गिरगिट को रंग बदलते हुए तो हम सभी ने कभी न कभी देखा है।
वह अपनी सुरक्षा के लिए, परिस्थितियों के अनुसार अपना रंग बदलता है। यह उसकी प्रकृति है, उसका अस्तित्व बचाने का तरीका है।
लेकिन क्या आपने कभी इंसानों को रंग बदलते देखा है?
शायद देखा नहीं, पर महसूस ज़रूर किया होगा—अपने ही लोगों में, अपने ही रिश्तों में, अपने ही करीबियों के व्यवहार में।
इंसान का रंग उसके चेहरे से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, शब्दों और समय के साथ बदलते रवैये से पहचाना जाता है।
जब तक स्वार्थ जुड़ा होता है, तब तक अपनापन भी गहरा लगता है। बातें मीठी लगती हैं, वादे सच्चे लगते हैं, और साथ हमेशा का प्रतीत होता है।
लेकिन जैसे ही परिस्थितियाँ बदलती हैं, वैसे ही कई चेहरों के असली रंग सामने आने लगते हैं।
जो लोग कल तक हर मुश्किल में साथ खड़े होने का वादा करते थे, वही आज सबसे पहले दूरी बना लेते हैं।
जो हाथ कभी सहारा देते थे, वही हाथ एक दिन पीछे हट जाते हैं।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब यह बदलाव किसी अजनबी में नहीं, बल्कि अपने कहे जाने वाले लोगों में दिखाई देता है।
क्योंकि अजनबी से उम्मीद नहीं होती, लेकिन अपनों से होती है।
एक साधारण-सा उदाहरण देखिए—
जब किसी इंसान के पास पैसा, सफलता और नाम होता है, तब उसके आसपास लोगों की भीड़ लगी रहती है।
हर कोई उसका अपना बनना चाहता है, हर कोई उसके साथ तस्वीर में दिखना चाहता है।
उसकी हर बात पर लोग मुस्कुराते हैं, उसकी हर गलती को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
लेकिन वही इंसान जब किसी कठिन समय से गुजरता है—
जब उसके पास न पैसा बचता है, न वही पहचान,
तब धीरे-धीरे वही लोग दूर होने लगते हैं।
फोन आना बंद हो जाते हैं, हाल पूछने वाले गायब हो जाते हैं,
और जो लोग “हमेशा साथ” का वादा करते थे,
वही सबसे पहले रास्ता बदल लेते हैं।
तभी समझ आता है कि लोग व्यक्ति से नहीं,
उसकी परिस्थितियों से जुड़े थे।
उनका प्यार इंसान से नहीं,
उसकी सुविधा और चमक से था।
यही वह क्षण होता है,
जब चेहरों के असली रंग साफ दिखाई देते हैं।
लेकिन क्या सच में गलती सिर्फ रंग बदलने वालों की होती है?
या फिर कहीं न कहीं हमारी भी होती है, जो आँख बंद करके भरोसा कर लेते हैं?
मेरे विचार से यहाँ सबसे बड़ी गलती “उम्मीद” की होती है।
हम अक्सर गलत लोगों को सच्चा मान बैठते हैं, उनके शब्दों को अपना सहारा समझ लेते हैं, और फिर उनसे वैसी ही वफ़ादारी की उम्मीद करने लगते हैं, जिसकी क्षमता शायद उनमें कभी थी ही नहीं।
जो लोग रंग बदलते हैं, वह तो बस अपना स्वभाव दिखाते हैं।
उनकी आदत ही होती है समय और स्वार्थ के हिसाब से अपना चेहरा बदल लेना।
असल में वे हमें धोखा नहीं देते, हम खुद उनकी झूठी छवि बनाकर अपने दिल को समझा लेते हैं।
कभी आपने आम बेचने वाले भैया से गुलाब माँगा है?
नहीं…
क्योंकि आपको पता है कि आप गलत जगह खड़े हैं।
आप जानते हैं कि वहाँ आम मिलेंगे, गुलाब की उम्मीद करना सिर्फ आपकी भूल होगी।
ठीक वैसे ही, गलत लोगों से सच्चाई, वफ़ादारी और अपनापन माँगना भी हमारी अपनी भूल है।
जब हमें संकेत पहले ही मिल जाते हैं, फिर भी हम अनदेखा कर देते हैं, तो टूटने की शुरुआत वहीं से हो जाती है।
इसलिए हर बार दोष सामने वाले का नहीं होता, कभी-कभी हमें अपनी उम्मीदों का हिसाब भी देखना चाहिए।
क्योंकि दर्द अक्सर धोखे से नहीं, गलत जगह दिल लगाने से पैदा होता है।
शायद इसलिए कहा जाता है—
गिरगिट से डरने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वह सामने रंग बदलता है;
डर तो उन इंसानों से होना चाहिए, जो मुस्कुराते हुए भी अपने रंग छुपा लेते हैं।
देखे तो बहुत रंग तुम्हारे,
ये नया रंग भी हमने चुपचाप अपना लिया है।
अपना मानकर रंगों की होली भी खेल लेंगे,
बस डर इतना है—
कि होली के रंगों की तरह
कुछ दिनों बाद
तुम भी फीके पड़कर उतर न जाना।
- Nensi Vithalani