वोआसमान में कनिष्क उड़ रहा था।
प्राणली उसकी पकड़ में थी।
नीचे जंगल था। पेड़ थे। अँधेरा था।
प्राणली छटपटा रही थी।
पर कनिष्क की पकड़ —
लोहे जैसी थी।
"देवी।" कनिष्क ने कहा। "अब गरुड़ लोक चलना होगा।"
"मैं कहीं नहीं जाऊँगी।"
"ये आपकी मर्ज़ी पर नहीं है।"
प्राणली ने चारों तरफ़ देखा।
रास्ता नहीं था।
तभी —
एक आवाज आई।
पत्तों की सरसराहट।
टहनियों का टूटना।
और अविराज निकला।
घायल था।
बाँह पर खून था।
चेहरे पर ख़रोंचें थीं।
पर आँखों में —
वो आग थी।
"प्राणली।"
उसने उसे देखा।
बस एक पल।
फिर कनिष्क को।
"छोड़ दो उसे।"
कनिष्क ने उसे देखा।
और हँसा।
पर इस बार हँसी में थकान थी।
"अविराज। तुम यहाँ?"
"हाँ।" अविराज ने तलवार निकाली। "यहाँ।"
कनिष्क ने एक पल सोचा।
फिर प्राणली को एक सैनिक के हवाले किया।
और तलवार उठाई।
"ठीक है।" उसने कहा। "पहले ये काम कर लेते है!
दोनों टकराए।
अविराज ने पूरी जान लगाई।
हर वार में।
हर क़दम में।
वो लड़ रहा था —
पर सालों की थकान थी उसमें।
घाव थे।
खून था।
कनिष्क ताज़ा था।
और क्रूर था।
धीरे-धीरे —
अविराज पीछे हटने लगा।
एक वार।
अविराज की तलवार छूट गई।
दूसरा वार।
वो घुटनों पर।
"अविराज!" प्राणली चीख़ी।
कनिष्क ने उसे देखा।
ऊपर से नीचे।
"सालों से प्राणली को चाहते थे।" उसने कहा। "और आज — उसी की वजह से मर रहे हो।"
अविराज ने ऊपर देखा।
आँखों में वो दर्द था —
जो तलवार के घाव से नहीं आता।
"हाँ।" उसने कहा। "पर उसके लिए मरना —"
एक पल रुका।
"— बुरा नहीं है।"
कनिष्क ने तलवार उठाई।
और सीने में उतार दी।
खच्छ्छ्छ।
प्राणली की चीख़ —
जंगल में गूँज गई।
"नहीं..........!!!!
वो दौड़ी।
सैनिक को धकेला।
और एक तलवार निकाल के कनिष्क की गर्दन पर रख।
दूर रहो ( उसने शौर्य से कहा)
देवी....आपके हाथों ने ये शोभा नहीं देती ( उसने प्रणाली को हल्के में लिया और आगे पढ़ने लगा)
प्रणाली ने तलवार चला दी ,जो गर्दन पर लगती लेकिन कनिष्क संभाला और तलवार उसके कंधे पर लग गई , कनिष्क की चीख निकली। वो शॉक हो गया,।
तुम्हारी जरूरत है इस बात के शुक्र मनाओ, वरना तुम्हारे प्रेमी के साथ तुम भी इसी हाल में होती। (वो बोला)
सैनिक आके प्रणाली को घेर लेते हैं।
तभी अविराज की आवाज़ आई : भाग जाओ.....
कनिष्क फिर अविराज के सामने था
प्रणाली ने सैनिकों को धकेला और अविराज के पास पहुँची।
उसके सामने आ गई —
कनिष्क और अविराज के बीच।
तलवार अभी भी कनिष्क के हाथ में थी।
"हटो देवी।"
"नहीं।"
"हटो—"
"नहीं!"
कनिष्क ने उसे धकेला।
ज़ोर से।
प्राणली दूर जाकर गिरी।
अविराज ने देखा।
उसने आख़िरी ताक़त से प्राणली का हाथ पकड़ा।
"भागो।"
"नहीं।" प्राणली उठी। उसके पास आई। "मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।"
"प्राणली—"
"नहीं।"
अविराज ने उसे देखा।
उन आँखों को।
जिन्हें वो बरसों से देखता आया था।
जो आज — पहली बार — सिर्फ़ उसके लिए काँप रही थीं।
उसके होंठों पर एक टूटी हुई मुस्कान आई।
"तुम हमेशा से ज़िद्दी थीं।"
ये डर मुझे खोने का डर जो मैं हमेशा से देखना चाहता था। वो आज उसकी आंखों में था, सिर्फ मेरे लिए ।
प्राणली की आँखें भर आईं।
अविराज : प्रणाली.....!
वो बस जी भारभक उसे देखना चाहता था।
वर्धान तक्षक गुफा की ओर जा रहा है ....
वो चल रहा है
की तभी उसे रास्ते में सय्यूरी मिली ।।।
तुम...? तुम यहां क्या कर रही हो ?( वर्धान ने पूछा)
सैय्यूरी टूटी हुई : तो इसी लड़की के लिए तुम गरुड़ लोक और मुझे छोड़ आए ....!
वर्धान चुप रहा ।
सय्यूरी भरी आवाज में : कोई बात नहीं , तुम..... जाओ।
वर्धान तक्षक गुफा की ओर जानेबक लिए आगे बढ़ा तभी सय्यूरी ने उसे रोका ।
वो प्रणाली को लेके उस तरफ गया है .... ।।( सय्यूरी गुफा से दूसरी तरफ इशारा करते हुए कहा)
वर्धान को थोड़ा अजीब लगा पर उसके पास सोचने का वक्त नहीं हवा, वो सय्यूरी की बात मानकर तक्षक गुफा की दूसरी तरफ चला गया ।
मुझे माफ करना वर्धान ( और उसकी नजरों के सामने एक फ्लैशबैक आया । कनिष्क : तुम वर्धान को मरते हुए तो नहीं देखना चाहती सय्यूरी, वर्धान उस लड़की के लिए सारे नियम तोड़ेगा जिससे गरुड़ लोक उसे छीन लिया जाएगा फिर वो कमजोर हो जाएगा ,फिर मै उसे मार दूंगा)
फ्लैशबैक एंड।
सय्यूरी: मैं बस तुम्हे जीवित रखना चाहती हूँ। इसलिए तुम्हे गलत रस्ता बताया।
इधर ।
कनिष्क आगे आया।
सैनिकों ने प्रणाली को घसीटा ।
"अलविदा।" उसने कहा।
आवाज़ में —
एक अजीब सा भारीपन था।
"मेरे दोस्त।"
अविराज ने उसे देखा और बोला
"दोस्त...? उसने दोहराया। "दोस्त होते तो आज ये नहीं करते।"
कनिष्क एक पल रुका।
"तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो।" उसने कहा। पर आवाज़ में कुछ था जो समझ नहीं आया। "और तुमने वो धागा काटकर — मेरे काम को चुटकी जितना आसान कर दिया।"
अविराज की आँखें बंद हो रही हैं।
वो जानता था।
"मुझे माफ़ कर देना प्राणली।" उसने फुसफुसाया।
प्रणाली वही से ;"अविराज—"
"माफ़ कर देना।"
और तभी —
खच्छ्छ्छ।
खच्छ्छ्छ।
खच्छ्छ्छ।
प्राणली चीख़ी।
"नहीं—! नहीं—!"
अविराज गिरा।
प्राणली ने थाम लिया।
उसे ज़मीन पर लिटाया।
हाथ उसके सीने पर।
खून बह रहा था।
बहुत।
"अविराज— अविराज देखो मुझे—"
उसने आँखें खोलीं।
बस थोड़ी सी।
"तुम... ठीक हो?"
"मैं ठीक हूँ। तुम ठीक हो जाओगे। तुम—"
"झूठी।"
उसके होंठों पर वो मुस्कान।
टूटी हुई।
पर थी।
वो अपनी आखिरी सांसों में बोला: मैने सिर्फ तुमसे... प्य...!
"मुझे पता है।" प्राणली ने कहा।
अविराज: मुझे वादा करो.....
प्रणाली : कुछ मत बोलो .....
वादा करो....अ अ..... अगले जन्म तुम मुझसे प्रेम करोगी....
आँसू गिर रहे थे।
प्रणाली कुछ न वो पाई..... बस राई जा रही है।
"मुझे पता था।"
अविराज ने उसका हाथ पकड़ा।
कसकर।
"ख़याल रखना अपना।"
और उसकी पकड़ —
ढीली हो गई।
प्राणली वहीं बैठी रही।
उसका हाथ अपने हाथों में लिए।
"अविराज .........!
कोई जवाब नहीं आया।
वो चीखी : कनिष्क............!
आवाज इतनी तेज थी कि जंगल के पत्ते भी ठिठक गए.....
दूसरी तरफ वर्धान : प्रणाली....
वो समझ गया कि उसे गुमराह किया गया है।
प्रणाली ने तलवार लेके कनिष्क पर अंधा वार करने लगी , कनिष्क भी उससे बच्चों की तरह लड़ने लगा।
काफी देर आराम से लड़ने के बाद अब उसने प्रणाली एक जानलेवा वार किया.....
और तभी —
जंगल में हवा बदली।
पत्ते उड़े।
कनिष्क ने पलटकर देखा।
वर्धान।
घायल।
पीठ से खून।
चेहरे पर थकान।
पर आँखों में —
वो आग।
जो बुझती नहीं।
जो बुझाई नहीं जा सकती।
उसने अविराज को देखा।
प्राणली को देखा।
और उसके जबड़े में —
कुछ कस गया।
कनिष्क ने तलवार उठाई।
और मुस्कुराया।
"बड़े भाईया। आ ही गए।"
वर्धान ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने तलवार निकाली।