है?"ज़ोया उसे सिखाती – दुनिया को लेंस से देखना। एक शाम, लाल किले के पास, वो रुकी। "देखो कबीर, सूरज ढल रहा है। लेंस से देखो – रंग कैसे बदल रहे हैं?" उसने अपना कैमरा उसे थमा दिया। कबीर ने पहली बार कैमरा उठाया। क्लिक! "वाह, ये तो जादू है। जैसे इतिहास जीवित हो गया।" वे हँसते, चाय की टपरी पर बैठते। कबीर उसे पुरानी दिल्ली के किले, मस्जिदें, हवेलियाँ दिखाता। ज़ोया उसे सिखाती – हर कोने में कहानी ढूँढना।एक रात, यमुना के किनारे, वे बैठे। हवा ठंडी थी। कबीर ने कहा, "ज़ोया, तुम्हारी आँखों में वो चमक है जो लेंस भी कैद नहीं कर पाता।" ज़ोया का दिल धड़का। "तुम्हारी बातों में वो इतिहास है जो दिल को छू जाता है।" दोनों चुप हो गए। आँखों में कुछ था, लेकिन जुबाँ पर नहीं। दोस्ती की इस मिठास में प्यार घुल रहा था, बिना नाम लिए।वे हर शाम मिलते। कबीर उसे अपनी डायरी दिखाता – जिसमें वो अपनी रिसर्च लिखता। ज़ोया अपनी फोटोज़ शेयर करती। एक दिन, पुरानी दिल्ली की एक गली में, बारिश हो गई। दोनों भीग गए। कबीर ने अपनी जैकेट उतारी और ज़ोया के कंधे पर रख दी। "ठंड लग जाएगी।" ज़ोया ने देखा – उसकी आँखें कितनी गहरी। दिल ने कहा, 'कह दो।' लेकिन बोला नहीं। बस मुस्कुरा दी।मोड़: विदाई की छायाएक महीना बीत गया। एक शाम, कबीर के फोन पर ज़ोया का मैसेज आया – "कल मिलते हैं? लाइब्रेरी में?" कबीर खुश हो गया। लेकिन जब वो पहुँचा, ज़ोया उदास सी लग रही थी। "क्या हुआ?" उसने पूछा। ज़ोया ने आँसू पोंछते हुए कहा, "मुझे जाना है। एक असाइनमेंट मिला – इटली में। मिलान का एक फोटोग्राफी प्रोजेक्ट। दो महीने का। कल फ्लाइट है।"कबीर का दिल बैठ गया। "इतना जल्दी?" वो बोला, आवाज़ काँपते हुए। "हाँ, ये मेरा सपना था। लेकिन... तुम्हें छोड़ना मुश्किल है।" दोनों चुप। हवा में उदासी घुली। कबीर ने कहा, "दिल्ली तुम्हारे बिना अधूरी लगेगी।" ज़ोया ने उसका हाथ पकड़ा। "तुम्हारी दोस्ती... सब कुछ बदल गई।" प्यार था, गहरा। लेकिन डर था – क्या कहें तो रिश्ता टूटेगा? क्या न कहें तो हमेशा के लिए खो जाएगा?उस रात, कबीर घर लौटा तो नींद न आई। वो डायरी में लिखता रहा – 'ज़ोया, तुम्हारी मुस्कान दिल्ली का इतिहास है। जाने मत।' ज़ोया ने भी फोटो एल्बम खोला – कबीर की तस्वीरें। हर फोटो में वो मुस्कुरा रहा था। मन में तूफान था। प्यार का इज़हार क्यों न हो पाया? अगले दिन एयरपोर्ट पर विदाई हुई। गले लगे, आँखें नम। "वापस आना," कबीर ने कहा। "ज़रूर," ज़ोया बोली। लेकिन दोनों जानते थे – ये दोस्ती नहीं, कुछ और था।दो महीने बीते। मैसेज आते रहे। "मिलान की सड़कें खूबसूरत हैं, लेकिन तुम्हारी दिल्ली जैसी नहीं।" कबीर जवाब देता, "लाइब्रेरी में वो किताब इंतज़ार कर रही।" लेकिन मन में दर्द बढ़ता गया। प्यार चुपके से पनप रहा था, बिना बोले।क्लाइमेक्स: लाइब्रेरी की आखिरी मुलाकातजाने से एक दिन पहले, ज़ोया दिल्ली लौट आई। असाइनमेंट खत्म, लेकिन दिल अधूरा। उसने कबीर को मैसेज किया – "लाइब्रेरी में मिलो। उसी जगह।" कबीर पहुँचा तो शाम ढल रही थी। वही कोना, वही अलमारी। ज़ोया खड़ी थी, हाथ में वो पुरानी किताब। "ये वापस रखने आई हूँ। और... तुम्हें कुछ कहने।"कबीर का दिल धड़क रहा था। "क्या?" ज़ोया ने किताब खोली – उसी पन्ने पर जहाँ पहली मुलाकात हुई थी। "पहली बार यहाँ मिले थे। तुम किताब पढ़ रहे थे, मैं फोटो खींच रही थी। तब से... हर कोना, हर शाम, तुम्हारे साथ।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं इटली गई, लेकिन हर फोटो में तुम हो। कबीर, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।"कबीर की आँखें भर आईं। वो आगे बढ़ा, ज़ोया को गले लगा लिया। "ज़ोया, मैं भी। हर इतिहास, हर किताब में तुम हो। मैंने कहा न सका, डर लगता था। लेकिन अब... कभी मत जाना।" दोनों रोए, हँसे। लाइब्रेरी की खिड़की से चाँद झाँक रहा था। किताब गिर गई ज़मीन पर। कबीर ने उठाई, और ज़ोया ने फोटो खींची – दोनों की, किताब के साथ।उस रात, वे बाहर निकले। पुरानी दिल्ली की गलियाँ अब उनकी थीं। हाथों में हाथ, कबीर बोला, "अब नई कहानी लिखेंगे। हमारी।" ज़ोया मुस्कुराई, "लेंस से कैद करेंगे।" प्यार, जो लाइब्रेरी से शुरू हुआ, अब अनंत था। दिल्ली की रातें गवाह बनीं – दो दिलों के मिलन की।