हमारा जहान नहीं, पर हमारी सुबह ज़रूर —(जिया ठाकुर – आयुष ठाकुर – आर्या ठाकुर)– नई सुबह की पहली किरण पिछली रात का बोझ अभी भी घर की हवा में तैर रहा था।आयुष का गुस्से में उठकर बाहर जाना…जिया का चुपचाप रोते-रोते सो जाना…और आर्या का दोनों को देखते हुए डरी-सी आँखों से सो जाना…यह सब रात खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं हुआ था।---सुबह 6:10 — वही कमरा, वही खामोशीजिया की आँख खुली तो बिस्तर का दूसरा हिस्सा खाली था।उसने धीरे से सांस ली—“वो अभी भी मुझसे दूर ही है…”वह उठकर किचन में चली गई।आज उसने तय किया था—बात होगी… चाहे कितनी भी मुश्किल क्यों न लगे।---किचन में — अनकहे शब्दों का भारचाय बनाते हुए उसने आहट सुनी।पीछे मुड़ी तो आयुष दरवाज़े पर खड़ा था।“गुड मॉर्निंग…” — उसकी आवाज़ धीमी थी।जिया ने हल्की-सी मुस्कान दी,“गुड मॉर्निंग… चाय लोगे?”दोनों की आँखें मिलीं,लेकिन शब्द… जैसे कहीं बीच में अटक गए थे।---आर्या — वह छोटी-सी कड़ी जो दोनों को जोड़ती हैतभी नन्ही आर्या दौड़ती हुई आई—“मम्मा… पापा… गुड मॉर्निंग!”दोनों उसे उठाने झुके…और उनके हाथ एक-दूसरे से छू गए।एक पल की खामोशी…जिसमें दर्द भी था, और अपनापन भी।आर्या ने दोनों के गाल चूमे—“आज हम तीनों साथ में नाश्ता करेंगे!”उसकी मासूमियत ने कमरे में हल्की-सी रोशनी भर दी।---नाश्ते पर — पहली सच्ची बातचीतनाश्ता शुरू होते ही आयुष ने शांत स्वर में कहा—“जिया… कल रात जो हुआ… I’m sorry. मुझे ऐसे react नहीं करना चाहिए था।”जिया ने उसकी ओर देखा।यह वही बात थी जिसका इंतज़ार उसे था।उसने धीरे से कहा,“मुझे भी तुम्हारे साथ खुलकर बात करनी चाहिए थी, आयुष…हम दोनों चुप होते जा रहे हैं… और इससे हमारे बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं।”दोनों कुछ देर चुप रहे।और फिर—आयुष ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।हल्के, पर सचेत तरीके से।“चलो… आज से फिर से शुरुआत करते हैं।नई सुबह… बिना कल की बातें साथ लिए।”जिया की आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।शायद यही वह सुबह थी…जिसकी उन्हें ज़रूरत थी।---एक नई शुरुआतआर्या खुशी से चिल्लाई—“याय! मम्मा-पापा फिर से दोस्त बन गए!”दोनों हँस पड़े।हाँ—शायद उनका जहान परफेक्ट नहीं था…लेकिन यह सुबहउनकी थी।नई।कोमल।आशा से भरी।-- हमारा जहान नहीं, पर हमारा साथ हमेशा( जिया ठाकुर, आयुष ठाकुर, आर्या ठाकुर) दिल का डर और घर की गर्माहटसुबह की हल्की-सी शुरुआत के बाद भी जिया के मन में एक डर बैठा था—“क्या ये बदलाव टिकेगा?”आयुष ने माफी तो माँग ली थी…पर रिश्तों में दरारें कभी एक दिन में भरती नहीं।---शाम 6 बजकर 43 मिनट — दरवाजे की घंटी जिया आर्या के साथ होमवर्क करवा रही थी।घंटी बजी।उसने सोचा— “शायद दूध वाला होगा।”लेकिन दरवाज़ा खोला तो सामनेआयुष खड़ा था… हाथ में एक छोटा-सा बॉक्स।थोड़ा-सा नर्वस… थोड़ा शर्माया हुआ।“ये तुम्हारे लिए,”उसने धीरे से कहा।जिया चौंकी,“मेरे लिए? आज? क्यों?”आयुष मुस्कुराया,“क्योंकि माफी सिर्फ बोलने से नहीं… निभाने से साबित होती है।”---बॉक्स खुला— और दिल भीबॉक्स में एक नाज़ुक-सी चाँदी की चेन थी,छोटे-से कॉफ़ी कप के पेंडेंट के साथ।“तुम्हारी पहली कॉफ़ी…”आयुष ने धीरे से कहा,“जिससे सब शुरू हुआ था।मैं चाहता हूँ… हम वहीं से फिर शुरू करें।”जिया की आँखें भर आईं।वह जानती थी—आयुष कभी-कभार ही ऐसे gestures करता है।और जब करता है… दिल से करता है।उसने पेंडेंट को धीरे से छुआ।“ये बहुत खूबसूरत है…”आयुष ने धीरे से पूछा,“तो… पहनोगी?”जिया ने बिना शब्दों के हाँ कहा।और वहीँ आयुष ने वह चेन उसके गले में पहना दी।उनके बीच की दूरी…कई कदम कम हो गई।---आर्या की छोटी-सी मासूम दुनियापीछे से आर्या कूदते हुए आई—“मम्मा, पापा hugging time!!”दोनों हँसते हुए झुके,और आर्या ने दोनों के गाल साथ में पकड़कर एक-दूसरे की तरफ धकेला।दोनों की माथे एक-दूसरे से टच हो गए।एक सेकंड।लेकिन उस एक सेकंड में…बहुत कुछ पिघल गया।---डिनर — शांत, लेकिन प्यार से भरातीनों टेबल पर बैठे।इस बार कोई तनाव नहीं,कोई ताने नहीं,कोई चुप्पी नहीं।बस तीन लोग…एक परिवार…खाने की खुशबू…और प्यार का सुकून।“जिया…”आयुष ने धीरे से कहा।“हाँ?”“कल वाली अपनी आदत छोड़ोगी?”जिया मुस्कुराई,“अगर तुम अपनी गुस्सा वाली आदत छोड़ोगे।”दोनों हँस पड़े।आर्या ने ताली बजाई—“येस्स्स! फिर से peace!”---रात — एक नई नज़दीकीआर्या को सुलाने के बाद जिया बालकनी में गई, उसी फेवरिट कुर्सी पर।सर्द हवा चल रही थी।आयुष उसके साथ आकर बैठा।कंधे से कंधा सटा हुआ।कुछ देर दोनों चुप रहे…पर यह चुप्पी दर्द वाली नहीं…सुकून वाली थी।आयुष ने धीरे से कहा—“जिया, मैं तुमसे दूर नहीं होना चाहता…बस कभी-कभी… फौज वाली ज़िंदगी अंदर से हिला देती है।”जिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।“मैं हूँ ना… तुम अकेले नहीं हो।”आयुष ने उसकी हथेली दबाई।“और तुम भी अकेली नहीं हो।”वह हल्का-सा झुककर जिया के माथे पर चुम्बन देता है।धीरे, कोमल, बिना जल्दबाज़ी के।एक वादा… बिना शब्दों के।---अंत में — वह एक लाइनजो दोनों ने मन ही मन एक साथ सोची:“हमारा जहान परफेक्ट नहीं…लेकिन हम परफेक्टली एक-दूसरे के हैं।”........ Next part