रुशाली बिना कुछ कहे वहाँ से चली गई।
मयूर सर कुछ पल तक उसी जगह खड़े रहे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अभी जो हुआ, वो सच था या कोई ऐसा सपना, जो अचानक आकर टूट गया हो। पाँच साल बाद, इतनी क़रीब आकर भी, वो दोनों एक-दूसरे से कुछ नहीं कह पाए। न कोई शिकायत, न कोई सवाल—बस एक भारी-सी खामोशी, जो मयूर सर के दिल में गहरी उतरती चली गई।
जिस लड़की की मौजूदगी कभी उनके सबसे थके हुए दिन को भी हल्का कर देती थी, आज वही उन्हें देखकर भी कुछ बोले बिना चली गई।
मयूर सर के मन में एक अजीब-सी कसक उठी।
क्या वो मुझसे नाराज़ है?
या फिर… अब उसे मेरी ज़रूरत ही नहीं रही?
उन्होंने खुद को समझाने की कोशिश की, लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।
घर पहुँचते ही रुशाली ने अपने जूते उतारे और बिना कुछ कहे सोफे पर बैठ गई। चेहरा थका हुआ था, आँखों में नमी थी, लेकिन होंठों पर हल्की-सी मुस्कान भी। माँ ने उसे देखा तो तुरंत समझ गईं कि कुछ बहुत गहरा हुआ है।
“क्या हुआ बेटा?” माँ ने धीरे से पूछा।
रुशाली कुछ पल चुप रही, फिर बोली,
“माँ… आज मयूर सर मिले।”
माँ चौंक गईं।
“सच? कहाँ?”
“प्रिशा की हल्दी में… लड़के वालों की तरफ़ से आए थे।”
माँ के चेहरे पर सवाल उभर आए।
“वो अपनी पत्नी के साथ आए थे?”
थोड़ा रुककर बोलीं,
“अब तक तो बच्चा भी हो गया होगा… उन्होंने तुझसे बात की?”
रुशाली ने नज़र झुका ली।
“माँ, मुझे अभी इस बारे में बात नहीं करनी। मैं अपने कमरे में जा रही हूँ। वैसे भी कल सुबह जल्दी उठना है… प्रिशा की शादी है।”
इतना कहकर वो उठी और कमरे में चली गई।
माँ वहीं बैठी रहीं। उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने भगवान से बस यही माँगा—
“हे भगवान, मेरी बेटी को उसके हिस्से की खुशियाँ दे देना… अब और नहीं।”
कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही रुशाली जैसे टूट गई। वो बिस्तर पर बैठ गई और आँसू बहने लगे। आज वो रो रही थी, लेकिन ये आँसू सिर्फ़ दर्द के नहीं थे। इनमें राहत थी, खुशी थी, और एक अनजाना डर भी।
वो खुद नहीं समझ पा रही थी कि मयूर सर को देखकर उसका दिल इतना बेचैन क्यों हो गया। वो चाहती थी कि उनसे बात करे। कि इन पाँच सालों में उसने खुद को कैसे संभाला। कैसे हर कामयाबी के बाद भी दिल के किसी कोने में एक खालीपन बना रहा।
लेकिन जिस इंसान को दिल ने सालों तक संभालकर रखा हो, जब वही अचानक सामने आ जाए, तो शब्द साथ नहीं देते।
कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि उन्हें बयान करने के लिए आवाज़ नहीं, हिम्मत चाहिए।
आँसुओं के बीच रुशाली मुस्कुरा भी दी। क्योंकि चाहे कुछ भी हो, सच यही था कि पाँच साल बाद उसका प्यार उसके सामने था।
अब बस कल का इंतज़ार था।
प्रिशा की शादी।
और मयूर सर भी बारात में आने वाले थे।
उधर मयूर सर अपने कमरे की खिड़की के पास खड़े थे। बाहर अँधेरा था, लेकिन उनके अंदर यादों की हलचल।
“रुशाली ने मुझसे कुछ कहा क्यों नहीं?”
“क्या वो अब मुझसे प्यार नहीं करती?”
उनका दिल जानता था—नहीं।
उन्होंने तय किया कि कल शादी में वो उससे ज़रूर बात करेंगे। चाहे जो भी हो।
और न जाने कितनी हिचकिचाहट के बाद, उन्होंने उसे फोन कर दिया।
रुशाली के मोबाइल स्क्रीन पर एक नाम चमका—
Dr. Akdu
पाँच साल बाद।
उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा। वो इतनी खुश हो गई कि कॉल उठा ही नहीं पाई। रिंग बंद हो गई।
मयूर सर ने कॉल काट दी।
उन्होंने सोचा—
“कल तो आएगी ही… प्रिशा उसकी दोस्त जो है।”
कभी-कभी हम सोचते हैं
कल कह लेंगे…
और वही कल
सबसे बड़ा इम्तिहान बन जाता है।
अगली सुबह रुशाली बहुत पहले जाग गई। आज नींद जैसे उससे रूठ गई हो। दिल में हल्की-सी घबराहट थी और कहीं न कहीं एक मीठी-सी उम्मीद भी।
वो अलमारी के सामने खड़ी हुई। कुछ पल तक कपड़ों को देखती रही। फिर उसके हाथ अपने आप नेवी ब्लू रंग के लहंगे पर ठहर गए।
नेवी ब्लू—
वही रंग, जो मयूर सर को सबसे ज़्यादा पसंद है।
रुशाली ने हल्की-सी मुस्कान के साथ लहंगा निकाल लिया। उसे खुद नहीं पता था कि वो ये रंग क्यों पहन रही है, लेकिन दिल जानता था।
वो बहुत सलीके से तैयार हुई। ज़रूरत से ज़्यादा कुछ नहीं—बस उतना, जितना उसकी सादगी को और निखार दे। बाल उसने सीधे, खुले छोड़ दिए। कानों में डायमंड के झुमके, जो उसकी हर हल्की-सी हरकत पर चमक उठते थे।
हाथों में चूड़ियाँ पहनते हुए वो एक पल को ठहर गई। चूड़ियों की हल्की-सी आवाज़ उसे किसी पुराने एहसास में ले गई। पैरों में पायल पहनते वक़्त उसकी उंगलियाँ थोड़ी काँप गईं।
आईने के सामने खड़ी होकर उसने खुद को देखा।
आज वो बेहद खूबसूरत लग रही थी—लेकिन उस खूबसूरती में दिखावा नहीं था। उसमें इंतज़ार था, भरोसा था, और पाँच सालों की खामोश चाहत भी।
कुछ लोग सजते नहीं, बस निखर जाते हैं।
आज रुशाली किसी और के लिए नहीं, खुद के लिए तैयार हो रही थी। लेकिन दिल के किसी कोने में ये सच भी छुपा था—कि अगर मयूर सर उसे आज देख लें, तो शायद उन्हें भी महसूस हो जाए कि कुछ चाहतें वक़्त के साथ कम नहीं होती।
नीचे से माँ की आवाज़ आई—
“रुशाली, जल्दी कर बेटा!”
रुशाली ने एक आख़िरी बार आईने में खुद को देखा, गहरी साँस ली और नीचे आ गई।
माँ उसे देखकर कुछ पल तक कुछ कह ही नहीं पाईं। फिर प्यार से काला टीका लगाया और बोलीं,
“आज तो मेरी बेटी बिल्कुल दुल्हन जैसी लग रही है।”
उधर मयूर सर ने सफ़ेद रंग का कुर्ता पहना—रुशाली का पसंदीदा रंग। आज उनके चेहरे पर एक अलग-सी चमक थी।
कुनाल ने मुस्कुराकर कहा,
“आज तो तू दूल्हा लग रहा है, मयूर।”
“विवान को
कोई देखेगा भी नहीं।
सब की नज़रे तुम पर ही होगी।”
मयूर सर मन ही मन बोले—
“बस… रुशाली देख ले।”
बारात निकल पड़ी।
शादी का मंडप सज चुका था।
ढोल की आवाज़ें तेज़ हो रही थीं।
भीड़ बढ़ रही थी।
और उसी भीड़ में,
दो दिल—
जो पाँच सालों से एक-दूसरे को ढूँढ रहे थे—
आज फिर उसी एक मोड़ की तरफ़ बढ़ रहे थे।
क्या आज वो दोनों अपनी खामोशी तोड़ पाएँगे?
या फिर किस्मत एक और इम्तिहान लेगी?
जारी रहेगा — दिल ने जिसे चाहा.....