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जब बाप के आँगन में उतरतीं हैं बेटियाँ, सौभाग्य ले के साथ में बढ़तीं हैं बेटियाँ ।। परियों सी अहाते में खिलखिलाके डोलतीं, कुछ बोलतीं तो खूब तोतला के बोलतीं, थोड़ी बड़ी होतीं तो बड़ा ख्याल ये करतीं, पापा की तो हर वक्त देख भाल ये करतीं, मम्मी की मदद शौक से करतीं हैं बेटियाँ, माँ - बाप को आनंद से भरतीं हैं बेटियाँ, जब बाप के आँगन में उतरती हैं बेटियाँ, सौभाग्य ले के साथ में बढ़तीं हैं बेटियाँ ।। पढ़तीं हैं तो ये और मन लगा के हैं पढ़तीं, धीरे से सफलता की सीढ़ियों पे हैं चढ़तीं, सेना में ये जातीं हैं एवरेस्ट पे जातीं, स्पेस यान और वायुयान उड़ातीं, बेटों सा कीर्तिमान भी गढ़तीं हैं बेटियाँ, सपनों में रंग बाप के भरतीं हैं बेटियाँ, जब बाप के आँगन में उतरतीं हैं बेटियाँ, सौभाग्य ले के साथ में बढ़तीं हैं बेटियाँ ।। परिवार की प्यारी सी दुलारी सी ये होतीं, भईया के लिए राजकुमारी सी ये होतीं, वैसे तो ये माता - पिता का मान बढ़ातीं, कुछ बन गईं विजय तो स्वाभिमान बढ़ातीं, हँसते हुए लड़तीं हैं झगड़तीं हैं बेटियाँ, आकाश में किरणों सी उभरतीं हैं बेटियाँ, जब बाप के आँगन में उतरतीं हैं बेटियाँ, सौभाग्य ले के साथ में बढ़तीं हैं बेटियाँ ।। सर्वाधिकार सुरक्षित ✒️✒️---©️--®️ डाॅ. विजय प्रताप शाही
सावन अपने समय पर, बरसि गये पुरजोर । भादो क्यों दुब्बर रहें, उहो झरैं झकझोर ।।
खुशियों के लिए, क्यों किसी का इंतज़ार, हम ही तो हैं,अपने जीवन के शिल्पकार ! चलो आज फिर से, खुद को आजमाते हैं, हँसते हुए, चुनौतियों से, पंजा लड़ाते हैं !!
पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को ये भारत आजाद हुआ, सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।। पूरी धरती पर जालिम ने, अपना परचम लहराया था, दुनियाँ के कोने – कोने में, अपना झण्डा फहराया था, ये सूरज नहीं डूबता था, जिसके शासित भू-भागों में, जिसने इस पूरी धरती को, बाँटा था कितने भागों में, वो जालिम अत्याचारी जो, लोगों पर हुक्म चलाता था गोरी चमड़ी का दानव था, जग में अंग्रेज कहाता था ।। अब इस धरती की बात करें,जो चीखा करती जोरों से, जो पीड़ित और प्रताणित थी, उन अत्याचारी गोरों से, अपने लालों के बलिदानों, पर हर दिन हरपल रोती थी, लेकिन वो बीज वीरता के, आँगन – आँगन में बोती थी, माटी का पोषण पा पा कर, पौधे प्रवीर कुछ उगते थे, जो अंग्रेजों के सीनों में, भाले बन बनकर चुभते थे ।। सौ दो सौ साल लड़े थे जो, बरसों-बरसों बलिदान हुए, जो पीढ़ी – पीढ़ी जन्म लिए, पीढ़ी – पीढ़ी कुर्बान हुए, वो बलिदानी वो क्रांतिवीर, सीधे – सीधे अड़ जाते थे, अपनी हिम्मत के दम पर जो, अंग्रेजों से भिड़ जाते थे, लक्ष्मी बाई, नाना, तात्या, के जैसे कितने जान दिये, मंगलपाण्डे या वीरकुंवर,बनके कितने बलिदान दिये ।। आगे उपजे कुछ भगत सिंह, कुछशेखर थे कुछबिस्मिल थे, जब आजादी की लपट उठी, तब लाखों योद्धा शामिल थे, ना जाने कितने भस्म हुए, यज्ञान्दोलन में आहुति बन, फिर निकल पड़ी जनता सारी, फिर टूट गई सारी जकड़न, कुछ गाँधी नेहरू कुछ सुभाष, कुछ सावरकर बन कर आए, कुछतिलक लाजपत कुछपटेल,भारत की जनता को भाए।। हुँक्कार भरा फिर लोगों ने, फिर एक लक्ष्य को साधा था, माँ भारति को जंजीरों में, जिसने कस कर के बाँधा था, उसका अब अंत सुनिश्चित था, जब लोगों ने था ललकारा, अत्याचारी अंग्रेजों को, दौड़ा – दौड़ा कर था मारा, जब उग्र हुआ था आन्दोलन, तब गोरे थर – थर काँपे थे, अब देश छोड़कर जल्दी ही, जाना है, स्थिति भाँपे थे ।। लेकिन फिर कुछ ने धरती माँ, को दो टुकड़ों में बांट दिया, नफरत की ऐसी आग जली, खुद ने ही खुद को काट दिया, झंझावातों के बाद “विजय”, फिर सुबह सुहानी आई थी, हर ओर खुशी के दीप जले, हर ओर रौशनी छाई थी, फिर ऊँचे अंबर में अपना, आजाद तिरंगा लहराया, सदियों सदियों के संघर्षों, का हमने शुभ प्रतिफल पाया ।। पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को देश मेरा आजाद हुआ, सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।
बात जब जब चीख कर करता हूँ मैं, तब बहुत छोटा नजर आता हूँ मैं ।। मूढ़ सा मगरूर सा मजबूर सा, आप ही में तो बड़ा बनता हूँ मैं ।। बेवजह यूँ ही समय के चौक पर, बस अकड़कर के खड़ा मिलता हूँ मैं ।। सोच पर चिपकी हजारों चकतियां, सोचता हूँ मैं बहुत उम्दा हूँ मैं ।। यूँ उफनती हैं “विजय” की हसरतें, खास से भी गैर सा लड़ता हूँ मैं ।। “मैं” अरे मैं तो अहम् का बीज हूँ, हर कहीं हर दौर में उगता हूँ मैं ।। @सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही गोरखपुर, 9935025901,6388236360
मुश्किलों से जूझने की कोशिशें लिख दूँ जरा, और चलने की पुरानी आदतें लिख दूँ जरा ।। धूप ओढ़े रेत जैसी चमचमाती जिन्दगी, धूल सी यायावरी पर बारिशें लिख दूँ जरा ।। आसमाँ पे रंग मन माफिक लगाने में मिली, पाँव के पोरों की सारी दिक्कतें लिख दूँ जरा ।। ज़िन्दगी की राह में काँटे मिलें ना फिर कभी, नर्म सी तासीर की कुछ कोपलें लिख दूँ जरा ।। सामने जब हो चुनौती बस "विजय" की बात हो, हारते कदमों के हिस्से हिम्मतें लिख दूँ जरा ।। @सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
शिव,त्रिपुरेश्वर, शम्भु, महेश्वर, रुद्र ओंकारा, बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।। पाप - काम संहारक प्रभु के नेत्रों की ज्वाला, जगहित में जगदीश्वर पी लेते हैं विष प्याला, नीलकण्ठ की जटा से निकली गंगा की धारा, बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।। तन में भष्म भभूत लपेटे पहने मृगछाला, हाथ त्रिशूल कमण्डल डमरू गले सर्प माला, विश्वनाथ के द्वार लगाती दुनियाँ जयकारा, बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।। वामभाग में सदा विराजें जग की कल्यानी, सारी दुनियाँ कहती है प्रभु को औघड़दानी, दर्शन पाकर हो जाता सबका जीवन न्यारा, बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।। @सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
आँखों में उम्मीदें पाले पलते जाना, स्थिति चाहे जैसी भी हो ढलते जाना ।। दुश्वारी तो सबके जीवन में आती है, हर हालत में हिम्मत रखना ना घबराना ।। वैसे तो सबका मालिक है ऊपर वाला, फिर भी कोशिश हो सच्चा हो पानीदाना ।। अपने दुख की गहराई अपने ही मापो, दुनिया से सारी सच्चाई क्या बतलाना ।। पत्थर होकर धीरे से मन को समझाओ, फूलों में ही होता है खिलना मुरझाना ।। @सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
" अरे नकारात्मकता " ------------------------------------- अरे नकारात्मकता शायद तुझको भान नहीं है, इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है........। बाग बगीचों में दिनदिन भर ओल्हा पाती खेले, गाँव, गली, पौढ़ी, पगडंडी, काँटा, कूशा झेले, गाय चराए, गोबर फेंके, चारा पानी ढोए, सिर के ऊपर, लहन लादकर, मुस्कुराहटें बोए, सबको है मालूम यहाँ कोई अनजान नहीं है.... इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है....। भले नियति ने हमें, हमेशा, नंगे पाँव चलाया, भले, चटकती दोपहरी ने, नंगी पीठ जलाया, अरे, भले ही अपने हिस्से, सूखे मौसम आए, रोटी चटनी, गुण,अचार सब चटखारे से खाए, इन सब बातों में अपना कोई अपमान नहीं है..... इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है......। बदरी बरखा शीत घाम सब सम स्वभाव से काटे दुख विपत्ति भी, हँसते हँसते, हाथों हाथों बाँटे अपनी जिद है, चुनौतियों से, टकराते रहने की, कठिनाई को सोच समझकर सुलझाने,सहने की, यहाँ तनिक भी कुंठा का आदान-प्रदान नहीं है.... इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है.......। @सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
वो ज़रा मौजुआ जमाना था, चार आना बड़ा खजाना था ।। टाॅफियाँ सिर्फ पाँच पैसे में, बीस पैसे में चाट खाना था ।। खेलना खूब मस्तियाँ करना, घूमना और दिन बिताना था ।। काम कुछ और कहाँ था केवल, एक गइया जिसे चराना था ।। और ले कर 'विजय' भरा बस्ता, पाठशाला सहर्ष जाना था ।। @सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
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