Let's go somewhere far away...! - 13 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 13

Featured Books
  • Wisps of Smoke - 38

    Wisps of Smoke (A love, romantic, psychological and paranorm...

  • NAVORA

    NAVORAPrologue — A Flower That Became a DreamSometimes, a bu...

  • The Story of Navaratri

    Navaratri is a nine-day Hindi festival celebrated throughout...

  • Specialz

    "Here you go- master" Yomi sets the cup of tea on the paper...

  • Price Tag on Passion

    The rain lashed against the French windows of Mayur’s pentho...

Categories
Share

चलो दूर कहीं..! - 13

चलो दूर कहीं... 13

अनाह के आंखों के संपर्क में जैसे ही रवि की आंखें आई उसे लगा जैसे करंट का झटका लगा हो और अगले ही पल उसके ब्रेन पर अनाह का नियंत्रण था..! वह न रवि को जानता था न पहचानता था फिर भी न जाने क्यों उसे उससे जलन हो रही थी...अगर वह प्रतीक्षा को लेकर जल रहा था तब तो ये साबित हो रहा था कि रवि प्रतीक्षा को नहीं चाहता..और रवि इस लड़की के जितना करीब रहे यह उसके लिए उतना ही अच्छा था। फिर भी उसने जानबूझकर खेल खेला और उस लड़की के याद को उसके ब्रेन से मिटा दिया..! 

रवि को कुछ समझ नहीं आ रहा था, ये जगह.. माहौल.. और सामने बैठी युवती सब अनजाने से प्रतीत हो रहे थे..! वह भौचक्के से इधर उधर ताकते हुए युवती से पूछा, " तुम कौन हो.. और मेरे साथ यहां क्या कर रही हो..?" 

इतना सुनते ही उस युवती ने उसके हाथ को पकड़ कर उसके तबियत का अंदाजा लगाते हुए बोली, "ये अचानक तुम्हें क्या हो गया रवि.. ये कैसी बहकी बहकी बातें करते हो.. कहीं उस चुड़ैल ने तुम पर कब्जा तो नहीं कर लिया..?" 

"ऐ लड़की कौन हो तुम..? मेरा हाथ छोड़ो..!" कहते हुए रवि ने अपना हाथ खींचा तो वह चीखते हुए वहां से भाग खड़ी हुई..! 

सांझ की धूंधलिका अंधेरे के आगोश में समाती जा रही थी.. और सुनसान नदी तट पर रवि भावशून्य बैठा रहा। अनाह वहां से सीधे प्रतीक्षा के पास पहुंचा और कहा, " तुम अपने यार रवि को देखना नहीं चाहोगी कि उसके साथ क्या हो रहा है..?" 

"अनाह रवि मेरा यार नहीं है.. उसने मेरे मुश्किल वक्त में साथ दिया है, इंसानियत के नाते उसका परवाह कर रही हूं.. और कुछ नहीं है..!" प्रतीक्षा खिन्न स्वर में बोली तो वह मुस्कुराते हुए कहा, " एक बार उसकी हालत देख तो लो... फिर देखता हूं कि वह तेरा यार है या नहीं..?" कहकर उसने प्रतीक्षा के आंखों में देखा तो उसके सामने जो दृश्य उभरा उसे देखकर वह सिहर उठी.. आदिवासियों का एक झुंड हाथ में मशाल और पारंपरिक हथियारों से लैस ढोल नगाड़े बजाते हुए चले जा रहे थे और उनके बीच में रस्सियों से बंधे रवि को लोग खींचते हुए ले जा रहे थे। ये दृश्य देखते ही प्रतीक्षा ने बौखलाए स्वर में पूछी, " ये.. ये.. क्या है अनाह..? और ये लोग रवि को इस प्रकार बांधकर कहां ले जा रहे हैं..?" 

"ये मुझे मालूम नहीं.. हां इतना मालूम है कि रवि जिस आदिवासी लड़की से प्यार करता था उसे भूल गया है और उस लड़की को लगता है कि चुड़ैल यानि तुम उस पर कब्जा कर बैठी हो..! देखती जाओ आगे क्या होता है..? "

कहकर अनाह ने उसका हाथ पकड़ कर उसके पास बैठ गया और प्रतीक्षा रवि पर नजरें गड़ाए रखी..! रवि को खींचते हुए एक पूजा स्थल के पास ले जाया गया और वहां सखुआ के पेड़ से बांध दिया गया... रात गहराती जा रही थी और गहराते रात के साथ ढोल मंजीरे पर थाप बढ़ता जा रहा था। गुरु बाबा एक पेड़ के तने पर पूजा पाठ कर रहे थे और रवि के सामने जलते धूप के धुएं से उसका चेहरा लाल हो गया था, आंखें लाल थी.. चेहरा पसीने से तरबतर..! एक आदमी झुपते हुए रवि के पास आया और उसपर छड़ी बरसाते हुए पूछा," कौन हो तुम..?"

उसने दर्द से बिलबिलाते हुए कहा," मैं रवि हूं.. मुझे छोड़ दो..! "

" अरे मुर्ख मैं तुम पर कब्जा जमाए बैठी उस चुड़ैल के बारे में पूछ रहा हूं.. बता कौन है वो और चाहती क्या है..? "

" कोई चुड़ैल का कब्जा नहीं है मेरे ऊपर.. मेरा विश्वास करो, मुझे छोड़ दो..!" 

रवि ने रोते हुए कहा तो प्रतीक्षा की आत्मा फट गई , ऐसा लग रहा था जैसे रवि पर पड़ रहा हर वार उसके बदन पर पड़ रहा है.. वह रोते हुए अनाह से बोली, "आखिर तुम चाहते क्या हो..? भगवान के लिए बंद करो ये सब..! रवि बहुत ही नाज़ुक है.. वे दरिंदे मार डालेंगे उसे..!" 

अनाह पर उसकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा वह चुपचाप बैठा मुस्कुराता रहा..! और वहां उस ओझा ने रवि पर बेंत बरसाते हुए कहा, "जब किसी चुड़ैल का कब्जा नहीं है तो फिर तुमने हमारे गांव के बेटी के साथ प्यार का झूठा नाटक किया.. और जब मन भर गया तो उसे पहचानने से इंकार कर दिया..! तुम क्या सोचे थे इतनी आसानी से इस गांव से भाग जाओगे..? तुम्हें पता है हमारे गांव के लड़की के इज्जत के साथ खिलवाड़ करने की सजा क्या है..?" 

भीड़ से आवाज गूंजी, "मौत.. जो हमारे गांव के बहु बेटी के इज्जत से खेलेगा हम उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे..!" 

ये आवाज जैसे प्रतीक्षा के कानों में बार बार गूंज रहा था, उसका चेहरा आंसूओं से सराबोर था, उसे प्रतीत हो रहा था सचमुच में ये ज़ालिम इसे मार डालेंगे.. वह पास बैठे अनाह के गर्दन को पकड़कर चीखते हुए बोली, "तुम ये तमाशा क्यों कर रहे हो..? आखिर तुम चाहते क्या हो साफ साफ बताओ न..? " 

"तुम रवि को भूल जाओ..!" उसने सपाट स्वर में कहा तो प्रतीक्षा बोली, " रवि को भूल जाओ.. ये क्या बात हुई? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा अनाह.. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं.. तुम्हारा पांव पड़ती हूं.. बचा लो उसे.. फिर तुम जो कहोगे वो मैं मानूंगी..!" 

"बाद की बात बाद में.. पहले मैं जो बोल रहा हूं वो मानो वर्ना वे लोग खूद तुमसे रवि को दूर कर देंगे..! " उसने सख़्त लहजे में कहा तो प्रतीक्षा को एहसास हुआ ये अनाह जैसा दिखता है वैसा है नहीं.. अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.. इसलिए इसका बात मानने के सिवा मेरे पास कोई चारा नहीं है, उसने सिसकते हुए कहा, "ठीक है तुम जैसा कहोगे वैसा मैं करुंगी.. मैं रवि को भूलने का प्रयास करुंगी..!" 

"प्रयास नहीं... तुम्हें रवि को भूलना होगा और याद रखना अगर कभी भी तुम रवि के पास आई तो उसे हमेशा के लिए खो देगी..!" 

" वहां रवि की जान सांसत में है और तुम यहां पहेलियां बुझा रहे हो... अरे मैं तुम्हें वचन देती हूं कि मैं रवि को हमेशा के लिए भूल जाऊंगी..!"

" ये हुई न बात...अब देखो कैसे रवि के शरीर से चुड़ैल बाहर आती है..!" कहकर अनाह मुस्कुराया और प्रतीक्षा की धड़कनें बढ़ी हुई थी, झुंड के लोग रवि को उस पेड़ से खोलकर उस युवती के सामने खड़ा करके पूछ रहे थे कि," तुम इसे पहचानते हो..?" 

उसने 'ना' में सिर हिलाया तो एक साथ सभी ने उसपर लात घूंसे बरसाना शुरू कर दिया.. उसके नाक मुंह से खून की धारा फूट पड़ी थी। वह लहुलुहान हो चूका था और उसकी स्थिति देख प्रतीक्षा व्याकुल थी, उसने शांत बैठे अनाह से कहा," जब उसे मरवाना ही था तो इतना नाटक क्यों.. वैसे भी रवि के मर जाने से मैं उसे भूल ही जाती..!"

" उसने तुम्हारे इन नाजुक बदन को छुकर जो गुनाह किया था उसकी सजा तो उसे मिलनी ही थी..!" कहकर वह वहां से उठा और एक ओर चल दिया। 

लात घूसों के बीच लहुलुहान रवि जिसे लोग घसीटकर ले जा रहे थे, न जाने उसमें कहां से ताकत आई वह एक झटके में खड़ा हुआ और जितने लोग उसे पकड़े हुए थे सभी को एक साथ घुमाकर चारों ओर फेंका फिर उस पुजारी का गर्दन दबोचते हुए गुर्राया,"तुम्हें मैं जिंदा नहीं छोड़ूंगा..!" 

रवि के बदले व्यवहार से एक क्षण लिए वहां सन्नाटा पसर गया था, किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि पुजारी को बचाने आए.. पुजारी की आंखें बाहर निकल आई थी और सांसें उखड़ रही थी कि युवती दौड़ती हुई आई और रवि का हाथ पकड़ कर रोते हुए बोली," छोड़ दो रवि.. इन्हें छोड़ दो..!"

उस युवती की बातों से जैसे उसकी चेतना वापस लौटी उसने उस युवती को देखते हुए कहा," सुमी..!"

और उसकी पकड़ पुजारी के गर्दन पर ढीला पड़ता गया और देखते ही देखते वह एक ओर लुढ़क गया...
                   
                                                    क्रमशः...