"वर्धान — छोड़ो उसे!"
सायूरी आ गई थी।
उसने दोनों को अलग किया — वर्धान को पीछे खींचा, कनिष्क को छुड़ाया।
कनिष्क उठा।
कपड़े झाड़े।
और मुस्कुराया — उसी इत्मीनान से।
"अरे वाह..."
उसकी नज़र सायूरी पर गई —
"मेरी भाभी प्रतियोगिता की उम्मीदवार नंबर दो।"
और बिना एक पल रुके — वो चला गया।
पत्तों के बीच से। आराम से। जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
वन में अब सिर्फ दोनों थे।
सायूरी ने कनिष्क की पीठ देखी — फिर वर्धान की तरफ मुड़ी।
"भाभी प्रतियोगिता...?"
उसकी आवाज़ में हैरानी थी — पर आँखों में कुछ और था।
"यह सब क्या है वर्धान?"
वर्धान ने उसे नहीं देखा।
"कुछ नहीं।"
"मुझसे दूर रहो।"
और चलने लगा।
सायूरी ने उसका हाथ पकड़ा — खींचा — और गुस्से में बोली —
"वर्धान! मेरे साथ यह खेल मत खेलो!"
वर्धान रुका। पर मुड़ा नहीं।
"मैं तुम्हारी होने वाली पत्नी हूँ — और गरुड़ लोक की होने वाली..."
"रानी?"
वर्धान मुड़ा।
धीरे से। दबे पाँव।
आँखों में आग नहीं थी — कुछ और था। ठंडा। खतरनाक।
"पत्नी? रानी?"
उसने एक पल रुककर देखा —
"अच्छा... तुम?"
"ओह..."
"तो... क्या करूँ?"
और पीछे चलने लगा।
सायूरी की आँखें भर आईं।
"जब मदद चाहिए थी — तब तो बहुत कह रहे थे कि तुम्हारी ज़िंदगी में कोई और नहीं है।"
वर्धान रुक गया।
पीछे मुड़ा।
एक कदम करीब आया —
"72 घंटे के लिए शक्तियां क्षीण हो जाती है ये बात सिर्फ तुम्हे ही पता थी न?
रुका।
आँखों में सीधे देखा —
"यह बात सिर्फ तुम्हें ही पता थी न?"
सायूरी ने आँखें झुका लीं —
"क्या...? मैंने तो किसी को नहीं बताया..."
वर्धान ने सुना।
और बिना एक शब्द कहे —
वो वहाँ से निकल गया। 😢
और महल आया
महल में वर्धान के कदम तेज़ थे।
चेहरे पर कोई भाव नहीं था — पर आँखों में एक फैसला था।
सारे सैनिक और दूत सामने आए।
वर्धान रुका।
और बोला —
"सुनो।"
एक पल की ख़ामोशी।
"बीजापुर की तरफ जो भी पहरेदारी है — आज से हटा लो।"
सैनिक चौंके —
"पर राजकुमार... वो राज्य—"
"हटा लो।"
आवाज़ में कोई बहस की गुंजाइश नहीं थी।
"आज के बाद — बीजापुर की तरफ कोई दूत नहीं जाएगा। कोई सैनिक नहीं जाएगा।"
उसने सबकी आँखों में देखा —
"और जो गया..."
एक पल रुका —
"उसे देशद्रोह माना जाएगा।"
कक्ष में सन्नाटा था।
कोई नहीं बोला।
वर्धान मुड़ा — और अपने कक्ष की तरफ चला गया।
कक्ष में अकेला था।
खिड़की के पास आया।
बाहर गरुड़ लोक था — उसका राज्य। उसकी ज़िम्मेदारी।
पर नज़रें —
नज़रें धरती की तरफ थीं।
"अब कोई रास्ता नहीं है।" — उसने मन में कहा।
"कनिष्क यहाँ है।"
और वो गरुड़ लोक को पाने के लिए कुछ भी कर सकता है
आँखें बंद कर लीं।
प्रणाली।
वर्धान ने खिड़की बंद की।
और पलटा।
"दूत!"
एक पल में — एक गरुड़ दूत सामने था। सिर झुकाए।
वर्धान ने उसे देखा — आवाज़ शांत थी पर आँखों में एक तीखापन था।
"पाताल लोक जाओ।"
"पता लगाओ — कनिष्क वहाँ था भी या नहीं।"
"कितने दिन रहा। किससे मिला। और वापस कब निकला।"
दूत ने सिर झुकाया —
"जो आज्ञा।"
और अगले ही पल — वो जा चुका था।
वर्धान फिर से खिड़की के पास आया।
आँखें धरती की तरफ थीं।
"कनिष्क — तुम जो भी सोच रहे हो..."
होंठ भिंच गए —
"...वो होने नहीं दूँगा।"
बीजापुर के राजमहल में आज रौनक थी।
हर तरफ फूलों की सजावट हो रही थी। दासियाँ इधर उधर भाग रही थीं। रसोई से मिठाइयों की खुशबू आ रही थी।
राजा अग्रेद के चेहरे पर वो संतोष था — जो शायद सालों बाद आया था।
"जल्दी करो! मेहंदी की रस्म की तैयारी पूरी होनी चाहिए!"
दासियाँ और तेज़ हो गईं।
पारस एक खंभे के पास खड़ा था — हाथ बाँधे। चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी जो वो छुपाने की कोशिश कर रहा था।
मालविका फूलों की माला देख रही थीं — पर नज़रें बार बार एक कमरे की तरफ जाती थीं।
"पारस..." — उन्होंने धीरे से कहा।
"जी माँ।"
"प्रणाली को बुलाओ।"
पारस ने एक पल रुककर — माँ को देखा।
और चला गया।
प्रणाली अपने कक्ष में थी।
खिड़की के पास बैठी — बाहर देख रही थी।
पर देख नहीं रही थी।
आँखें खुली थीं — पर मन कहीं और था।
नदी किनारे।
उन पेड़ों के पास।
और वो एक शब्द —
"जाओ।"
तभी — दरवाज़ा खुला।
पारस।
"प्रणाली।"
उसने ऊपर देखा। हल्की मुस्कान दी —
"आओ।"
पारस अंदर आया। उसके पास बैठ गया।
कुछ देर चुप रहा।
फिर धीरे से —
"माँ ने बुलाया है। मेहंदी की रस्म शुरू होने वाली है।"
प्रणाली ने सिर हिलाया —
"हाँ। आती हूँ।"
पारस उठने लगा — फिर रुका।
"प्रणाली..."
"हम्म?"
वो कुछ कहना चाहता था — आँखों में सवाल था। पर शब्द नहीं आए।
"कुछ नहीं।" — उसने कहा। "चलो।"
आँगन में मेहंदी की रस्म शुरू हो चुकी थी।
प्रणाली एक चौकी पर बैठी थी — लाल दुपट्टा ओढ़े। दासियाँ उसके इर्द गिर्द थीं।
मेहंदी वाली बैठ गई — और उसका हाथ थाम लिया।
ठंडी मेहंदी हाथ पर लगी —
प्रणाली ने नीचे देखा।
धीरे धीरे — एक बेल बन रही थी। फूल बन रहे थे। पत्तियाँ बन रही थीं।
सुंदर था।
पर —
यह हाथ जिसने किसी और को थामा था।
यह हाथ जो आज भी उसे ढूँढता था।
आँखें भर आईं — पर उसने पलकें झपकाईं।
नहीं।
आज नहीं।
मालविका पास आईं —
"कैसी लग रही है मेहंदी?"
प्रणाली ने ऊपर देखा —
"सुंदर है माँ।"
मालविका ने उसका चेहरा देखा — एक लंबी नज़र से।
फिर धीरे से उसके पास बैठ गईं।
"खुश हो न बेटा?"
प्रणाली की आँखों में कुछ काँपा।
पर होंठों पर मुस्कान आ गई —
"हाँ माँ।"
मालविका ने उसे गले लगा लिया।
और प्रणाली —
माँ के कंधे पर सिर टिकाए —
अंदर से टूटती रही।
पर बाहर से —
मुस्कुराती रही। 😢💔
थोड़ी देर बाद —
दासियाँ गाने लगीं। मेहंदी के गीत।
महल में हँसी थी। खुशी थी।
प्रणाली बैठी रही — मुस्कुराती रही।
पर जब कोई नहीं देख रहा था —
उसने एक बार अपने हाथ को देखा।
मेहंदी की बेल में —
उसे एक चेहरा दिखा।
वही आँखें। वही मुस्कान।
उसने नज़रें हटा लीं।
"बस करो प्रणाली।" — उसने मन में कहा।
"बस करो।"
रात हो गई सारे मेहमान चले गए , प्रणाली अपने कमरे में बैठी अपनी मेहंदी देख रही है ।
ठीक हो??? ( पीछे से पारस की आवाज आई )
वो चौक गई।
भैया आप ...? (प्रणाली)
परास ने विश्वास के साथ कहा:
ये विवाह नहीं करना न आपको, आप बताइए.... आपके भाई में इतना सामर्थ्य है कि वो अपनी बहन के लिए एक राज्य तो क्या दो लोको से लड़ जाए!!!!
इतना सुनते ही वो अपने भाई के गले से लग गई और खूब रोई ।
भैया अविराज बहुत अच्छा है ,कोई कमी नहीं है उसमें, बस में उससे प्रेम नहीं करती।।।। (प्रणाली के रोते रोते कहा)