दृश्य – कॉलेज नोटिस बोर्ड | सुबह
कॉलेज के नोटिस बोर्ड के सामने भारी भीड़ जमा है। हर तरफ बस एक ही शब्द गूँज रहा है—
Result… result…
छात्र व्याकुल होकर सूची में अपना रोल नंबर खोज रहे हैं। कोई खुशी से झूम रहा है, कोई उदास है, तो कोई डर के मारे आँखें मूँदे खड़ा है। दूर से करण, कबीर और श्रेया एक साथ आते हैं। तीनों के कदम धीमे हैं, पर साँसें तेज। दिल जोर-जोर से धड़क रहा है— क्योंकि यह सिर्फ परीक्षा का परिणाम नहीं था, यह उनकी मेहनत, रातों की जागती आँखों और एक-दूसरे के अटूट साथ का हिसाब था।
कबीर (घबराहट छुपाते हुए) बोला -
भैया… सच बताऊँ… अगर fail हो गया न, तो मैं यहाँ से सीधा हनुमान जी के मंदिर जा रहा हूँ।
श्रेया उसकी तरफ देखती है और हल्की सी मुस्कुराहट बिखेरती है— पर उसकी आँखों में तनाव साफ झलक रहा था।
श्रेया (धीमी आवाज़ में) बोली -
बस नाम मिल जाए… उतना ही काफी है।
करण कुछ नहीं बोलता। वह चुपचाप नोटिस बोर्ड की तरफ बढ़ता है— जैसे किसी युद्ध के मैदान में जा रहा हो। करण सूची के बिल्कुल सामने खड़ा हो जाता है। उसकी उँगली धीरे-धीरे ऊपर से नीचे तक रोल नंबरों का पीछा कर रही है। अचानक, उसकी उँगली एक जगह रुक जाती है।
करण (आँखें फाड़कर) बोला -
…यह… यह देखो!
कबीर और श्रेया दोनों झपटकर पास आ जाते हैं। बोर्ड पर अंकित होता है:
करण – 86%
श्रेया – 85%
कबीर – 84%
सिर्फ एक-एक अंक का फासला। कुछ सेकंड तक तीनों के बीच गहरी खामोशी छाई रहती है। फिर—
कबीर (चिल्लाते हुए) बोला -
अरे! हम तीनों टॉपर हैं?!
पूरा गलियारा उनकी आवाज़ से गूँज उठता है। श्रेया अपनी आँखों पर हाथ रख लेती है— जैसे उसे अपनी ही आँखों पर यकीन न हो रहा हो।
श्रेया (भरराई हुई आवाज़ में) बोली -
मैं… दूसरे स्थान पर…? सच में…?
करण उसे देखता है— उसकी आँखों में गर्व, सुकून और प्रेम की एक अनूठी चमक है।
करण (मधुर मुस्कान के साथ) बोला -
तुम सेकंड नहीं हो श्रेया… तुम हम दोनों की जान हो। अंक तो महज संख्याएँ होते हैं।
कबीर तुरंत दोनों को गले लगा लेता है।
कबीर (हँसी और आँसुओं के बीच) बोला -
एक-एक नंबर के अंतर से फर्स्ट, सेकंड, थर्ड… भगवान भी हमसे मुकाबला नहीं जीत पाए!
तीनों खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं।
कक्षा (Classroom) | कुछ समय बाद
कक्षा में teachar भी परिणाम पर चर्चा कर रही हैं।
Teachar (बोर्ड की तरफ इशारा करते हुए) बोली -
इस बार हमारी कक्षा के तीन विद्यार्थियों ने पूरे कॉलेज का नाम रोशन किया है।
पूरी कक्षा मुड़कर उन तीनों को देखने लगती है। वही छात्र जो कभी श्रेया का मजाक उड़ाते थे या कबीर को कमतर समझते थे— आज उनकी आँखों में सिर्फ हैरानी और सम्मान था। श्रेया थोड़ा संकोच में झुक जाती है— उसे अब भी इतने ध्यान (Attention) की आदत नहीं थी। कबीर उसके कान के पास फुसफुसाता है—
कबीर बोला -
देखा… जिन्हें लगता था तुम कमजोर हो… आज वही तुम्हारे लिए तालियाँ बजा रहे हैं।
करण (पीछे से धीमे स्वर में) बोला -
और यह तो बस शुरुआत है।
कॉलेज के बाहर | शाम
तीनों कॉलेज के मुख्य द्वार पर खड़े हैं। हाथ में परिणाम की पर्ची है और चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक असीम तृप्ति है।
श्रेया (धीमे से) बोली -
हम तीनों… एक साथ टॉपर बने....
कबीर (उसके कंधे पर हाथ रखकर) बोला -
क्योंकि हम तीनों… एक साथ ही तो लड़े थे।
करण आसमान की तरफ देखते हुए एक गहरी साँस लेता है।
वो बोला -
ज़िन्दगी ने बहुत इम्तिहान लिए… पर जब तक हम तीनों साथ हैं, कोई भी इम्तिहान बड़ा नहीं है।
तीनों एक-दूसरे की ओर देखते हैं और बिना कुछ कहे समझ जाते हैं— यह सिर्फ अंकों का परिणाम नहीं था, यह उनके अटूट रिश्ते की जीत थी।
रात गहरी हो चुकी थी। कमरे की बत्तियाँ बुझी हुई थीं, बस खिड़की से आती हल्की-सी चाँदनी पूरे कमरे को नर्म उजाले से भर रही थी। दिन भर की भागदौड़, परिणाम का उत्साह और मन का बोझ—सब अब जैसे धीरे-धीरे उतर रहा था। तीनों बिस्तर पर लेटे थे।
श्रेया बीच में थी—शांत, स्थिर और सुकून से भरी हुई।
करण उसका सीना अपना तकिया बनाए लेटा था।
उसका एक हाथ श्रेया के सीने पर रखा था, जैसे दिल की धड़कन को थामे हुए हो। उसकी साँसें अब सामान्य हो चुकी थीं, चेहरे पर वह मुस्कान थी जो बहुत कुछ जीत लेने के बाद आती है।
दूसरी ओर कबीर था। वह श्रेया के सीने पर सिर रखे, उसकी कमर को थामे, उसके पैरों पर अपने पैर टिकाए लेटा था, बिलकुल किसी छोटे बच्चे की तरह, जिसे माँ की गोद मिल गई हो। उसके चेहरे पर निश्छल संतोष था, जैसे आज उसे डरने की कोई ज़रूरत ही न हो।
कुछ देर तक कमरे में सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।
फिर करण ने धीरे से कहा—
आज बहुत समय बाद… मन बिल्कुल हल्का लग रहा है।
श्रेया ने उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए उत्तर दिया—
श्रेया बोली -
क्योंकि आज हम सिर्फ पास नहीं हुए…आज हमने खुद को साबित किया है।
कबीर ने आँखें बंद किए-बंद किए ही मुस्कुराकर कहा और मैंने तो मान ही लिया था कि मैं हमेशा पीछे रह जाऊँगा…पर आज तीसरा सही, पर टॉपर तो बना।
श्रेया ने हल्की हँसी के साथ उसकी पीठ थपथपाई—
श्रेया बोली -
तीसरा नंबर नहीं होता कबीर जी…तीसरा भी जीत ही होता है।
करण ने सिर थोड़ा उठाकर दोनों को देखा। उसकी आँखों में भावुकता थी। ऐसी भावुकता, जो शब्दों में नहीं उतरती।
करण बोला -
तुम दोनों को इस तरह अपने पास देखकर…मुझे लगता है जैसे ज़िंदगी ने आज पहली बार मुझे पूरा स्वीकार किया हो।
कबीर ने धीरे से श्रेया की कमर को और कसकर थाम लिया—
कबीर बोला -
भैया…अगर आप नहीं होते तो मैं कभी यहाँ तक नहीं पहुँच पाता।
करण ने बिना कुछ कहे उसका सिर सहला दिया।
उस स्पर्श में भाई का अपनापन भी था और पिता जैसा भरोसा भी। कमरे में फिर से खामोशी छा गई, पर यह खामोशी भारी नहीं थी, यह वह खामोशी थी जिसमें दिल आराम करता है। श्रेया की आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। उसके होंठों पर संतुष्टि की मुस्कान थी।
श्रेया (नींद में डूबती आवाज़ में) बोली -
आज… बहुत अच्छा दिन था।
कबीर बुदबुदाया—
और कल… इससे भी अच्छा होगा।
करण ने गहरी साँस ली और आँखें बंद कर लीं—
करण बोला -
जब तक हम साथ हैं…हर दिन अच्छा ही होगा।
तीनों एक-दूसरे के साए में सिमटे हुए थे, बिना किसी डर, बिना किसी शिकायत के।
उस रात न कोई टॉपर था, न पहला, न दूसरा, न तीसरा
सिर्फ तीन दिल थे, जो एक-दूसरे के साथ पूरी तरह सुरक्षित थे। और चाँदनी चुपचाप यह सब देख रही थी।
रात की शांति अब भोर में बदल रही थी।
खिड़की से आती हल्की-सी धूप ने कमरे में दस्तक दी,
जैसे धीरे से पूछ रही हो—
सब ठीक है?
श्रेया की नींद सबसे पहले खुली। वह ज़रा-सा हिली, लेकिन दोनों को वैसे ही सोया देख रुक गई। एक ओर करण थका हुआ, मगर चेहरे पर सुकून।
उसकी भौंहों के बीच की वह पुरानी शिकन आज भी थी, जो उसने ज़िम्मेदारियों से पाई थी।
दूसरी ओर कबीर—
अब भी बच्चे की तरह श्रेया से लिपटा हुआ। नींद में भी उसकी उँगलियाँ उसकी दुपट्टे को पकड़े थीं, जैसे छूट जाने का डर हो। श्रेया ने दोनों को देखा और उसकी आँखें भर आईं।
वह उठी नहीं। बस धीरे-धीरे, बहुत संभलकर हिल गई
ताकि दोनों की नींद न टूटे। उसने पहले करण के माथे पर हाथ रखा।
श्रेया (मन ही मन) बोली -
आप कभी खुद के लिए जिए ही कहाँ…हमेशा सबका बोझ उठाते रहे।
फिर उसने कबीर के बालों में उँगलियाँ फेरीं।
श्रेया (धीमी आवाज़ में) बोली -
और आप…इतने डरे-डरे से बच्चे, जिसे हर पल किसी के साथ की ज़रूरत रही।
उसने दुपट्टा ठीक किया और दोनों के ऊपर सावधानी से ओढ़ दिया, जैसे कोई माँ अपने बच्चों को ठंड न लग जाए, इस डर से रात भर जागती रहती है।
कबीर नींद में बुदबुदाया—
मत जाना…मुझे अकेला मत छोड़ना…।
श्रेया का दिल काँप गया। उसने झुककर कबीर के माथे को चूमा—
श्रेया बोली -
मैं यहीं हूँ…कहीं नहीं जा रही।
करण ने भी करवट बदली। नींद में उसका हाथ आगे बढ़ा और श्रेया की कलाई को थाम लिया।
करण (नींद में) बोला -
सब ठीक है न…?
श्रेया की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन होंठों पर मुस्कान थी।
श्रेया बोली -
हाँ करण जी…जब तक मैं हूँ, सब ठीक है।
उसने दोनों के हाथ अपने हाथों में ले लिए। उस पल वह प्रेमिका नहीं थी, पत्नी नहीं थी, वह कोई कमज़ोर लड़की नहीं थी वह माँ थी। वह माँ, जो अपने बच्चों के दर्द को बिना कहे समझ जाती है। जो खुद टूटकर भी
उनके लिए मज़बूत बनी रहती है। कुछ देर बाद दोनों की नींद खुली। कबीर ने आँखें खोलीं और खुद को वैसे ही सुरक्षित पाया।
कबीर (हैरान होकर) बोला -
तुम कब जागीं…?
श्रेया मुस्कुरा दी—
श्रेया बोली -
माँ तो बच्चों से पहले ही जाग जाती है।
कबीर ठिठक गया। उसकी आँखें भर आईं। करण भी उठ बैठा। उसने श्रेया को देखा , थकी हुई, मगर स्थिर।
करण (धीरे से) बोला -
तुमने…हमें हमेशा ऐसे ही संभाला है न?
श्रेया ने सिर झुका लिया।
श्रेया बोली -
क्योंकि आप दोनों…मेरी ज़िम्मेदारी हो।
कबीर ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया—
कबीर बोला -
तुम सिर्फ हमारी जान नहीं हो श्रेया...तुम हमारी माँ भी हो।
करण ने कुछ नहीं कहा। बस उसका सिर श्रद्धा से झुक गया। उस कमरे में तीन दिल धड़क रहे थे, पर उनमें से एक दिल दो और दिलों को माँ-सा सहारा दे रहा था।
और उसी साये में तीनों ज़िंदा थे।