Chalo Dur kahi - 1 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 1

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चलो दूर कहीं..! - 1

चलो दूर कहीं... 

मध्य प्रदेश के रायसेन जिला में अवस्थित भीमबैठका शैलाश्रय (Bhimbetka Rock Shelters) भोपाल से लगभग 45 किमी दूर विंध्य पर्वत माला के दक्षिण में अवस्थित है। यह स्थान बलुआ पत्थर के चट्टानों, प्राकृतिक गुफाओं और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। यहां पाषाण युग में मानव के निवास और उनके द्वारा बनाए गए शैल चित्र मौजूद हैं। इन शैल चित्रों में शिकार के भिन्न-भिन्न दृश्य, नृत्य करते युवक युवती, उत्सव मनाने, पशुओं जैसे हाथी, घोड़ा, भैंस, बकरी आदि के साथ साथ युद्ध के दृश्य एवं विभिन्न सामाजिक कार्यकलापों के चित्र देख उस समय के मानव जीवन का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

वैसे यहां सालों भर पर्यटक आते हैं लेकिन जूलाई से सितंबर तक बर्षा सीजन के कारण लोगों की आवाजाही कम हो जाती है और इस समय हरियाली पसंद करने वाले और शोधार्थी आते हैं.. और सितंबर माह के पहले सप्ताह में दिल्ली यूनिवर्सिटी के आर्ट हिस्ट्री के स्टूडेंट्स रोहन, अविनाश,शिवा,सारा, शिखा और प्रतीक्षा यहां के रॉक आर्ट का अध्ययन कर पाषाण युग के मानव का जीवन स्तर और सामाजिक व्यवस्थाओं पर संलेख तैयार करने आए थे लेकिन उनका दुर्भाग्य ही कहिए की वे जिस दिन से यहां आए थे बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।

भीमबैठका में रहने के सुविधा न होने के कारण ये करीब 15 किमी दूर मंडीदीप क्षेत्र के एक होटल में रात रुके.. सुबह आसमान में काले काले बादल उमड़ घुमड़ रहे थे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आसमान में देवताओं और दानवों में युद्ध छिड़ा हो.. और दोनों ओर के तांडव एवं गर्जना से पुरी कायनात थर्रा रही हैं।

खराब मौसम को देखते हुए सारा ने कहा, "आज भी मौसम काफी खराब है.. मैं तो कहती हूं कि हमें वापस चलना चाहिए.. मौसम साफ होने पर फिर कभी आ जाएंगे..?" 

"तू इतनी डरपोक हो सारा.. ये मुझे पता ही नहीं था..? अरे यार मिट्टी की बनी हो क्या जो भीगते ही गल जाओगी..?आहा .. कितना सुहाना मौसम है, ये फुहारें..ये पहाड़ की चोटियों पर उमड़ते घुमड़ते बादल..ऐसा मौसम का भी अपना एक अलग ही मजा है..! " शिवा ने रोमांटिक स्वर में कहा तो प्रतीक्षा बोली, "सारा का कहने का ये मतलब नहीं था शिवा .. मौसम वाकई बहुत खराब है और ऐसा मौसम में पहाड़ और गुफा में जाना थोड़ा रिस्की तो होता ही है.. चलना है तो जल्दी चलो..देर हो रही है..?" 

"तुम भी न प्रतीक्षा.. मैं तो सारा को बना रहा था.. उसे चिढ़ाने में बहुत मज़ा आता है। वैसे रोहन बड़ा गुमसुम है कहीं तुम दोनों में फिर से लड़ाई तो नहीं हो गया.?"

शिवा ने कहकर प्रश्नवाचक निगाहों से उसे घूरा तो वह झेंपते हुए बोली," अरे नहीं.. नहीं..ऐसी कोई बात नहीं है! वैसे भी प्यार में थोड़ी नोक झोंक, रुठने मनाने का अपना एक अलग ही मजा है..!"

कहकर प्रतीक्षा ने जोर से आवाज लगाई,"रोहन, अविनाश और शिखा जल्दी से बाहर आओ.. चलो गाइज अपना अपना बैग उठाओ..!" 

प्रतीक्षा की आवाज सुनते ही रोहन जोर से चीखा,"अभी आया प्रतीक्षा..!" 

"अरे यार.. मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि तुम सब घुमने आए हो या किसी बारात में दावत उड़ानें..?" 

प्रतीक्षा के नाराज़गी भरे स्वर सुन सभी झटपट अपने अपने बैग लेकर बाहर आए तो प्रतीक्षा शिखा से बोली,"हैप्पी बर्थडे शिखा..!"

" थैंक्यू..!"

शिखा के थैंक्यू बोलते ही बारी बारी से सभी ने उसे बर्थडे विश किया। प्रतीक्षा सभी पर एक सरसरी निगाह डालते हुए बोली," सभी अपने अपने सामान चेक कर लो कुछ छुटा तो नहीं.. और अविनाश तुमने शिखा के बर्थ डे पार्टी का क्या प्लान किया है?" 

"सारा समान ले लिया है भीमबैठका में ही शिखा का बर्थडे सेलिब्रेट करेंगे..!" 

"हां.. अच्छा ही है, ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा.. इतना तो तय है शिखा का ये बर्थडे हमारे लिए यादगार रहेगा..!"

प्रतीक्षा के साथ सभी बाहर आए तो बाहर बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। उन्होंने एक ऑटो बुक किया और उसमें सवार होकर भीमबैठका के लिए निकल पड़े..ऑटो ड्राइवर ने ऑटो के दोनों ओर के खाली भागों में एक सफेद प्लास्टिक तान दिया था ताकि बारिश की बूंदे रुक सकें..ऑटो भीमबैठका के जितना करीब पहुंच रहा था बारिश उतनी ही तेज हो रही थी..!

ऑटो जब पार्किंग एरिया में पहुंचा तो मूसलाधार बारिश शुरू हो गई उन्होंने बारिश के रफ्तार कम होने तक ऑटो में ही इंतजार किया और बारिश थमते ही भागे शैलाश्रयों की ओर..जब वे लगभग दौड़ते हुए 1 किमी की चढ़ाई वाली दुरी तय कर पहले शैलाश्रय के पास पहुंचे तब उन्हें एहसास हुआ कि सही में बारिश उनके दुश्मन बन बैठी है और यही स्थिति रहा तो घूमना तो दूर वापस जाना भी मुश्किल जान पड़ता है..उनकी सांसें धौंकनीं की भांति चल रही थी, वे पुरी तरह से भींगे हुए थे। लड़कियों ने माथे पर अपने बैग रखकर बाल को भींगने से तो बचा लिया था लेकिन कपड़े भींगकर बदन से चिपक गए थे जो उन्हें असहज कर रहा था।

वे जहां थे वह एक बड़े से चट्टान के छज्जा की तरह बाहर की ओर निकला हुआ हिस्सा था..यहां बारिश से बचाव था। वहां शांति थी और धुप नहीं होने के कारण अंधेरा था।वे वहां रुककर पहले अपने भींगे बदन को पोंछकर सुखाने का प्रयास कर रहे थे और प्रतीक्षा तौलिया से बदन पोंछते हुए दिवालों पर बने चित्र को देखकर बोली,"तुम लोगों ने यहां के दिवालों पर बने चित्र देखे..?" 

ये सुनते ही रोहन ने अपने मोबाइल का टार्च ऑन किया और दिवालों को देखते हुए कहा,"वाउ.. क्या कमाल की कलाकारी है इन चित्रों को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने आजकल में बनाया होगा..! किसी को आइडिया है कि ये चित्र कितने पुराने हैं..?" 

"लगभग 30 हजार साल पहले के है।" प्रतीक्षा बोली तो शिखा ने चौंकते हुए कहा,"बाप रे इतना पुराना.. लेकिन इन चित्रों के लाल, सफेद और पीले रंगों को देखकर तो इतना पुराना नहीं लगता..?" 

"ये प्राकृतिक रंग है इसलिए समय का इसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.. मैं क्या कहती हूं अविनाश यहीं शिखा का बर्थडे केक काटते हैं..कम से कम हमारे पूर्वज भी इसे आशीर्वाद दे देंगे..!" प्रतीक्षा ने कहा तो शिखा तपाक से बोली," हमें अपने पुरखों पर गर्व है प्रतीक्षा..अब देखो न जब न विज्ञान इतना विकसित था और न लोगों के पास भाषा थी इसके बावजूद उन्होंने ये कारनामे किए हैं जिसके बारे में पता लगाने में आज के विज्ञान के दम फूल रहे हैं..! क्या पता ब्रह्मांड के किसी और ग्रह के जीव से इनका संपर्क रहा हो और वो टेक्नोलॉजी उन्हीं के साथ विलुप्त हो गई हो..?"

" आज जन्मदिन पर अपने पुरखों को याद करना अच्छी बात है..हम अपने जड़ से जितना जुड़े रहें उतना अच्छा है... चलो बताओ केक में कितने नंबर का कैंडल लगाऊं..?" सारा ने जमीन पर केक के डब्बे को रखकर कहा तो अविनाश ने थैले में रखा जीरो नंबर का कैंडल लगाते हुए कहा," उम्र एक नंबर है बेबी..!"

शिखा ने केक काटी सभी ने उसे हैप्पी बर्थडे टू यू बोला और केक खाकर बाहर आए तो बाहर बारिश थम चुकी थी,धुप खिली हुई थी.. खिली हुई धुप देखकर उनमें जोश आ गया वे उछलते कूदते.. किसी बच्चे की भांति दौड़ते चले गए और जब वे रुके तो एक पहाड़ी की चोटी पर थे..खिली हुई धूप में विस्तृत क्षेत्र में फैले साल और सागोन के घने जंगल को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी बच्चे को नहला कर उसकी मां अभी अभी तैयार की है।उस पहाड़ी से सटकर बहती बेतवा नदी ऐसी ऊफनाई हुई थी मानो किसी युवती का यौवन हिलोरें मार रहा हो..उसकी धारा इतनी तेज थी कि दोनों तट पर वर्षों से खड़े बड़े बड़े वृक्षों को तिनके की भांति बहाए लिए जा रही थी।

सभी यहां के मनमोहक दृश्य को अपने स्मृति पटल के साथ साथ मोबाइल में भी रेकार्ड कर रहे थे, प्रतीक्षा मोबाइल से रिकार्डिंग करते करते यह भूल गई थी कि वह एक पहाड़ी की चोटी पर है और एक जरा सी लापरवाही भारी पड़ सकता है.. और हुआ भी वही एक पत्थर से ठोकर लगा.. वह गिरी और सीधे खाई में लुढ़कते हुए नदी में जा गिरी... उसकी चीख सुनकर सभी दौड़े उसके पास पहुंचे पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी.. वे अपनी आंखों के सामने प्रतीक्षा को उफनती नदी में गिरते हुए देख रहे थे..वे रो रहे थे, चिल्ला रहे थे,मदद की गुहार लगा रहे थे.. लेकिन उनका चित्कार सुनने वाला कोई न था..

                                                      क्रमशः..