adhuri Rahe Jahan pyar saccha hai in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | अधुरी राहें

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अधुरी राहें

अधूरी राहें कॉलेज कैंपस की सुबह:

पहली नजर का जादू सुबह की पहली किरणें दिल्ली के इस नामी कॉलेज के कैंपस पर पड़ रही थीं। हल्की धूप बगीचे की हरी पगडंडियों पर चमक रही थी, जहां छात्रों के ग्रुप हंसी-मजाक में डूबे थे। कहीं लड़कियां नोट्स शेयर कर रही थीं, तो कहीं लड़के क्रिकेट की बातें करते हुए लाइब्रेरी की ओर बढ़ रहे थे। हवा में किताबों की स्याही और ताजे फूलों की खुशबू घुली हुई थी। दूर पहाड़ी पर कोहरा अभी भी लिपटा था, जो पूरे कैंपस को एक सपनीली चादर ओढ़ाए हुए था।अन्वी अपनी फेवरेट टेबल पर बैठी थी—लाइब्रेरी के कोने में, जहां खिड़की से बाहर का नजारा साफ दिखता था। उसके सामने फैली किताबें—इकोनॉमिक्स की थिक वॉल्यूम, साहित्य की कविताएं और एक डायरी—लेकिन उसका ध्यान कहीं और भटक रहा था। आंखें खिड़की पर टिकी थीं, लेकिन दिमाग में माता-पिता की सख्त आवाज गूंज रही थी। “अन्वी, बेटा, कॉलेज में पढ़ाई पर ध्यान देना। ऐसे किसी से दोस्ती मत करना जो हमारे परिवार की वैल्यूज से मैच न करे। हमारा स्टेटस, हमारा नाम—सब दांव पर लगेगा।” अन्वी के पिता एक बड़े बिजनेसमैन थे, जिनका घर दिल्ली के पॉश इलाके में था। मां एक सोशल वर्कर, जो समाज की नजरों में हमेशा परफेक्ट इमेज बनाए रखना चाहती थीं। अन्वी को बचपन से ही ये बातें सुनाई जाती रहीं—पढ़ाई करो, अच्छा जॉब पाओ, और शादी एक ‘सूटेबल’ फैमिली से करो। लेकिन अन्वी का दिल कहीं और था। उसे किताबों में आजादी मिलती थी, जहां वो उन सपनों को जी सकती थी जो रियल लाइफ में नामुमकिन लगते थे।उसी समय, लाइब्रेरी का गेट खुला और विक्रम अंदर दाखिल हुआ। उसके कंधे पर पुरानी सी बैग लटकी थी, जिसमें नोटबुक, एक पेन और थोड़े-से नोट्स भरे थे। विक्रम का चेहरा साफ-सुथरा था, लेकिन कपड़े सादे—एक फेडेड ब्लू शर्ट और जींस। वह राजस्थान के एक छोटे से गांव से आया था, जहां उसके पिता किसान थे और मां घर संभालती थीं। भाई-बहनों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। कॉलेज स्कॉलरशिप पर आया था, लेकिन हर रात हॉस्टल में जागकर पढ़ाई करता। समाज की नजरें उसे हमेशा तौलतीं—‘गरीब लड़का, क्या कर लेगा?’ विक्रम को पता था कि उसका बैकग्राउंड उसके सपनों के रास्ते में दीवार बन सकता है, खासकर प्यार के मामले में। लेकिन दिल में एक आग थी—पढ़कर कुछ बनने की, और शायद कहीं एक ऐसा प्यार पाने की जो बिना शर्त हो।विक्रम लाइब्रेरी की गलियों में आगे बढ़ा। शेल्फ्स के बीच किताबें सरसरातीं, और हल्की-सी चाय की खुशबू हवा में तैर रही थी। तभी, अन्वी की टेबल के पास से एक किताब फिसलकर गिर गई। ‘धड़!’ आवाज आई।“ओह नो!” अन्वी चौंकी और झुक गई।विक्रम ने तुरंत झुककर किताब उठाई। यह एक पुरानी कविता की किताब थी—मीराबाई की। उसने मुस्कुराते हुए किताब बढ़ाई। “ये आपकी? सॉरी, मैंने डिस्टर्ब कर दिया क्या?”अन्वी ने ऊपर देखा। विक्रम की आंखों में हल्की चमक थी, मुस्कान में शरारत और गर्माहट दोनों। उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। “ध... धन्यवाद। हां, मेरी ही थी।”“मीराबाई? अच्छा चॉइस। ‘पायो जी मैं तो सांवरिया की।’ पसंदीदा?” विक्रम ने हल्के से छेड़ा, किताब थमाते हुए।अन्वी हंस पड़ी, झिझक टूट गई। “हां, वो भक्ति का प्यार... कभी-कभी सोचती हूं, आज के जमाने में कहां ऐसा होता है।”“होता है,” विक्रम ने आंखों में चमक डालकर कहा। “मैं विक्रम हूं। इंजीनियरिंग थर्ड ईयर। आप?”“अन्वी। कॉमर्स फाइनल ईयर। आप अक्सर यहां आते हो?”“हां, शांति मिलती है ना? बाहर का शोर यहां नहीं पहुंचता।”उसी पल, उनके बीच एक अदृश्य धागा बंध गया। छोटी-सी बातचीत ने दोस्ती की नींव रख दी।दोस्ती की शुरुआत: छोटे-छोटे पल, बड़े इमोशन्सअगले कुछ दिन दोनों की मुलाकातें बढ़ गईं। लाइब्रेरी ही उनका अड्डा बन गई। कभी नोट्स शेयर करने, कभी प्रोजेक्ट पर डिस्कस करने। विक्रम अन्वी को इकोनॉमिक्स के कॉम्प्लिकेटेड कॉन्सेप्ट्स आसान बनाकर समझाता। अन्वी उसे हिंदी साहित्य की दुनिया में ले जाती।एक शाम, कॉफी शॉप में। बाहर हल्की फुहारें पड़ रही थीं। दोनों हॉट चॉकलेट के मग्स थामे बैठे थे।“तुम्हारा गांव कैसा है, विक्रम?” अन्वी ने उत्सुकता से पूछा।विक्रम मुस्कुराया, लेकिन आंखों में उदासी थी। “सुंदर है, अन्वी। खेतों की हरियाली, नदियां... लेकिन गरीबी ने सब ग्रे कर दिया। पापा बीमार हैं, छोटा भाई पढ़ रहा है। मैं स्कॉलरशिप पर हूं, पार्ट-टाइम ट्यूशन भी करता हूं। लेकिन सपने देखता हूं—एक दिन अपना स्टार्टअप, अपना घर।”अन्वी ने उसका हाथ छुआ। “तुम मजबूत हो। मेरे पास सब कुछ है—बड़ा घर, कार, लेकिन अकेलापन। पेरेंट्स हमेशा प्रेशर देते हैं। ‘डॉक्टर या इंजीनियर से शादी करो।’ प्यार? वो तो सपना लगता है।”विक्रम ने उसकी आंखों में झांका। “प्यार सपना नहीं, हकीकत है। बस सही इंसान मिले।”उस रात अन्वी घर लौटी तो डायरी में लिखा: ‘विक्रम की मुस्कान में वो शांति है जो किताबों में भी नहीं मिलती।’प्यार का इकबाल: बारिश, डूडल्स और दिल की बातेंदोस्ती धीरे-धीरे प्यार में घुल गई। कॉलेज के पार्क में शामें बिताने लगे। एक दिन तेज बारिश हुई। दोनों भीगते हुए भागे, लेकिन रुक गए। पार्क की बेंच पर बैठे, भीगे बाल, गीले कपड़े।“पागल हो क्या?” अन्वी हंसते हुए बोली।विक्रम ने उसके गाल पर पानी की बूंद पोछी। “तेरे साथ तो हर पल क्रेजी लगता है। अन्वी, मैं... मैं तुमसे...”शब्द रुक गए। अन्वी ने उसका हाथ थाम लिया। “मैं भी, विक्रम। लेकिन...”“कोई लेकिन नहीं। अभी तो ये पल हैं।”उन दिनों नोटबुक में डूडल्स बनने लगे। विक्रम अन्वी की नोटबुक में दिल बनाकर ‘तुम्हारी मुस्कान’ लिखता। अन्वी उसके लिए कविताएं—‘तेरी आंखों में समंदर, मेरे दिल का किनारा’। कॉफी ब्रेक्स पर घंटों बातें। विक्रम अपनी गांव की कहानियां सुनाता—रात में तारों भरी आकाश, मेलों की रौनक। अन्वी शहर की चकाचौंध—मॉल्स, पार्टीज, लेकिन खोखलापन।एक रात, हॉस्टल की छत पर। सितारे चमक रहे थे।“विक्रम, अगर परिवार न मानें तो?” अन्वी ने धीरे से कहा।“मानेगा। मैं मेहनत करूंगा। तुम बस मेरा साथ दो।” विक्रम ने वादा किया। लेकिन दिल में डर था।परिवार की दीवारें: विरोध की शुरुआतअन्वी के घर में खबर फैल गई। एक दिन मां ने फोन किया। “अन्वी, वो विक्रम कौन है? गरीब घर का लड़का? हमारा परिवार इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। तुम्हारी शादी तो राजा जी के बेटे से तय हो चुकी है!”अन्वी रो पड़ी। “मां, वो अच्छा है। पढ़ा-लिखा है।”“अच्छा? स्टेटस देखो! कल से बाहर मत जाना।”विक्रम को भी दोस्तों ने बताया। “भाई, वो अमीर घर की। तू क्या कर लेगा?” विक्रम चुप रहा, लेकिन रातें कटने लगीं।फिर भी मिलते रहे—चोरी-छिपे। लाइब्रेरी के पीछे, पार्क के कोने में। लेकिन डर बढ़ता गया।कॉलेज फेस्ट का क्लाइमैक्स: उम्मीदें और टूटनकॉलेज का एनुअल फेस्ट आया। कल्चरल नाइट, डांस, म्यूजिक। विक्रम को स्टूडेंट ऑफ द ईयर का इंटरव्यू मिला। अन्वी डांस ग्रुप में थी। दोनों ने प्लान बनाया—बीच में मिलेंगे।लेकिन अन्वी के पेरेंट्स ने मना कर दिया। “नहीं जाना। कल से शहर बदलकर पढ़ाई करो।”फेस्ट की रात। स्टेज पर लाइट्स, भीड़ का शोर। विक्रम इंटरव्यू दे रहा था। “मेरा सपना... एक ऐसी दुनिया जहां बैकग्राउंड मायने न रखे। प्यार और मेहनत से सब संभव।” लेकिन आंखें अन्वी को ढूंढ रही थीं। अन्वी घर पर रो रही थी।फेस्ट खत्म हुआ। विक्रम का दिल भारी।रेलवे स्टेशन: अधूरी विदाईअगले दिन अन्वी का सामान पैक। पेरेंट्स ने टिकट कटवा दिया—जयपुर हॉस्टल के लिए। विक्रम को मैसेज: ‘स्टेशन आ जाओ, आखिरी बार।’स्टेशन पर भीड़। ट्रेन का शोर। विक्रम प्लेटफॉर्म 3 पर खड़ा, दिल धड़क रहा। अन्वी आई—बैग लटकाए, आंखें नम।“अन्वी...” विक्रम ने पुकारा। दौड़कर गले लगाने को हुआ।“विक्रम, मत... लोग देख लेंगे।” अन्वी ने रोका। “मुझे जाना है। पेरेंट्स... सब। तू भी अपना ख्याल रख।”“अन्वी, रुको ना। हम लड़ेंगे। मैं जॉब कर लूंगा, प्रूव कर दूंगा।”“समय लगेगा। बहुत। शायद कभी न हो।” अन्वी की आवाज कांप रही। ट्रेन की सीटी बजी।दोनों अलग प्लेटफॉर्म्स पर। कोई गले लगना नहीं, कोई किस नहीं—बस नम आंखें। अन्वी ट्रेन में चढ़ी। खिड़की से देखा—विक्रम मुस्कुरा रहा, हाथ हिला रहा। ट्रेन सरकने लगी। विक्रम वहीं खड़ा रहा, आंसू बहते। अन्वी ने आखिरी बार देखा—उसकी आंखों में अधूरा प्यार, अधूरी राहें।ट्रेन दूर चली गई। स्टेशन खाली हो गया। विक्रम लाइब्रेरी लौटा, अन्वी की किताब उठाई। पन्नों में डूडल—‘हमारी कहानी अधूरी नहीं, बस रुकी है।’भावनात्मक अंत: यादों की अमर कहानीउनके प्यार ने दुनिया जीती नहीं, लेकिन दिलों में जगह बना ली। अन्वी जयपुर में पढ़ती रही, लेकिन हर रात विक्रम की यादें। विक्रम ने जॉब पकड़ी, लेकिन लाइब्रेरी की टेबल खाली। परिवार की दीवारें ऊंची रहीं, समाज की नजरें सख्त। लेकिन वो छोटे पल—बारिश, डूडल्स, मुस्कानें—हमेशा जिंदा।शायद कभी राहें मिलें... या अधूरी ही रहें। प्यार की ये राहें कभी पूरी नहीं होतीं, बस यादों में चलती रहती हैं।