Tumse Milne ki Chhuti - 11 in Hindi Love Stories by soni books and stories PDF | तुमसे मिलने की छुट्टी - 11

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तुमसे मिलने की छुट्टी - 11

“पहला प्रोजेक्ट… और दिल से दिया गया सरप्राइज़”  का सुबह सूरज आज कुछ ज़्यादा ही चमकदार था।जिया जल्दी उठ गई थी—आज “हमारा जहाँ” का पहला आधिकारिक प्रोजेक्ट शुरू होना था।किचन में चाय बनाते हुए उसकी उँगलियाँ हल्की-सी काँप रही थीं—उत्साह और डर… दोनों साथ थे।आयुष पीछे से आया।“आज बड़ी लीडर मैडम का दिन है?”जिया मुस्कुराई।“अगर डर न लगे तो सपना अधूरा लगता है।“हमारा जहाँ” — पहला प्रोजेक्ट कम्युनिटी सेंटर में बच्चों और पत्नियों की छोटी-सी भीड़ थी।बोर्ड पर लिखा था—“कहानियाँ जो हिम्मत बनें”जिया ने सबको समझाया—“आज हम अपनी कहानियाँ साझा करेंगे।दर्द भी… और उम्मीद भी।”एक महिला बोली“मैंने कभी अपनी बात कही ही नहीं।”जिया ने उसका हाथ पकड़ा।“आज कहिए…यह जगह सुनने के लिए बनी है।”धीरे-धीरे आवाज़ें खुलीं।आँसू भी आए,मुस्कान भी।जिया ने महसूस किया—उसका सपना अब अकेला नहीं रहा।✨ आर्या का नन्हा योगदान आर्या बच्चों के साथ बैठीड्रॉइंग करवा रही थी।“जो डर लगता है, उसे रंग दो,”उसने कहा।एक बच्चे ने काला रंग लिया।आर्या बोली—“अब इसमें थोड़ा पीला भी डालो…ताकि रोशनी आ जाए।”जिया दूर से यह दृश्य देख रही थी।उसकी आँखें भर आईं।✨ आयुष का सरप्राइज़ शाम को जिया थकी हुई घर लौटी।दरवाज़ा खोला तो…लिविंग रूम में हल्की-सी सजावट थी।टेबल पर एक कार्ड रखा था।“To the woman who built a world for many.”जिया का दिल धड़क उठा।आयुष सामने आया—हाथ में छोटा-सा फ्रेम।“ये ‘हमारा जहाँ’ का पहला दिन है,”उसने कहा,“और ये फ्रेम—आज की याद के लिए।”फ्रेम मेंआर्या की बनाई ड्रॉइंग थी—तीन लोग हाथ पकड़े,ऊपर लिखा—“हमारा जहाँ”जिया की आँखों से आँसू बह निकले।“तुमने सब संभाल लिया…”आयुष ने उसका हाथ थामा।“क्योंकि तुमने सब शुरू किया रात — तीन दिल, एक सुकूनआर्या दोनों के बीच सोई थी।आयुष ने धीरे से कहा—“आज गर्व हुआ।”जिया ने सिर उसके कंधे पर टिका दिया।“आज लगा…हमारा जहाँ सच में बड़ा हो रहा है।”आर्या नींद में बुदबुदाई“और मैं सबसे बड़ी हूँ…”दोनों हँस पड़े।क्योंकि अब उनका जहाँ सिर्फ सपना नहीं…एक उम्मीद बन चुका था✨“अचानक आई परीक्षा… और रिश्तों की मजबूती”  आज रात आहरी थी,घर में सुकून था—जैसे कुछ देर के लिए दुनिया थम गई हो।लेकिन ज़िंदगी कभी बिना इम्तिहान केकिसी को नहीं छोड़ती। आधी रात की ख़बररात के ठीक दो बजेआयुष का फोन ज़ोर से बजा।जिया चौंककर उठ बैठी।“इतनी रात…?”आयुष ने स्क्रीन देखी—बेस कमांड।उसका चेहरा गंभीर हो गया।“मुझे जाना पड़ेगा… अभी।”जिया का दिल धक से रह गया।“इतनी जल्दी?”आयुष ने बस इतना कहा—इमरजेंसी है।”आर्या नींद में करवट बदलते हुए बोली“पापा…?”आयुष झुका,उसके माथे को चूमा।“पापा यहीं हैं…बस थोड़ी देर के लिए।” अकेली रात, भारी सवाल आयुष के जाने के बादघर की खामोशीजिया को और ज़्यादा चुभने लगी।उसने खिड़की से बाहर देखा—अंधेरा, सन्नाटा,और अनगिनत सवाल।क्या हर बार यही होगा?क्या कभी डर कम होगा?उसी वक्त उसका फोन बजा—“हमारा जहाँ” से।एक महिला घबराई हुई बोली“मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया है…मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।”जिया ने गहरी साँस ली।डर को भीतर रखा और बोली—“आप अकेली नहीं हैं…मैं आ रही हूँ।” जिया — फिर से मज़बूत आधी रात में जिया उस महिला के साथ अस्पताल में थी।कागज़, डॉक्टर, सवाल…हर चीज़ संभालते हुएउसके भीतर एक ही आवाज़—अब मैं रुक नहीं सकती।उस महिला ने रोते हुए कहा—“अगर आप न होतीं…”जिया ने उसका हाथ थाम लिया।“हम सब एक-दूसरे के लिए हैं।” उधर आयुष — दबाव मेंबेस पर स्थिति गंभीर थी।एक यूनिट फँस गई थी।आयुष पूरी एकाग्रता से आदेश दे रहा था।“टाइमिंग पर ध्यान दो…कोई गलती नहीं।”एक जवान ने पूछा—“सर, आप ठीक हैं?”आयुष ने सिर हिलाया।“मुझे भरोसा है…घर सब संभाल लेगा।”सुबह — थकी हुई जीत सुबह की पहली रोशनी के साथआयुष घर लौटा।थका हुआ,पर सुरक्षित।जिया दरवाज़े पर खड़ी थी।आँखों में रात भर की थकान…पर चेहरे पर राहत।“सब ठीक?” उसने पूछा।“हाँ,” आयुष ने कहा।“और तुम?”जिया हल्के से मुस्कुराई।“मैं भी।”आर्या दौड़कर आई।“आप दोनों बहुत बहादुर हो!”तीनों एक साथ बैठे।बिना ज़्यादा बात किए।कभी-कभी मजबूती शब्दों से नहीं,साथ बैठने से साबित होती है।और उस सुबह उन्होंने महसूस किया—हर इम्तिहान उनके रिश्ते को और गहरा कर गया था “आर्या का स्कूल डे… और माता-पिता की नई सोच” सुबह घर में हलचल थी।आज आर्या का स्कूल का पहला बड़ा दिन था—पहली असेंबली,पहला मंच,और पहला आत्मविश्वास।जिया ने आर्या की यूनिफॉर्म ठीक करते हुए कहा—“तुम घबराओगी नहीं, है ना?”आर्या ने गंभीरता से सिर हिलाया।“नहीं मम्मा…पापा ने कहा है डर आए तो गहरी साँस लेना।”आयुष पास खड़ा मुस्कुरा रहा था।“और मम्मा ने सिखाया है—दिल से बोलना।”✨ स्कूल की असेंबली स्कूल का हॉल बच्चों से भरा था।मंच पर छोटी-छोटी कुर्सियाँ,और पीछे माता-पिता की कतार।आर्या का नाम पुकारा गया“आर्या ठाकुर।”वह मंच पर गई।पहले पल को उसके पैर काँपे…फिर उसने सामने देखा—पहली कतार मेंजिया की मुस्कान,और आयुष का सैल्यूट-सा इशारा।आर्या ने बोलना शुरू किया—“मेरा नाम आर्या है…मेरे पापा देश की रक्षा करते हैं,और मेरी मम्मा लोगों के दिलों की।”पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।✨ माता-पिता की आँखों में गर्व जिया की आँखें भर आईं।“हमने इसे क्या सिखा दिया…”आयुष ने धीरे से कहा—“या शायद…ये हमने इससे सीखा है।”एक टीचर पास आईं।“आपकी बेटी बहुत संवेदनशील है।”जिया मुस्कुराई।“क्योंकि उसने डर को करीब से देखा है।”✨ घर लौटते हुए — नई सोच रास्ते में आर्या ने पूछा“मम्मा… पापा…क्या मैं भी बड़ी होकर लोगों की मदद कर सकती हूँ?”आयुष ने तुरंत कहा—“तुम जो चाहो बन सकती हो।”जिया ने उसका हाथ पकड़ा।“बस इंसान बने रहना।”आर्या खुश होकर बोली—“तो मैं इंसान-हीरो बनूँगी!”तीनों हँस पड़े। शाम — छोटा सा जश्न घर पर केक नहीं था,पर तीन कप दूध थे—आर्या की पसंद।आयुष ने कहा“आज हमारी बेटी ने हमें याद दिलाया—हम जो जीते हैं,वही वो सीखती है।”जिया ने सिर हिलाया।“इसलिए हमें और बेहतर बनना होगा।”आर्या ने दोनों के बीच बैठकर कहा—“हम तीनों मिलकर बनेंगे।”उस रातआर्या चैन की नींद सोई दिल में मंच की तालियाँ,और आँखों में नए सपने।जिया और आयुष देर तक उसे देखते रहे।क्योंकि आज उनकी परवरिश का एक छोटा-सा सच मंच पर उतर आया था “एक पुराना ख़त… और यादों का दरवाज़  शाम का वक्त था।घर में हल्की-सी ख़ामोशी,आर्या अपने कमरे में ड्रॉइंग बना रही थी—तीन लोग, हाथों में हाथ।जिया अलमारी सहेज रही थी।अचानक एक पुराना डिब्बा हाथ लगा—हल्का-सा धूलभरा,और भीतर बंद कुछ अधूरी-सी यादें।उसने ढक्कन खोला।अंदर…ख़त।✨ स्याही में बसी यादें जिया ने पहला ख़त खोला।आयुष की लिखावट—थोड़ी कच्ची,पर दिल से भरी।“जिया,अगर मैं वापस न आ पायातो जान लेना—हर सांस मेंतुम्हारा नाम था…”जिया की आँखें भर आईं।वह कुर्सी पर बैठ गई।याद आया—वो इंतज़ार,वो डर,और हर रोज़ खुद को समझानाकि वो लौट आएगा। आयुष की चुपचाप मौजूदगी दरवाज़े पर आयुष खड़ा था।उसने ख़त देख लिया।धीरे से बोला—“मुझे लगा थातुम्हें वो कभी नहीं मिलेगा।”जिया ने आँसू पोंछे।“क्यों लिखा था ऐसा?”आयुष ने गहरी साँस ली।“क्योंकि उस दिनमौत बहुत पास थी…और मुझे डर थाकि तुम कुछ अनकहा न रह जाओ।”आर्या का सवाल तभी आर्या कमरे में आई।“मम्मा, आप रो क्यों रही हो?”जिया ने उसे पास बिठाया।“ये मम्मा-पापा की पुरानी कहानी है।”आर्या ने ख़त को देखा।“क्या ये प्यार की कहानी है?”आयुष मुस्कुराया।“हाँ…और हिम्मत की भी।” एक नया ख़त जिया ने काग़ज़ उठाया।“आज मैं भी लिखना चाहती हूँ।”उसने लिखा—“आयुष,अगर कभी डर आएतो याद रखना—अब मैं सिर्फ़ इंतज़ार नहीं करती,मैं साथ चलती हूँ…”आयुष ने काग़ज़ लिया।कुछ नहीं बोला।बस आँखें नम हो गईं।आर्या बोली—“मैं भी लिखूँ?”तीनों हँस पड़े। उस डिब्बे मेंपुराने ख़त भी थे,और एक नया भी।क्योंकि अब उनका रिश्तासिर्फ़ यादों पर नहीं,आज के सच पर टिका था।और उस शाम घर में कॉफी की जगहयादों की खुशबू फैल गई..... 

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