ishk aur ashk - 82 in Hindi Love Stories by Aradhana books and stories PDF | इश्क और अश्क - 82

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इश्क और अश्क - 82

दूल्हे राजा... बहुत जच रहे हो।”
अविराज ने पलटकर देखा।
कनिष्क।
दरवाज़े पर टिका हुआ… बाँहें सीने पर…
चेहरे पर वही मुस्कान — जिसमें हमेशा कुछ छुपा होता था।
अविराज (सपाट, ठंडे स्वर में):
“क्या चाहते हो कनिष्क?”
कनिष्क अंदर आया…
दरवाज़ा बंद किया…
धीरे से… बहुत धीरे से…
जैसे हर आवाज़ को भी सुनने की इजाज़त न हो।
कनिष्क (हल्की मुस्कान के साथ):
“बस देखने आया था…
मेरा दोस्त आज दूल्हा बन रहा है…
और उसके चेहरे पर खुशी नहीं है।”
अविराज:
“खुशी है।”
कनिष्क (धीरे, काटते हुए):
“झूठ…”
वह उसके बिल्कुल करीब आ गया।
इतना करीब कि उसकी साँसें तक महसूस हो रही थीं।
कनिष्क:
“मैं तुम्हें जानता हूँ, अविराज…
तुमसे बेहतर… शायद तुम खुद को नहीं जानते।”
अविराज चुप रहा।
उसकी उंगलियाँ मुट्ठी में कस गईं।
कनिष्क ने उसके कंधे पर हाथ रखा…
धीरे… लेकिन भारी।
कनिष्क (फुसफुसाते हुए):
“वो तुम्हारी नहीं है…
कभी थी नहीं…
और आज भी नहीं होगी…”
अविराज (तेज़, दबा हुआ गुस्सा):
“बंद करो।”
कनिष्क:
“सच कड़वा होता है…”
उसकी आँखों में अब खेल नहीं था…
सिर्फ़ एक खतरनाक सच्चाई थी।
कनिष्क:
“उसका दिल किसी और के पास है…
किसी ऐसे के पास…
जो उससे सिर्फ़ उसकी शक्तियों के लिए मिला…”
अविराज की नज़रें बदल गईं।
अविराज:
“क्या मतलब?”
कनिष्क मुस्कुराया…
इस बार थोड़ा और गहरा… थोड़ा और खतरनाक…
कनिष्क:
“तुम जानना नहीं चाहोगे…
कि वो कौन है जिसने तुम्हारी मंगेतर को तुमसे दूर किया…?”
अविराज कुछ समझ नहीं पाया…
बस उसे घूरता रहा।
कनिष्क (धीरे-धीरे जाल बुनते हुए):
“वो भी मेरी तरह एक गरुड़ है…”
(वो हल्का सा हँसा… लेकिन उस हँसी में ज़हर था)
“और जानते हो क्या…
वो राजा है वहाँ का…”
अविराज का चेहरा एक पल में बदल गया।
अविराज (हैरानी में):
“क्या… ये नहीं हो सकता…”
कनिष्क (तेज़, वार करते हुए):
“तुम्हारी मंगेतर…
उसके लिए गरुड़ लोक के राजा बने रहने की चाबी है…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अविराज की साँसें भारी हो गईं।
कनिष्क उसके चारों तरफ़ घूमते हुए बोला—
कनिष्क:
“मैं तो तुम्हारा दोस्त हूँ…
और अमन का मसीहा…
जो धरती पर सिर्फ़ अमन चाहता है…”
(वह उसके सामने रुकता है… आँखों में सीधा देखता हुआ)
“तुम देखना…
वो आएगा…
तुम्हारी शादी में…”
(हल्का सा झुककर, लगभग फुसफुसाते हुए)
“और कोई छलावा करेगा…”
एक पल की खामोशी…
फिर—
“बस बताने आया था…”
अगले ही पल—
वो हवा में गायब हो गया।
कमरे में सिर्फ़ अविराज खड़ा था…
और उसके अंदर टूटता हुआ भरोसा।



(Flashback)
जब अविराज युद्ध के लिए दूसरे देश गया था तब
अविराज तलवार चलाने की practice कर रहा है।
उसकी चाल तेज़… वार सटीक… लेकिन आँखों में बेचैनी।
तभी पीछे से एक आवाज़ आती है—
“वार अच्छा है… पर इरादा कमज़ोर है।”
अविराज पलटता है।
एक अनजान युवक…
काले वस्त्र… चेहरे पर हल्की मुस्कान… आँखों में अजीब-सी चमक—
कनिष्क।
अविराज (सतर्क होकर):
“कौन हो तुम?”
कनिष्क (आराम से आगे बढ़ते हुए):
“जो तुम्हें हराने आया है…”
अविराज हल्का सा मुस्कुराया—
“कोशिश कर लो।”
अगले ही पल—
तलवारों की टकराहट।
तेज़ वार… पलटवार…
दोनों बराबरी पर।
कुछ ही देर में दोनों रुकते हैं…
साँसें तेज़… लेकिन चेहरे पर respect।
कनिष्क (हाथ आगे बढ़ाते हुए):
“नाम—कनिष्क।”
अविराज (हाथ मिलाते हुए):
“अविराज।”
उस दिन से—
practice… लड़ाई… हँसी… बहस…
सब साथ होने लगा।
धीरे-धीरे—
दोनों सिर्फ़ योद्धा नहीं…
दोस्त बन गए। 

Scene change 
जब अविराज को बीजा पुर पर हुए गरुड़ हमले का पता चला तब !

अविराज गुस्से में कनिष्क के पास पहुँचता है।
अविराज (गुस्से में):
“ये सब तुमने किया है?!”
कनिष्क (हैरान, तुरंत):
“नहीं! अविराज, मैं कसम खाता हूँ—इस हमले में मेरा कोई हाथ नहीं है!”
अविराज (चीखते हुए):
“झूठ!!
गरुड़… और तुम कह रहे हो तुम्हारा हाथ नहीं?!”
कनिष्क (बेचैन होकर):
“ये हमला… वर्धान की तरफ से हुआ है!”
एक पल की खामोशी…
अविराज (ठंडे, टूटे हुए स्वर में):
“और तुम चाहते हो मैं ये मान लूँ…?”
कनिष्क उसकी तरफ बढ़ता है—
कनिष्क:
“मैं तुम्हारा दोस्त हूँ अविराज… मैं तुम्हें धोखा नहीं दे सकता…”
अविराज एक कदम पीछे हट जाता है।
अविराज (आँखों में दर्द और गुस्सा):
“बस…
आज के बाद… हमारा कोई रिश्ता नहीं।”
ये सुनते ही—
कनिष्क जैसे अंदर से टूट जाता है…
लेकिन चेहरे पर कुछ नहीं दिखाता।
कनिष्क (धीरे, दबे दर्द में):
“एक दिन… तुम सच जानोगे…”
अविराज:
“उस दिन… मैं तुम्हें माफ़ नहीं करूँगा।”

और तब से अविराज और कनिष्क की कोई बात नहीं हुई! 


शहनाई बज रही थी।
फूलों की माला मंडप के हर खंभे पर लिपटी थी। दीपों की लौ हवा में काँप रही थी — जैसे वो भी कुछ जानती हों। जैसे वो भी डरी हों।
बाहर लोग थे। हँसी थी। ढोल था।
पर भीतर —
भीतर एक अजीब सा सन्नाटा था।
प्राणली दर्पण के सामने बैठी थी।
दासियाँ उसके बाल सँवार रही थीं। एक माथे पर टीका लगा रही थी। एक हाथों में चूड़ियाँ पहना रही थी।
लाल और सोने का जोड़ा।
मेहंदी जो कल रात लगी थी — अभी भी गहरी थी। रची हुई।
जितनी गहरी मेहंदी — उतना प्यार।
दासी ने हँसते हुए कहा था।
प्राणली ने दर्पण में खुद को देखा।
सुंदर थी।
पर आँखें —
आँखें कहीं और थीं।
वो आएगा?
नहीं आएगा?
आना भी चाहिए उसे?
उसने खुद से ही सवाल किया। और खुद ही चुप हो गई।
एक दासी ने धीरे से कहा — "राजकुमारी... बहुत सुंदर लग रही हैं आप।"
प्राणली ने हल्के से मुस्कुराई।
वो मुस्कान होंठों तक थी।
आँखों तक नहीं पहुँची।


प्राणली बाहर आई।
लाल और सोने का जोड़ा। माथे पर टीका। हाथों में मेहंदी।
परास एक पल के लिए रुक गया।
कितनी सुंदर है।
और कितनी उदास।
"चलना है?" उसने बस इतना पूछा।
प्राणली ने एक बार आसमान की तरफ़ देखा।
फिर धीरे से बोली — "हाँ।"
मंडप में जब वो पहुँची —
अविराज पहले से बैठा था।
उसने प्राणली को देखा।
और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल — उसकी साँस रुकी।
इतने सालों बाद भी।
इतने सालों बाद भी वो उसे देखकर ऐसा ही महसूस करता था।
पर प्राणली की आँखें उस पर नहीं थीं।
वो कहीं और थीं।
किसी और को ढूँढ रही थीं।
अविराज ने नज़रें झुका लीं।

दोनों मंडप में बैठे ।।।
पंडित ने मंत्र शुरू किए।।।।