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shekhar kharadi Idriya

shekhar kharadi Idriya Matrubharti Verified

@shekharkharadi6923
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कलयुग - तिथि- १५-१०-२०२५

कलयुग की नारी...

हे...! नारी
तू क्यूं सहमी है ?
तू क्यूं डरी है ?
अन्याय के विरुद्ध
दुष्टों के विपरित ,
यह तेरा युद्ध है ।
यह तेरा रणक्षेत्र ,
इसमें तू ही योद्धा है ।
तू ही तीर, कमान
तू ही अशस्त्र-शस्त्र ,
तू ही विजय रथ ,
लड़ भयरहित, अविरत ।
निर्भिक, साहसी बनकर ,
शब्दों की टंकार से
हिंसा के प्रहार से ,
प्रतिस्पर्धा की ललकार से
संघर्ष के अग्निपथ पर ,
ना..तुम रामायण, महाभारत की
सीता, अहल्या, द्रौपदी हो ,
हाँ..तुम सनातन कलयुग की
सशक्त, कुशल भारतीय नारी हो ,
जो ड़रकर नहीं डटकर
सहस्र बार मुकाबला करे
जो हारकर नहीं जीतकर ,
परिणाम को बदल डाले
जो अशक्य को शक्य बना दें !
वहीं तूं सर्व शक्तिमान ,
लिख इतिहास के पन्नों पर
यही तेरी पहचान है।
यह तेरी शौर्य गाथा है।।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि -९-१०-२०२६

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फ़िज़ूल...,

तेरे सिवा...!
रहता कहां हूं मैं आज-कल ?
आस-पास होकर भी इक ख़्वाब हूँ ,
साथ होकर भी इक भ्रम हूँ
ना जाने में किस दर्द का बेदर्दी हूँ ,
लाख इलाज़ भी फ़िज़ूल हैं ।


©®- शेखर खराड़ी
तिथि- ७-१०-२०२६

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योगिनी - क्षणिका

शनै शनै..,
विचारधारा बहे
क्षण-क्षण..,
कल्पना भटके
क्षणभंगुर जीवन में
नश्वर श्वास तक ,
आरंभ से अंत तक
ठोस संकल्प से ,
आत्म ज्ञान की पुकार से
शून्य, मौन, एकांत में
हृदय से ,
वो प्रेम योगिनी..,
ध्यान धरे समाधि जैसा ,
मन से वो
अत्यंत चंचल...,
पर, नियंत्रण करें ऋषियों जैसा ,
तन से वो
पूर्णतः शुद्ध ..,
समर्पण करें गंगा जैसा ।।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि -५-१०-२०२६

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आध्यात्मिक - क्षणिका

अस्त-व्यस्त संसार में ,
मोह-माया की जंजाल में
भीड़भाड़ की अंधी दौड़ में,
यहां-वहां, कहा मिलेगी ?
स्नेह, करुणा, अहिंसा की औषधि
जहां क्षण-क्षण पर, पग-पग पर
धृणा, तृष्णा, हिंसा के घाव मिलें,
वहां कैसे तलाशूं ?
महावीर, बुद्ध जैसी शख्सियत
जो मेरे ज़र्रे ज़र्रे को भी ,
गहन ध्यान, समाधि से
आध्यात्मिक बना दें !

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-५-१०-२०२५

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बावरी छोरी...

थारो म्हारो छोरा..,
कोणी मजो न आवें..!
थारे चौखो इश्क़ करनो हैं
म्हारे पक्के हिवडै़ सूं..
तो आणा ठाठ-बाट से ,
ऊंची ऊंटनी पर बैठ'र
कदि उदेपुर, जयपुर
आंख्यों सूं मन्ने निरखने ,
सांसों सूं म्हारो पतों पूछणे ?
म्हें..घणी बाबरी छोरी !
रात-दिन बस थारी बाट जोवूं
टेम मिले तो आता अठै !
कदि रेतीले टीले पार
म्हारे सूणे- सूणे सपणो में
थांसू मुलाकात करणे।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-१/१०/२०२६

- राजस्थानी की देशी भाषा का ठाठ-बाट

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शायराना प्रेम-कविता , तिथि-३०/१/२०२५

असमर्थ

न मैं महलों का राजा
न मैं खानदानी रईसज़ादा ,
न मैं इश्क़ में बातूनी
बस मैं सीधा-साधा ,
इक लेखक, कवि
कलम का पक्का पूजारी ,
रचना का सच्चा जोहरी
तलाश है मुझे कहानी की,
खोज है मुझे काव्य की
इस कलयुग के पाषाण हृदय में
किन्तु असमर्थ हूंँ !
उनकी असहनीय, अकल्पनीय
राक्षसी वृत्ति जानकर ,
अब मेरी दृढ़ शब्द रचना भी
शून्य, मौन, एकांत में ,
क्षण-क्षण कंपकंपाती रहीं
कण-कण धूमिल हुई ,
तुच्छ विचारधारा...
पूर्ण क्षतिग्रस्त होकर ,
मन-मस्तिष्क से ,
पतझड़ की तरह झड़ गई
पुष्प की तरह सूख गई
ऋतुचक्र की प्रक्रिया में ,
शुद्ध रुप से पुनजीर्वित होने ।।


©®- शेखर खराड़ी,
तिथि -२६-९-२०२५

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माँ...अम्बे की पदयात्रा

भाद्रमास की यह पदयात्रा
भक्तों का यह विराट प्रवाह ,
माँ अम्बे की पावन चरणों में
अंबाजी की ओर चलता रहा ।

हर एक भक्त का शुद्ध मन
अरावली के कठिन पथ पर ,
गब्बर की ऊँची छाँव तले
लाखों पाँव स्वयं बढ़ते रहे ।

जहा माँ ने मन से पुकारा
वहा भक्त खिंचा चला आया ,
निरंतर चलता रहा श्रद्धालु
पैरों में छालों की तीव्र पीड़ा ।

मुख पर सदैव माँ का नाम
तन बेशक थककर चूर हुआ ,
पर मन कभी हार न मानें
आँखों में बस एक ही सपना ।

दिल में बस दर्शन की प्यास
बाहर विकट परिस्थिति में भी ,
जाग रहा भीतर दृढ़ विश्वास
हाथों में पवित्र ध्वजा थामें ।

लाल चुनर माथे पर बाँधे
जुबां पर अटूट श्रद्धा से ,
' बोल मारी अम्बे, जय..जय..अम्बे ' का
मधुर सूर सर्वत्र गूँज उठा ।

झुंड के झुंड आगे बढ़ते रहे
बूढ़े-बच्चे और जवान
भूलकर अपना होश, ज्ञान ,
सब रथ के संग नाच रहे ।

सब संघ के साथ चल रहे
पथ-पथ पर आगे-पीछे ,
परस्पर मिल-जुलकर
एकता का स्नेह बाँटकर ।

जगह-जगह पर लगें हैं
निःशुल्क सेवा शिविर ,
पग-पग पर भोजन, विश्राम
कोई दबाता पाँव थके ।

कोई लगाता ज़ख्म पर मरहम
कोई आराम में ले माँ का नाम ,
निराली है मांँ तेरी यह लीला
सब भक्तजन तेरा स्मरण करें।

निस्वार्थ भाव की बहती गंगा
भक्त तेरी करुणा का आधार ,
अरासुरी के इस पावन स्थल पर
तेरा दिव्य और भव्य दर्शन पाने ।

सदैव निर्मल हृदय से
अनन्य भक्त की दृष्टि पड़ी ,
तेरे अनंत धाम पर
सारा कष्ट क्षणभर में मिटे ।

माँ..अम्बे के चरणों में
शीश झुककर धन्य हुआ ,
पुर्ण हुई असीम कृपा से
उसकी हर मनोकामना ।

शक्तिपीठ का यह महाकुंभ
भक्ती का यह अद्भुत संगम ,
श्रद्धा की अविरल धार
पा ले तू जीवन की नैया पार ।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२४/९/२०२६

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तुम्हें ढूंढता हूँ, सजल विधा

जब तुम गांव की बाट पर नंगे पांव चलती हो ,
तब मैं माटी की नर्म स्पर्श में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम पांव से ओश बिंदु को सहलाती हो ,
तब मैं शुद्ध बूंदो के चमक में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम मक्के की फसलों को सहलाती हो ,
तब मैं पत्तों की सरसराहट में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम पीले सरसों के खेतों में युंही दौड़ती हो ,
तब मैं श्वासों की तेज धड़कन में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम खुशी से पल्लू हवा में लहराती हो ,
तब मैं हवा के शांत झोंको में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम पके जुवार के हुँडा भूनकर खाती हो
तब मैं दरांँती से कटे ठूठ में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम चूल्हे पर बाजरे की रोटी पकाती हो ,
तब मैं खाने के पुराने स्वाद में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम कुएं से पानी रस्सी से निकालती हो ,
तब मैं प्यासा मुसाफ़िर बनकर तुम्हे ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम मटके को कमर से ठुमकाती हो ,
तब मैं अल्हड़ प्रेमी सा केवल तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम 'छिछोरा छोरा' कहकर डांटती हो ,
तब मैं स्नेह की गहरी झील में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम प्रतिक्षा की राह में घड़ीभर ठहरती हो ,
तब मैं मिलन की लंबी दूरी में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम जंगली पुष्प बालों में सहज लगाती हो ,
तब मैं खुश्बू की तीव्र खींचाव में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |

जब तुम साल-पलाश के पत्तों से कुटिया बनाती हो ,
तब मैं प्रकृति की असीम सादगी में तुम्हें ढूंढ़ता हूँ |


©®- शेखर खराड़ी
तिथि- ७-९-२०२६

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