Paths - 12 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 12

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राहें - 12

नया घर
कई दिनों से अंकित के घर की सजावट हो रही थी। सुन्दर
भवन को रंग बिरंगी लाइट की झालरों से सजाया जा रहा था।
अभिषेक अपने पुराने घर के बरांडे में खड़े होकर अंकित जैन के भव्य
घर को देख रहा था। मन ही मन अपनी किस्मत पर कुढ़ता भी जा
रहा अभिषेक बचपन से एक ही स्कूल व कालेज में साथ साथ पढ़े
हैं, सोचता कहाँ उसका ऑलीशान घर कहाँ मेरा पुराने जमाने का
छोटा सा घर। उसे भी अपने लिये बड़े भव्य घर बनाने की इच्छा हुयी
और वह इन्ही सवालों में डूबा सोचता रहा। तभी आंकित ने उसे कार्ड
देते हुये कहा अभिषेक कल गृहप्रवेश का कार्यक्रम है तुम्हें आना
है,जरूर आओगे ना...
अपनी स्वप्न निंद्रा से जागता हुआ - अभिषेक बोला - आऊंगा
जरूर आऊंगा, बैठो अंकित कहते हुये उसने उसके लिये कुर्सी
खिसकायी-
अंकित बोला - अभी बैठने का समय नहीं हैं, कई जगह और
निमत्रंण देना है - कहते हुये अंकित बाहर आ गया और अभिषेक
भी उसके साथ साथ रोड पर आ गया दोनो ने एक दूसरे का
अभिवादन किया और अंकित अपनी बड़ी सी शानदार गाड़ी में बैठकर
चला गया, और अभिषेक को एक और पीड़ा दे गया। उसकी शानदार
गाड़ी देखकर अभिषेक और कुढ़ गया - मन ही मन सोचता रहा -
किसी को ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़कर देता है और कुछ
लोग एक एक चीज के लिये तरसते रह जाते हैं। कहाँ अंकित और
कहाँ मै ? नगर के उद्योगपति का बेटा और मै एक टीचर का बेटा

और साधारण सा क्लर्क, उसकी मेरी कोई बराबरी नही - वहॉँ बड़े
बड़े अधिकारी व नेता लोग होंगें - वहाँ जाकर मैं क्या करूंगा? वहाँ
बड़े बड़े लोगों के बीच अंकित मुझसे बात भी करेगा या नहीं? वह तो
साथ साथ पढ़ा हूँ इसलिये निमंत्रण पत्र दे गया वरना मेरी और
उसकी बराबरी क्या - काश मै भी उसके जैसे मकान बना पाता
सोचते सोचते अभिषेक घर के अन्दर आ गया।
पिता श्रीधर खाना खा रहे थे - बोले अभिषेक तुम भी खाना खा
लो - खाने का समय हो गया।
अभिषेक खाना खाने बैठ गया खाते खाते पिता से बोला -- अभी
अंकित गृह प्रवेश का कार्ड देने आया था बड़ा अच्छा घर बनवाया है
उसने।
पिता श्रीधर बोले - ठीक है चले जाना।
अभिषेक पापा हम भी तो अपने लिये नया घर बना सकते है।
क्या?
श्रीधर - क्यों नहीं बना सकते, परन्तु घर बनाने के लिये पैसे
चाहिये, पैसा कहाँ से आयेगा?
अभिषेक - गॉँव में अपनी खेती हैं, उसको बेच देते है उस पैसे
से घर बनवा लेते हैं - कहते हुये उसने पिता की ओर देखा -
श्रीधर बोले खेत बेच कर घर क्यों बनवाओगे ? कमाकर
बनाओ।
अभिषेक जितना वेतन मिलता है, उसमें घर बनाना कहाँ
संभव है? घर का गुजारा ही मुश्किल से होता है।
श्रीधर बोले - खेत बेचकर घर बनाना कहाँ की समझदारी है?
आज कल जमीन कहाँ मिलती है? प्रापर्टी क्यों बेची जाय?
अभिषेक खेती से आमदनी भी तो कुछ नहीं होती है, हम
लोग खेत देख भी नहीं पाते - घर बनायेंगें तो भी प्रॉपर्टी ही तो
बनेगी, पैसा व्यर्थ खर्च नहीं होगा।
श्रीधर - मैं खेत नहीं बेचूंगा - कहकर श्रीधर खाना खाकर उठ
गये।
दूसरे दिन अभिषेक झिझकते झिझकते अंकित जैन के घर
प्रोग्राम में इसलिये गया ताकि घर अन्दर से देख सके कि कैसा बना
है?
अन्य अतिथिजनों के साथ साथ वह भी नये घर को घूम घूम
कर देख रहा था, एक से एक शानदार कमरें और उससे संलग्न 
बाथरूम, शानदार लॉन, पोर्च अतिथि गृह - कमरों की शानदार
सजावट, कीमती झूमर, हर कमरें में कीमती शानदार फर्नीचर
अभिषेक एक एक चीज को गौर से देखता रहा और इष्या से कुढृता
रहा। यह सब देखकर उसके मन में अपना घर बनाने की इच्छा तीव्र
होती गई।
पार्टी से आकर वह पलंग में लेट गया। खेत बेचकर अपने लिये
भी ऐसा ही शानदार घर बनाने की इच्छा उसके मन में जागृत होती
गई सोचता रहा - पिताजी को सुबह और समझाऊंगा, मॉँ से
कहूंगा, वे भी पिताजी पर दबाव बनायेगी तो पिताजी जरूर मान
जायेंगें। रात भर अभिषेक नये घर के स्वप्न देखता रहा।
सुबह उठकर उसने अपनी मा से कहाँ - मम्मी अंकित का घर
बहुत अच्छा है - एक से एक सुन्दर कमरें हैं उनमें लगे मार्वल,
ग्रेनाइट व टाइल्स व उस घर की लाइट व्यवस्था बहुत अच्छी है।
माँ बोली - दूर से ही अच्छा दिखता है, अन्दर तो अच्छा होगा ही।
अभिषेक- अंकित ने कार्ड दिया था तो मैं अन्दर जाकर घर
देखकर आया हूँ। बहुत सुन्दर घर बना है। अपना घर तो रहने
लायक नहीं हैं छोटा है और पुराने टाइप का बना हैं - हम भी अपने
लिये अच्छा घर बना सकते हैं यदि पिताजी चाहें तो-
माँ - पिताजी क्यों नहीं चाहेंगें ? अच्छा घर किसे अच्छा नहीं
लगता ।
अभिषेक पापा गॉव में जो खेत है यदि उसे बेच दें, तो यहाँ
शहर में शानदार घर बना लेंगें, अचछे घर का प्रभाव ही अलग होता
है। मैं पापा से कई बार कह चुका हूँ परन्तु वे तैयार नहीं होते - आप
पापा को समझाकर खेत बेचने को तैयार करो।
श्रीधर खाना खाने बैठे तो अभिषेक की मम्मी निकिता उनके
पास बैठकर गॉँव का खेत बेचने के लिये बोली - जैसे ही खेत बेचने
की बात आयी, श्रीधर भड़क गये - और बोले अभिषेक कुछ करता
धरता है नही, उसे मकान बनाने का शौक लगा है, खेत क्यों बेचूंगा,
मैं जाकर खेत देखता हूँ, छुट्टी के दिन भी अभिषेक खेत नहीं जाता
है। जब से अंकित का घर बना है, खेत बेचने के लिये दबाव बना रहा
है। मुझसे भी कई बार कह चुका है, अब तुमसे कहलवा रहा है।
उसी समय अभिषेक अन्दर आकर बोला - कौन सा काम नहीं
करता जो कह रहे हो कुछ करता धरता नहीं हैं। ड्यूटी के
साथ-साथ घर के सभी काम करता हूँ, खेत जाता हूँ। आपकी आदत
है झूठ बोलने की, इसलिये कुछ भी कहते रहते हो, झुंझलाया
अभिषेक चिल्ला चिल्लाकर बोलने लगा।
श्रीधर बोले बदतमीजी मत कर तमीज से बात कर, मैं खेत
नहीं बेचूंगा - तू क्या कर लेगा मेरा?
अभिषेक बोला -मैं क्या कर लूंगा यह तो समय बतायेगा।
तुम्हारी आदत दकियानूसी है, ना ढंग से खा सकते, ना रह सकते,
ना ही दूसरों को रहने देते हो।
श्रीधर बोले - मुझे मत सिखा, मुझे अक्ल सिखाता है कमीना,
कुछ दम हो तो कुछ अच्छा धन्धा करता चार पैसे कमाता, कामचोर
घर में पड़े पड़े खाता है।
अभिषेक - डोकरा, कुछ भी बकता रहता है, कहते कहते
उसका चेहरा तमतमा गया वह गुस्से से भर गया।
निकिता दोनों को शांत करने का प्रयास करती रही, परन्तु दोनों
ही मानने को तैयार नही थे, दोनों का गुस्सा सातवे आसमान में था।

बात इतनी बड़ गई कि अभिषेक ने गुस्से में आकर चटनी पीसने
वाले सिल लोढ़ा का लोढ़ा उठाकर पिता के सिर पर फेंक कर मार
दिया, लोढ़ा लगते ही श्रीधर के सिर से खून की धारा फूट पड़ी।
जल्दी जल्दी उन्हें अस्पताल ले जाया गया। खून अधिक बह जाने
के कारण श्रीधर को बचाया नहीं जा सका।
अभिषेक को पिता का हत्यारा घोषित कर दिया गया और
पुलिस उसे गिरफ्तार करके ले गई। वर्षों कोर्ट में केस चला। घर
खर्च और कोर्ट खर्च के लिये पैसों की जरूरत पड़ती थी। माँ निकिता
दिन दिन भर रोती रहती। पति पुत्र के झगड़े में घर बरबाद हो गया, और निकिता घुट घुट कर जीती थी, रात रात भर वे सो नहीं पाती थी पति स्वर्ग सिधार गये, बेटा जेल में
सोच सोचकर वह बीमार रहने लगी। बेटे के गलत निर्णय के कारण पूरा घर बरबाद हो गया ।आखिर आर्थिक कारणों तथा
बेटे को बचाने के लिये निकिता को गाँव का खेत बेचना ही पड़ा । खेत बेचते समय निकिता की मनो व्यथा वही समझ सकती थी वो अपना दुख किसी से कह भी नहीं सकती थी वो बहुत व्यथित रहती थी, एक अनकहा दर्द एक बोझ उसके सीने पर जीवन भर रहा और वो जब तक जीवित रही तबतक घुटती रही।
                      छत्तीसगढ़ रत्न डॉ . शिरोमणि माथुर 
                       दल्ली राजहरा
                       Shiromanimathur@gmail.com 
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