दीदी
शीला ससूराल में बैठी पुत्र रघु को दूध पिला रही थी। उसे
अपनी छोटी बहन की शादी की याद हो आयी कल उसकी भी शादी
है। उसकी खुद की शादी के बाद मायके में पहली शादी छोटी बहन
प्रज्ञा की शादी है। परन्तु वह उस शादी में नहीं जा पा रही है, कारण
कि उसके जेठ ओमप्रकाश ननंद (श्यामा दीदी) की बेटी शिखा की
शादी अपने घर से कर रहें हैं, दोनो शादियों की तिथि एक ही होने
के कारण शीला ससूराल आकर घर का काम सम्हाल रही हैं।
पारिवारिक दायित्व भी कभी-कभी भावनाओं पर भारी हो जाते हैं।
छोटी बहन प्रज्ञा को उसने सदैव बेटी जैसा प्यार व स्नेह दिया था,
सदैव वह उसका ख्याल रखती थी। उसके खाने, पहनने, पढ़ाई व
कोई भी शौक पूरा करने में शीला सदैव प्रज्ञा को बच्चे की तरह
सहयोग देती रही परन्तु उसकी शादी के अवसर पर वह वहाँ नहीं
है। उसका मन बार-बार उसी के बारे में सोच रहा है।
यहाँ आते समय उसने पति से कहा था कि - "मेरा मन प्रज्ञा
की शादी में जाने का है"। मुकेश ने समझाते हुये कहा था -मैं
जानता हूँ, तुम्हे प्रज्ञा से ज्यादा प्रेम है, परन्तु यदि हम लोग घर नही
जायेंगें तो लोग कहेंगें औमप्रकाश ने अपने भाईयों के लिये इतना
किया और उसके भाई व बहुयें शादी में भी नही आये। यह शादी
भैया कर रहे हैं, यदि दीदी करती तो भले ही हम नही भी जाते तो
चल जाता परन्तू अब अच्छा नहीं लगेगा" ।
ससुराल आये उसे एक सप्ताह हो गया है- जब से वह आयी
है, घर के सभी काम सम्हाल रही है। ननद श्यामा दीदी, राशन
निकाल कर दे देती है। शीला खाना बनाकर सबको खिलाने के बाद
स्वयं खाती है। दीदी इस कस्बे की बेटी है। उन्हीं की बेटी की शादी
का कार्यक्रम है। दीदी वर्षों से यहीं शीला की ससुराल में रहती हैं।
घर में दीदी ही मुखिया हैं। जेठानी अर्थात ओमप्रकाश की पत्नी
थोड़ा मंदबुद्धि है- दीदी आयु में भी सबसे बड़ी है और जरूरत से
ज्यादा समझदार या चालाक भी। उन्होनें जेठानी को दबाकर रखा
है। जितनी वे मंदबुद्धि नही हैं, उससे ज्यादा उनका प्रचार करती हैं
और रसोई, भंडारे व अन्य सभी बातों में घर में दीदी की ही चलती
हैं।
ओमप्रकाश अपने पुत्र के जन्म के समय विधवा बहन श्यामा,
उसके बेटे व बेटी को अपने नवजात बच्वे व पत्नी श्रीदेवी की
देखभाल करने के लिये ले आये थे। मायके के भरे पूरे आर्थिक रूप
से समर्थ परिवार में आकर दीदी यहीं रूक गई। दीदी का उददेश्य
अपना व अपने बच्चो का पालन करना था परन्तु कहना था कि श्रीदेवी
ना तो भैया ओमप्रकाश को खाना बनाकर दे पाती हैं और ना ही बच्चे
भतीजे रूप की देखभाल कर पाती है। भाई ओमप्रकाश की नजरों में
दीदी ने धीरे- धीरे अपना कद बड़ा कर लिया था। श्री देवी घर में
नौकरानी की तरह बर्तन मांजती और झाडू पोछा करती थी। दीदी का
बेटा भी भैया के व्यापारिक का्मों में सहयोग देने लगा। इस तरह
दीदी अब यहीं की होकर रह गई और दीदी घर की भी मुखिया बन
गई, घर का व्यौहार व व्यवस्था दीदी के हिसाब से चलती थी। भैया
भी पैसा लाकर दीदी के हाथों में ही देते, घर खर्चा दीदी के हिसाब
से चलता था।
उन्हीं दीदी की बेटी शिखा की शादी ओमप्रकाश कर रहें हैं ।
उन्होनें शीला को शादी से एक सप्ताह पूर्व आने के लिये कहा तो
शीला मना नहीं कर पायी और यहाँ शादी में आ गई उसके पति
मुकेश को भैया ने ही पढ़ाया लिखाया था अभी शासकीय सेवा में वे
दुसरे शहर में रह रहें हैं, और शादी में शामिल होने आये थे।
ओमप्रकाश तीन भाई और एक बहन थे। बचपन में ही छः माह
के अंतराल में माता-पिता का देहांत हो गया था। बहन श्यामा दीदी
की शादी हो चुकी थी। वह अपने ससुराल में रहती थीं। माता पिता
के देहान्त के बाद ओमप्रकाश पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई,
ओमप्रकाश यद्यपि ज्यादा बड़े नहीं थे 16 वर्ष की आयु में ही परिवार
की जिम्मेदारीयों ने उन्हें बड़ा बना दिया। अपने सीमित साधनों से
ओमप्रकाश ने अपना व्यापार सम्हाला और अपने भाईयों को पढ़ाया
भी।
माता पिता की अनुपस्थिति में ओमप्रकाश का आनाज का व्यापार
भी धीमा चला। गरीबी में दिन काटने पड़े। किसी भी तरह वह अपने
भाईयों को पढ़ाते रहे, मंझले भाई दिनेश को सरकारी नौकरी मिल
गई। ओमप्रकाश ने समयानुसार अपनी और भाई दिनेश की शादी
की। इस बीच श्यामा दीदी विधवा हो गई । उनके दो बच्चे थे। वे भी
मायके आती जाती रहती थी। धीरे धीरे ओमप्रकाश का व्यापार चल
पड़ा। ओममप्रकाश का अच्छा व्यापार देखकर दीदी का मायके के
प्रति आकर्षण बढ़ गया। वे अपने बेटे सुशांत को ओमप्रकाश के साथ
काम सीखने प्रेरित करती और अधिकतर समय यहीं रहने लगी।
कोई पूछता तो कहती श्रीदेवी बच्चा सम्हाल नही सकती, इसलिये वे
यहाँ रह रही हैं।
दिनेश की पत्नी सावित्री घर को सम्हालती थी। कभी कभी वह
पति के पास भी शहर भी चली जाती थी, तो दीदी कस्बे में ओमप्रकाश
के घर आकर रहती थी। भतीजे रूप के जन्म के समय ओमप्रकाश
दीदी को घर ले आये, तब सावित्री भी घर पर ही थी परन्तु दीदी
सावित्री के खिलाफ ओमप्रकाश के कान भरती रहती थी, धीरे धीरे
दीदी ने ओमप्रकाश के मन में सावित्री के प्रति कट्ता भर दी थी-
उनकी दृष्टि मे सावित्री उनकी पत्नी श्रीदेवी व बच्चे रूप का ध्यान
नही रखती। दीदी बड़ी-बड़ी बातें करके घर की मुखिया बन गई
और सावित्री परेशान होकर पति दिनेश के पास शहर चली गई।
दीदी बार बार ओमप्रकाश से कहती- "'तुमने भले ही भाईयों के लिये
इतना किया है, परन्तु देखना भाई तुम्हारे काम नही आयेंगें । अपनी
अपनी पत्नियों को लेकर शहर में ठाठ से रहते हैं, उन्होने तुम्हें कभी
पूछा भी है? तरह-तरह की बातें बनाकर दीदी भाइयों के प्रति भैया के कान भर देती थीं.
शिखा की शादी के अवसर पर शीला आठ दिन पहले अपने पुत्र
रघु को लेकर आ गई थी, परन्तु घर में उसके लिये कोई व्यवस्था
नही थी। दीदी दिन भर शादी की तैयारी में बाजार घूमती थीं। दीदी
जब राशन-दाल, चॉवल निकालकर दे तब तो खाना बने, भंडारे की
चाबी दीदी के पास रहती थी। दीदी सभी मिठाईयाँ व नमकीन, नाश्ते
का सामान ताले में रखी रहती थी। रघु के रोने पर शीला बाहर से
बिस्किट मंगाकर बच्चे को देती।
रघु को रोता देखकर ओमप्रकाश कहते "दीदी भंडारे का ताला
खोल दो।"
तो दीदी कहती "बहुयें घर सम्हाल नही पाती, इधर उधर बैठ
जाती हैं। नौकरानी सब गड़बड़ कर देगी।
शिखा के लिये शादी में देने हेतु ओमप्रकाश सोने का
सैट-हार-कंगन, अंगूठी व कानों के टॉप्स लाये, साथ ही अपनी
पत्नी के लिये कानों के टॉप्स भी लायें। सब सामान दीदी को देते हये
उन्हानें दीदी से कहा- "श्रीदेवी के लिये जो टॉप्स लाया हूँ, आप उसे
अभी पहनने को दे देना।"
दीदी बोली- "श्रीदेवी कुछ सम्हाल नहीं पाती हैं, सब तोड़ देगी
बाद में दूगीं। साड़ी तक तो वो सम्हाल नही पाती तो जेवर क्या
सम्हालेगी?"
ओमप्रकाश बोले- "अभी दे दो, उसके कान खाली है पहन
लेगी।"
अनमने मन से दीदी बोली- "देखेंगे ।"
परन्तु दीदी ने श्री देवी को टॉप्स नहीं दिये।
ओमप्रकाश ने बड़े ही धूमधाम से शिखा की शादी की। कन्यादान
भी ओमप्रकाश ने ही किया कन्यादान के समय थोड़ी देर के लिये
दीदी ने श्री देवी को उनका हार व टॉप्स पहनने के लिये दिये,
कार्यक्रम के फौरन बाद दीदी ने श्री देवी से टॉप्स व हार वापस लेकर
अपने पास रख लिये ।
शिखा की विदाई के समय सभी की ऑखों में ऑसू थे। बेटी को
विदा करना सरल नहीं होता। शीला की ऑखे बहन की विदाई की
याद करके कुछ ज्यादा ही नम थी। शिखा को विदा करते समय वह
सोच रही थी, प्रज्ञा भी विदा हो रही होगी परन्तु अपने मन की पीड़ा
को वह फिर पी गई।
ओमप्रकाश के मन में भाइयों के प्रति कटुता पैदा करके दीदी
अपना व अपने बच्चों का हित साधती रही। इधर रूप भी माँ की तरह
मंदबुद्धि निकला । उन्हें पढ़ाने के लिये स्कूल भेजा तो पढ़ नही पाया।
घर में टयूशन लगाकर पढ़ाने का प्रयास किया तो दीदी का हस्तक्षेप
बना रहता था - टीचर कभी डॉट या मार दे तो भी दीदी टीचर पर
भड़क जाती। कहती- "गुरूजी रूप को मारा मत करो, रूप हमारा
लाडला भितीजा है, घर में एक ही बच्चा है।"
गुरूजी कहते - "दीदी मैं इसको एक सप्ताह से पहाड़ा याद
करने बोल रहा हूँ, यह याद नही करता। मैं बार बार समझाकर थक
गया हूं।"
दीदी बोली- "आप थक गये हो तो रहने दो मत पढ़ाओ । हम्
बच्चे को पिटता नही देख सकते। बड़ा होकर खुद ही पढ़, लेगा।"
कहकर- दीदी ने गुरूजी की छुट्टी कर दी।
ओमप्रकाश से दीदी बोली कि "ठाकुर गुरूजी रूप को बहुत मार
रहे थे मुझसे देखा नही गया तो मैने गुरूजी की छुट्टी कर दी। देखा
नही जाता बेरहमी से मारते हैं गुरूजी लोग तो।"
ओमप्रकाश बोले- "ठाकुर गुरूजी अच्छा पढ़ाते हैं, इसलिये मैने
उनसे पढ़ाने के लिये कहा था। रूप ही पढ़ाई में ध्यान नहीं देता है ।"
दीदी बोली - "इतना जोर जोर से गुरूजी ने मारा और रूप
इतना रोया कि मै तो देख नहीं सकी क्या सब पढ़े लिखे ही दुनिया
में रहते हैं। बच्चे को मार मार कर आधा कर दे ऐसे गुरूजी को घर
में घुसने नहीं दूँगी। घर में भी बच्चा पिटे, स्कूल में भी पिटे ऐसे कैसे
वह जियेगा।" कहकर दीदी ने रूप की पढ़ाई बंद करवा दी।
ओमप्रकाश की बड़ी इच्छा थी, रूप को पढ़ाने की। उन्होने दूसरे
अध्यापक से बात करके टयूशन फिर चालू किया। एक महीने तक
उन्होने रूप को पढ़ाने का प्रयास किया परन्तु मंद बुद्धि रूप की पढ़ने
में रूचि नही थी, वह कुछ समझता ही नहीं था तो गुरूजी ने स्वयं
ही आना बंद कर दिया- ठाकुर गुरूजी का हाल वह सुन ही चुके
थे इसलिये वे भी आने से कतराने लगे। ले देकर रूप अक्षर ज्ञान व
थोड़ी गिनती ही सीख पाये। दिन भर इधर उधर घूमता कभी- कभी
अपने पिता के काम पर जाते तो वहाँ थोड़ी देर बैठकर फिर इधर
उधर चल देते थे।
ओमप्रकाश और दीदी ने सुशान्त की शादी कर दी धीरे धीरे घर
में दीदी का और व्यापार में सुशान्त का वर्चस्व बढ़ता गया।
कालान्तर में आयु बढ़ने पर ओमप्रकाश बीमार पड़े तो दिनेश
उन्हें इलाज हेतु शहर ले आये, शहर के बड़े अस्पताल में उनका
इलाज चलता रहा। ज्यादा तबियत खराब होने पर मुकेश व शीला
भी छुटटी लेकर ओमप्रकाश की देखभाल करने आ गये। छोटे दोनों
भाईयों ने ओमप्रकाश की बहुत सेवा की परन्तु ओमप्रकाश की तबियत
निरन्तर गिरती गई, इस बीच दीदी और सुशान्त कस्बे में ही रहे एक
दिन शहर आकर दीदी ओमप्रकाश की तबियत का हालचाल लेकर
और उनकी स्थिति खराब देखकर वापस घर लौट गई। 5 महीने की
बीमारी के बाद वे एक दिन संसार से विदा हो गये ।भईया के घर की मालकिन बनकर रहने वाली दीदी सिर्फ एक दिन थोड़ी देर के लिए आयीं.
ओमप्रकाश के पार्थिव शरीर को लेकर दिनेश, मुकेश सावित्री व
शीला अपने पैतृक घर पहुँचे। दाह संस्कार व अन्य कार्यक्रमों के बाद
बात आई कि श्रीदेवी और रूप की व्यवस्था किस तरह की जाये।
सबकी राय बनी कि सब घर में रहें, सुशान्त ओमप्रकाश का बिजनिस
देखें और रूप उनको मदद करें। "परन्तु सुशान्त और दीदी ने साफ
कह दिया कि हम इन दोनों की जिम्मेदारी नहीं ले सकते।"
दिनेश ने कहा "जब आप लोग भैया के साथ इतने दिन
रहकर सुख उठाये हो तो अब इन दोनों को कौन देखेगा? आप ही
देखों।"
जबकि भाभी के जेवर और भैया का पैसों का रखना उठाना सब दीदी के पास रहता था, अब दीदी ने साफ कह दिया कि मेरे पास उनका कुछ भी नहीं है. भैया की बीमारी के समय दीदी और सुशांत ने ना तो भैया की सेवा की और ना ही दबाई और अस्पताल का खर्चा किया वो सब खर्चा दिनेश और मुकेश ने उठाया.
सुशान्त ने स्पष्ट कहा- "हम स्वयं मेहनत करते थे। हमारी माँ
दिनभर सबको बना बनाकर खिलाती थी, हम पर किसी का एहसान
नही है। हम किसी को भी नहीं रख सकते हैं.
दिनेश ने कहा- "जब तुम लोग इन लोगों के लिये कुछ नही
कर सकते हो तो फिर इस घर में भी नही रह सकते।
सुशान्त ने कहा- हमने घर पहले ही खरीद लिया है हम उस
घर में चले जायेंगे।"
ओमप्रकाश के बिजनेस का लेनदेन सब सुशान्त को मालूम था।
वह पहले से ही अपनी व्यवस्था बनाता जा रहा था। ओमप्रकाश की
लम्बी बीमारी से वह पुरे व्यापार व लेन देन पर अपना वर्चस्व बना
चुका था। अनमने मन से पैतृक घर को खाली करके दीदी व सुशान्त
अपने घर में चले गये। मंदबुद्धि श्रीदेवी और रूप अकेले इतने बड़े घर
में रह नही सकते थे, इसलिये श्रीदेवी को मायके भेज दिया और रूप
मुकेश के साथ चाचा के घर आकर रहने लगे। पैतृक घर में ताला
लगाकर दोनों भाई- दिनेश और मुकेश-घर की देखभाल करने के
लिये सुशान्त के अतिरिक्त पड़ोसियों को बोल कर अपने अपने कर्तव्य
स्थल पर आ गये।
घर खाली करवाने से सुशान्त व दीदी बहुत नाराज थे। दीदी
की इच्छा घर पर व सब सामान पर कब्जा करने की थी, सो दीदी
ने दोनो भाईयों को कोर्ट से नोटिस भेजकर पैतृक घर में हिस्सा
मांगना प्रारम्भ कर दिया। बार बार पेशी होती तो दिनेश व मुकेश को
सरकारी नौकरी से छुटटी लेना पडता। वैसे भी ओमप्रकाश की लम्बी
बीमारी, उनके क्रियाकर्म व पारिवारिक विवाद के कारण उनकी
छुट्टियाँ बहुत हो चुकी थी- पेशी के कारण बार बार आने में बहुत
परेशानी होती थी व खर्चा भी, इसलिये दोनों भाई परेशान रहने लगे।
आखिरकार पैतृक घर को बेचकर दीदी का हिस्सा दीदी को
देकर मामला शांत किया गया।जिन्दगी भर भैया के घर और उनके व्यापार पर राज्य करने वाली दीदी और उनके बेटे सुशांत ने भैया के मरने पर अपनी जिम्मेवारी से बिल्कुल ही मुख मोड़ लिया. कोई सहारा भैया की पत्नी और बेटे को नहीं दिया उल्टा भाइयों पर केश कर दिया.
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
Email- Shiromanimathur@gmail.com
Contact- 9893742299