पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को ये भारत आजाद हुआ,
सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।
पूरी धरती पर जालिम ने, अपना परचम लहराया था,
दुनियाँ के कोने – कोने में, अपना झण्डा फहराया था,
ये सूरज नहीं डूबता था, जिसके शासित भू-भागों में,
जिसने इस पूरी धरती को, बाँटा था कितने भागों में,
वो जालिम अत्याचारी जो, लोगों पर हुक्म चलाता था
गोरी चमड़ी का दानव था, जग में अंग्रेज कहाता था ।।
अब इस धरती की बात करें,जो चीखा करती जोरों से,
जो पीड़ित और प्रताणित थी, उन अत्याचारी गोरों से,
अपने लालों के बलिदानों, पर हर दिन हरपल रोती थी,
लेकिन वो बीज वीरता के, आँगन – आँगन में बोती थी,
माटी का पोषण पा पा कर, पौधे प्रवीर कुछ उगते थे,
जो अंग्रेजों के सीनों में, भाले बन बनकर चुभते थे ।।
सौ दो सौ साल लड़े थे जो, बरसों-बरसों बलिदान हुए,
जो पीढ़ी – पीढ़ी जन्म लिए, पीढ़ी – पीढ़ी कुर्बान हुए,
वो बलिदानी वो क्रांतिवीर, सीधे – सीधे अड़ जाते थे,
अपनी हिम्मत के दम पर जो, अंग्रेजों से भिड़ जाते थे,
लक्ष्मी बाई, नाना, तात्या, के जैसे कितने जान दिये,
मंगलपाण्डे या वीरकुंवर,बनके कितने बलिदान दिये ।।
आगे उपजे कुछ भगत सिंह, कुछशेखर थे कुछबिस्मिल थे,
जब आजादी की लपट उठी, तब लाखों योद्धा शामिल थे,
ना जाने कितने भस्म हुए, यज्ञान्दोलन में आहुति बन,
फिर निकल पड़ी जनता सारी, फिर टूट गई सारी जकड़न,
कुछ गाँधी नेहरू कुछ सुभाष, कुछ सावरकर बन कर आए,
कुछतिलक लाजपत कुछपटेल,भारत की जनता को भाए।।
हुँक्कार भरा फिर लोगों ने, फिर एक लक्ष्य को साधा था,
माँ भारति को जंजीरों में, जिसने कस कर के बाँधा था,
उसका अब अंत सुनिश्चित था, जब लोगों ने था ललकारा,
अत्याचारी अंग्रेजों को, दौड़ा – दौड़ा कर था मारा,
जब उग्र हुआ था आन्दोलन, तब गोरे थर – थर काँपे थे,
अब देश छोड़कर जल्दी ही, जाना है, स्थिति भाँपे थे ।।
लेकिन फिर कुछ ने धरती माँ, को दो टुकड़ों में बांट दिया,
नफरत की ऐसी आग जली, खुद ने ही खुद को काट दिया,
झंझावातों के बाद “विजय”, फिर सुबह सुहानी आई थी,
हर ओर खुशी के दीप जले, हर ओर रौशनी छाई थी,
फिर ऊँचे अंबर में अपना, आजाद तिरंगा लहराया,
सदियों सदियों के संघर्षों, का हमने शुभ प्रतिफल पाया ।।
पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को देश मेरा आजाद हुआ,
सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।