first drops of rain in Hindi Short Stories by kajal jha books and stories PDF | बारिश की पहली बुंदे

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बारिश की पहली बुंदे

बारिश की पहली बूंदें
दिल्ली की गर्मियां हर साल की तरह इस बार भी बेहद बेरहम थीं। सूरज जैसे आसमान से आग बरसा रहा था। दोपहर के वक्त सड़कों पर निकलना किसी सज़ा से कम नहीं था। हवा में तपिश थी, धूल थी और लोगों के चेहरों पर थकान साफ दिखाई देती थी।
नेहा अपनी छोटी-सी बालकनी में खड़ी थी। हाथ में चाय का कप था, लेकिन चाय कब ठंडी हो गई, उसे पता ही नहीं चला। उसकी नजरें सामने की इमारतों से होते हुए नीचे सड़क पर टिक गई थीं। वही रोज़ का शोर, वही भागती ज़िंदगी और वही अकेलापन।
पिछले तीन सालों से उसकी ज़िंदगी बिल्कुल एक जैसी चल रही थी। सुबह उठो, ऑफिस जाओ, शाम को लौटो, थोड़ा मोबाइल देखो और फिर वही खामोश रातें। दोस्तों की शादी हो चुकी थी, कोई किसी और शहर चला गया था, और नेहा—वो यहीं रह गई थी, अपने अधूरे ख्वाबों और अधूरी यादों के साथ।
यादें…
और उन यादों में सबसे गहरी छाप थी एक नाम की—राहुल।
कॉलेज के दिन जैसे अब किसी और जन्म की कहानी लगते थे। नेहा आज भी खुद को उसी क्लासरूम में बैठा हुआ महसूस कर सकती थी। खिड़की के पास वाली बेंच, बाहर झांकता नीला आसमान और बगल में बैठा राहुल।
राहुल—जो हर बात पर मुस्कुराता था, जो लेक्चर के बीच में भी कोई न कोई शरारत कर देता था। कभी नेहा का पेन उठा लेता, कभी उसकी कॉपी अपने बैग में डाल लेता।
“अरे नेहा, दोस्ती में इतना तो चलता है,” वो हमेशा हंसकर कहता।
नेहा झुंझलाती थी, लेकिन दिल ही दिल में उसे अच्छा लगता था। राहुल के साथ वक्त कब गुजर जाता, पता ही नहीं चलता। कैंटीन की चाय, बारिश में कॉलेज के गलियारे, और वो छोटी-छोटी बातें—सब कुछ आज भी उसकी यादों में ताज़ा था।
फिर कॉलेज खत्म हुआ।
ज़िंदगी ने अपने असली रंग दिखाने शुरू कर दिए।
राहुल को दिल्ली से बाहर एक अच्छी नौकरी मिल गई। नेहा यहीं रह गई। शुरू-शुरू में दोनों बात करते रहे। फोन कॉल्स, मैसेज, वीडियो कॉल—सब चलता रहा। लेकिन वक्त के साथ ज़िम्मेदारियां बढ़ती गईं और बातें कम होती गईं।
एक दिन नेहा ने महसूस किया कि कई दिनों से राहुल का कोई मैसेज नहीं आया। उसने खुद भी मैसेज नहीं किया। शायद दोनों ही अपने-अपने डर में चुप थे।
और फिर—खामोशी।
नेहा ने कई बार सोचा कि काश उसने उस दिन राहुल से साफ कह दिया होता कि वो उसे कितना चाहती है। लेकिन ज़िंदगी में “काश” शब्द सिर्फ सोचने के लिए होता है, बदलने के लिए नहीं।
बालकनी में खड़ी नेहा ने गहरी सांस ली। तभी अचानक हवा का मिज़ाज बदल गया। तेज़, गर्म हवा की जगह ठंडी-सी हवा ने उसका चेहरा छू लिया।
उसने ऊपर देखा।
आसमान में काले बादल घिर आए थे।
“लगता है बारिश आने वाली है,” उसने खुद से कहा।
कुछ ही पलों में पहली बूंद गिरी। फिर दूसरी। और फिर जैसे आसमान ने खुद को रोकना छोड़ दिया हो—तेज़ बारिश शुरू हो गई।
मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में फैल गई। नेहा ने आंखें बंद कर लीं। बारिश हमेशा से उसे अलग-सा एहसास देती थी।
और हर बारिश के साथ राहुल की याद ज़रूर आती थी।
उसे साफ याद था वो दिन, जब राहुल ने कॉलेज के बाहर बारिश में खड़े होकर कहा था—
“बारिश में भीगना मत भूलना, नेहा। ये दिल को धो देती है।”
नेहा ने तब हंसकर उसे पागल कहा था।
आज वही शब्द उसकी रूह तक उतर रहे थे।
तभी नीचे सड़क से तेज़ हॉर्न की आवाज़ आई। नेहा ने यूं ही नीचे झांका।
और उसकी सांसें थम गईं।
सड़क के किनारे एक बाइक रुकी थी। वही पुरानी-सी बाइक, जिस पर राहुल कॉलेज आया करता था। उस पर बैठा लड़का—अब पहले से थोड़ा बदला हुआ था। चेहरे पर हल्की थकान, दाढ़ी बढ़ी हुई, लेकिन आंखें… वही पुरानी, जानी-पहचानी आंखें।
राहुल।
नेहा को यकीन नहीं हुआ। उसने आंखें झपकाईं, फिर दोबारा देखा। वो वहीं था। राहुल ने हेलमेट उतारा और ऊपर देखा।
उनकी नजरें मिलीं।
बारिश, सड़क का शोर, दुनिया—सब जैसे एक पल के लिए थम गया।
“नेहा!” राहुल की आवाज़ गूंजी।
“तू यहीं है? तीन साल हो गए!”
नेहा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने कुछ सोचा नहीं। बस सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़ी।
नीचे पहुंचते ही बारिश ने दोनों को भिगो दिया। कपड़े, बाल—सब भीग चुके थे, लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी।
“तू अचानक?” नेहा ने कांपती आवाज़ में पूछा।
राहुल मुस्कुराया।
“दिल्ली वापस आ गया हूं। नई जॉब के लिए। आज ही आया… और पता नहीं क्यों, बाइक खुद-ब-खुद यहां ले आई।”
नेहा की आंखों में आंसू भर आए।
“मुझे लगा था तू खुश है कहीं और।”
राहुल ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
“खुश तो तब होता जब तू साथ होती। मैंने तुझे कभी भुलाया नहीं, नेहा। हर बारिश में तुझे याद करता था।”
बारिश और तेज़ हो गई। नेहा के आंसू बारिश में घुल गए।
राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा,
“चल, कॉफी पीते हैं। बारिश रुकेगी नहीं, लेकिन हमारा इंतज़ार आज खत्म हो गया।”
नेहा मुस्कुरा दी। दिल में एक नई शुरुआत की हल्की-सी गर्माहट महसूस हुई।
दोनों साथ चल पड़े—बारिश की बूंदों के बीच, हंसी और अधूरी बातों के साथ।
नेहा को लगा जैसे उसकी ज़िंदगी फिर से हरी हो गई हो।
कभी-कभी ज़िंदगी में पहली बूंदें ही सबसे खास होती हैं—
वो जो सिर्फ धरती को नहीं, दिल को भी भिगो देती हैं।