VISHAILA ISHQ - 8 in Hindi Mythological Stories by NEELOMA books and stories PDF | विषैला इश्क - 8

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विषैला इश्क - 8

(निशा नागलोक की कैद में एक बच्ची, आद्या, को जन्म देती है, जिसकी हथेली पर रहस्यमय नाग चिह्न उभरता है। नाग रानी उसे "रक्षिका" कहती हैं, पर निशा इसका विरोध करती है। वह अपनी बेटी को नागलोक की राजनीति से दूर रखना चाहती है। एक साधु उसे लौटने की अनुमति देता है, बशर्ते उसका मन शुद्ध हो। अग्निकुंड के पास निशा की चेतना जागती है, और नाग परंपरा उसमें प्रवाहित होती है। अब वह केवल माँ नहीं, नागलोक की शक्ति से जुड़ी है। आदेश होता है कि निशा और आद्या को रात में उनके लोक पहुँचा दिया जाए — पर दृष्टि बनी रहे। अब आगे)

रहस्यमयी नागचिह्न

रात्रि का सन्नाटा अपने पूरे गहराव पर था। निशा थकी हुई, गहरी नींद में डूबी थी। आग की तपन और बीते दिनों की मानसिक उलझनों ने उसे पूरी तरह थका दिया था। उसकी बाँहों में सोई थी आद्या — मासूम, शांत, निश्छल।

अचानक एक छाया कमरे में उतरी — एक नाग सेविका। बिना आवाज़ किए वह पास आई, दोनों पर कमल रस की कुछ बूंदें छिड़कीं। वह रस नींद को और गहरा बना देता था। फिर उसने दोनों को उठा लिया और नागलोक की उस सुरंग की ओर चल दी, जो केवल नागवंशी और रक्षिका वंश की पीढ़ियों के लिए खुलती थी।

...

निशा की आँखें खुलीं — वही कमरा, वही खिड़की, जहाँ से चाँद अक्सर झाँका करता था। पर अब कुछ बदला था। हवा में नागलोक की कोई परिचित, रहस्यमयी गंध तैर रही थी। आद्या अब भी उसकी छाती से चिपकी थी। शांत।

निशा ने उठने की कोशिश की ही थी कि उसकी नज़र अपने पास चमकते किसी चिह्न पर पड़ी। वह झुककर देखने लगी — एक घुमावदार नागचिह्न। उसके होठ काँपे — "क्या यह सब सपना था?" तभी आद्या की नन्ही हथेली काँपी — और वही चिह्न एक क्षण को उभर कर फिर गायब हो गया।

निशा समझ चुकी थी — यह कहानी खत्म नहीं हुई... यह तो अभी शुरू हुई है।

...

सुबह का कोलाहल — बर्तनों की आवाज़, दरवाज़ों का खुलना-बंद होना। निशा की आँखें खुलीं। वह एक परिचित बिस्तर पर थी — मुलायम गद्दा, जानी-पहचानी दीवारें। यह तो उसका ससुराल था! वह चौंककर उठ बैठी — "आद्या!"

उसकी नज़र पास बैठी सास पर पड़ी, जो गोद में आद्या को थामे थीं।

"हाय, मेरी पोती..." उन्होंने कहा, "बिलकुल अपनी माँ पर गई है।"

निशा की आँखें नम हो गईं। राहत और संशय एक साथ बहने लगे। पर तभी आद्या की हथेली में कुछ चमका — वही नाग चिह्न… और फिर जैसे कुछ हुआ ही न हो।

"तू रात भर शांत थी," सास बोलीं, "ना कोई सपना, ना चीख... और अब सुबह होते ही ये सब?"

निशा का मन काँप उठा — "क्या मेरे रूप में यहाँ कोई और थी? इच्छाधारी... कोई नागिन?"

उसने कुछ कहने की कोशिश की — पर शब्द नहीं मिले। क्या बताती? कैसे बताती कि वह नागलोक में थी, कि उसकी बच्ची को ‘नाग रक्षिका’ कहा जा रहा है?

बस हल्के से मुस्कुरा दी, और आद्या की ओर देखने लगी।

"और नाम — आद्या," सास ने कहा, "तू ही तो नींद में बोल रही थी — 'मेरी बेटी, आद्या!' बस, हमने वही नाम रख दिया।"

निशा मुस्कुरा दी, लेकिन भीतर कुछ और ही चल रहा था। उसने आद्या की हथेली फिर देखी — नागचिह्न गायब था। शायद केवल वह ही उसे देख सकती थी।

...

तभी दरवाज़ा खुला। सनी खड़ा था — थका हुआ, आँखों में नमी।

"कैसी हो? और ये मेरी राजकुमारी!" उसने कहा।

निशा सतर्क हो गई। "कैसे हो तुम?"

सनी कुछ देर चुप रहा, फिर धीमे से बोला, "मैं जानता हूँ, बहुत कुछ कहना है... पर पहले मुझे एक बार उसे गोद में लेने दो।"

निशा ने आद्या की ओर देखा। हथेली अब साफ़ थी। उसने बच्ची को धीरे से सनी को थमा दिया, पर उसका मन कह रहा था — "क्या ये वही सनी है?"

सनी ने बेटी को गोद में लेकर कहा, "ये मेरी बेटी है..." उसका चेहरा शांति से भर गया।

लेकिन तभी — वही चिह्न उभरा। कुछ पल के लिए ही सही, पर स्पष्ट।

निशा की नज़र उस पर अटक गई। सनी ने देखा या नहीं — कहना मुश्किल था।

...

माँ ने चाय थमाई। सनी ने कहा, "दो हफ्ते बाद लौट जाऊंगा।"

"तो जा। तुझे रोका किसने है?" माँ बोलीं। "पर निशा यहीं रहेगी।"

"दादी बनते ही बेटे की अहमियत गई?" सनी ने चुटकी ली।

भीतर से हँसी की आवाज़ आई और मीनल की आवाज आई— "भैया! आपका महत्त्व था ही कब!"

पूरा घर हँसी में डूब गया। लेकिन एक चेहरा था, जो निर्विकार था — निशा।

उसकी आँखें अब भी आद्या की हथेली पर थीं, जहाँ चिह्न फिर उभर आया था — हल्का, नीला, साँप की तरह बल खाता हुआ... और फिर गायब।

...

रात के साढ़े बारह बजे थे। सब सो रहे थे — सिवाय निशा के।

वह बैठी थी, हाथ में नोटबुक, आद्या की हथेली पर उभरते उस नीले चिह्न को उतारती हुई।

उसने इंटरनेट खंगाला — और वहाँ मिला “नाग रक्षक चिह्न — एक दिव्य निशान, जो केवल उस संतान पर उभरता है जिसे नागलोक की रक्षा के लिए चुना गया हो।”

निशा की साँसें तेज़ हो गईं। "मेरी बेटी... नाग रक्षिका?"

"तो दुश्मन कौन है?"

उसी वक्त दरवाज़ा खुला। सनी अंदर आया।

"तुम जाग रही हो?" उसने पूछा।

"आद्या की हथेली पर कुछ... अजीब-सा निशान बनता है," निशा बोली।

"निशान? कैसा निशान जानू?"

उसके मुँह से ‘जानू’ सुनते ही निशा थोड़ा पिघली। पर फिर भी सतर्क थी।

"ऐसे ही, मजाक कर रही थी," वह मुस्कुरा दी।

सनी लेट गया, कुछ ही देर में सो गया। पर निशा की नींद उड़ चुकी थी।

...

उसने धीरे से सनी की ओर देखा। क्या उसमें भी कोई रहस्य छिपा है?

उसने हल्के हाथों से सनी की कमीज़ उठाई। उसके काँधे और सीने पर निगाह दौड़ाई — किसी निशान की तलाश में।

तभी — "जानू... अभी मन कर रहा है क्या?"

निशा चौंक गई। जल्दी से कपड़ा सीधा किया। "कुछ नहीं… बस ऐसे ही।"

सनी मुस्कुरा दिया, और सो गया।

लेकिन अब निशा की धड़कनें तेज़ थीं। "अगर सनी पर भी वही चिह्न हुआ, तो...? क्या वह भी रक्षक है? या कुछ और?"

उसकी नज़र फिर से आद्या की हथेली पर गई — और वह चिह्न फिर से उभरा... साँप की तरह कुंडली मारता, जैसे कोई मंत्र बुन रहा हो।

उसने धीरे से बुदबुदाया — "यह शुरुआत है... एक ऐसी लड़ाई की, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।"

1. क्या आद्या वाकई नाग रक्षिका है, या ये सिर्फ एक रहस्यमय विरासत का भ्रम है?

2. जिस सनी को निशा देख रही है — क्या वो सच में उसका पति है, या कोई इच्छाधारी नाग उसकी पहचान ओढ़े हुए है?

3. अगर आद्या नागलोक की रक्षक है, तो वह दुश्मन कौन है जो अब तक छिपा बैठा है?

जानने के लिए पढ़ते रहिए "विषैला इश्क".