Quotes by shekhar kharadi Idriya in Bitesapp read free

shekhar kharadi Idriya

shekhar kharadi Idriya Matrubharti Verified

@shekharkharadi6923
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निकम्मा इश्क़

जी..जहाँ ,
निकम्मा हूँ ! फ़र्ज़ी हूँ !
तेरे इश्क़ में ,
काब़िल कहा हूँ मैं ?
तेरे पाक दिल के ,
हर दफ़ा, सौ-सौ ज़ज्बातें
तोड़ कर, तुम्हारे पास
अफलातून....,
वापस लौट आता हूँ |
बेशर्म, बेहया बनकर,
भोली-भाली बातों से,
झूठे-मूठे किस्सों से
अजीब-ओ-ग़रीब चश्में लगाकर ,
बनावटी सूरत दिखाकर ,
उल्टे-पुल्टे कारनामों पर
मख़मली मक्खन लगाकर ,
तुम्हें फिर से मनाता हूँ |
बेतुकी कहानी सुनाकर ,
जी-हजूरी करते-करते,
हमेशा-हमेशा तेरा ही
लुभाता हूँ कोमल मन..
फिर भी लायक कहां हूँ मैं !
तुम्हारी अच्छाईयों के आगे
अपने स्वार्थी, ज़िद्दी रवैये से ,
आदत से मज़बूर होकर ,
बन जाता हूँ, लायक से
इक खलनायक मैं ||

-©®- शेखर खराड़ी
तिथि-४/८/२०२६

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इश्क़ की यह कैसी इम्तेहान...?
दर्द का सिलसिला थमता नहीं
ग़म का आलम फिसलता नहीं ,
बेरूख़ी का जज्ब़ा पिघलता नहीं
बस जला है दिल कश्मकश की आग में
धुवां.., धुवां... होकर ||

©- Shekhar kharadi

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रिमझिम फुव्वारें...

अम्बर से बरसीं रिमझीम फुव्वारें..,
वृक्षों और पुष्पों से टप-टप पानी गिरे |
धीरे-धीरे भींग रहा मेरा अल्हड़ तन-मन ,
मैं झूमू, मैं नाचूं, संग मल्हार गीत गाऊं |

मधुमालती की खुश्बू मंद-मंद लेकर ,
भीगी सी भागी सी, मैं ऋतु का आनंद लूं !
छम-छम पायल की झंकार से तुम्हें पुकारूं ,
हर एक गिरती बूंद-बूंद में तुम्हें ढूढूं |

हृदय की मद्धम गति से धड़कती हुई ,
पूर्ण समर्पण की भाव से खूद को खो दूं |
सदा तुम्हें चाहूं, सदा तुम्हें याद करूं ,
सदा मैं जीवन भर, बस तुम्हें प्रेम करूं ||

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२९/७/२०२६

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प्रतिक्षा - क्षणिका विधा


प्रेम में तेरी प्रतिक्षा, सदियों सी हैं |
नेत्र में तेरी स्मृति, धुंधली सी हैं |
मन में तेरी कुतुहल, पतझड़ सी हैं |
तन में तेरी हलचल, मझधार सी हैं |
स्पर्श में तेरी सुरसुरी, पत्थर सी हैं |
हृदय में तेरी अनुपस्थित, बंजर सी हैं |
श्वास में तेरी अनुकंपा, शिथील सी हैं |
कदाचित.., पुन: मिलन की आश में
मैं शून्य, मौन बैठा हूँ !
केवल तुम्हें देखने ||

©_® शेखर खराड़ी
तिथि-१५/७/२०२६

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हाइकु- ५-७-५

1
क्षण-भंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3
कलयुग से
रोग ग्रस्त मस्तिष्क
रचेंगी युद्ध |

4
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
तीव्र विनाश |

5
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |

6
कहा पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7
शांत उपदेश
सूने उंगली माल
न क्रोधी व्यक्ति |

8
निर्दय भाव
करे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9
दौड़े मनुष्य
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१४/७/२०२६

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आऊंगी..., सजल विधा

प्रातःकाल कोयल की कुकू सूनकर ,
तुम्हें पुराने कूप पर मिलने आऊंगी |

जंगली पुष्पों को श्वासों में भरकर ,
तुम्हें शूल, कंकर पर ढूढंने आऊंगी |

बहते झरनों का मीठा जल पी कर ,
तुम्हें नदी संग स्पर्श करने आऊंगी |

ठोस गड़रिए मन में नर्म स्नेह लेकर ,
तुम्हें दुपहरी धूप में छांव देने आऊंगी |

हरे मैदानों में भेड़-बकरियां चरा कर ,
तुम्हें आभ तले चाय पिलाने आऊंगी |

गरमा-गरम बाजरे की रोटी बनाकर ,
तुम्हें घी, गुड़ के साथ खिलाने आऊंगी |

देहाती डगर, बाट पर निरंतर चलकर ,
तुम्हें पहाड़ी गीत सुनाने शीघ्र आऊंगी |

हां.., एक दिन हृदय प्रेयसी बनकर ,
तुम पर पूर्ण न्यौछावर करने आऊंगी ||

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

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तेरे प्यार में
गुमशुदा है मेरा दिल
इंतज़ार की राह देखकर ,
जरा तुम खुलकर बताओं
मुलाकात के फासलों तक....

फितरत तो नहीं है दिल तोड़कर आने की..,
पर नाराज़गी यकिनन हैं छोड़कर जाने की..,,

#Budha #Buddha

जीवन की यात्रा में
मुझे एक ऐसा साथी चाहिए
जो अत्यंत दयालु हो ,
मुझसे ज्यादा बुद्ध का भिक्षु हो ।

#Budha

हे.. बुद्ध, हे शाक्यमुनि
बूंद-बूंद में बरसा दें..!
करुणा की नदी
ताकि जन-जन में ,
बहे दया-स्नेह का जल
सत्य अहिंसा के तट पर
मानवता की नौका लेकर ,
निष्ठुर, प्रपंची तन-मन पिघलाकर
हृदय परिवर्तन की यात्रा प्रारंभ करने ।।

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