चलो दूर कहीं.. 2
प्रतीक्षा के खाई में गिरने से वहां चीख पुकार मचा था जिसे सुनकर और पर्यटक वहां इकट्ठा हो गए थे। रोहन का रो रो कर बुरा हाल था.. ऐसा लगता था वह खाई में छलांग लगा देगा.. शिवा और अविनाश उसे संभाले हुए थे। शिखा और सारा भी रो रही थी, शिखा ने रोहन के आंखों में आंखें डाल कर कहा, " जो होना था वो तो हो चुका.. ये रोने धोने से कुछ नहीं होगा..? अब भी उम्मीद बाकी है..इसलिए सबसे पहले पुलिस को फोन करो शायद पुलिस प्रतीक्षा को ढूंढने में मदद करें ..?"
"तुम सही कह रही हो शिखा..!" कहकर अविनाश ने आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर 112 पर डायल करके प्रतीक्षा के साथ घटी घटना की जानकारी देते हुए मदद का गुहार लगाया तो उधर से आश्वासन मिला की हम जल्द से जल्द पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
उनके पास इंतजार के सिवा कोई चारा न था, जब वे उफनती नदी को देखते तो उनका कलेजा ये सोचकर कांप जाता था कि इतनी ऊंचाई से इस उफनती नदी में गिरने के बाद जीवित बचना नामुमकिन है..! लेकिन मानव मन जब तक घटना के फलाफल को आंखों से देख न ले तबतक उसे चैन कहां..?
पुरे तीन घंटे बाद पुलिस वहां पहुंची तब तक शाम हो चला था और मौसम भी खराब हो गया था..! पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना करने के बाद हाथ खड़े कर दिए.. और मामला एसडीआरएफ के मत्थे मढ़ अपना पल्ला झाड़ लिया..! बेचारे पर्यटक उनका चिरौरी करते रहे, प्रतीक्षा को ढूंढने का गुहार लगाते रहे लेकिन उनके कान में जूं तक न रेंगा..!
अंधेरा होने से पहले सभी को यहां से बाहर निकाल दिया गया.. मजबूरन उन्हें भी होटल वापस लौटना पड़ा। अब इनके सामने यक्ष प्रश्न ये था कि प्रतीक्षा के घर वाले को बताया जाय या नहीं.. आखिरकार ये निर्णय हुआ कि जो घटना घटी है उसे छुपाने से उसके घर वालों का शक इन पर होगा.. इसलिए जो भी बात है साफ साफ बता दिया जाए...! "
शिखा, प्रतीक्षा की सहेली थी उसका उसके घर आना जाना था और सभी उसे अच्छी तरह से जानते थे। प्रतीक्षा के पिता कमलनाथ किसान थे और वो अपने मां बाप की इकलौती संतान थी.. इसलिए वे उसपर जान छिड़कते थे,भले खूद भूखे रह जाएं पर बेटी की हर ख्वाहिश पूरी करते थे..! करते भी क्यों नहीं..न जाने कितने दर पे माथा टेकने और मन्नतें मांगने के बाद उन्हें ये खुशियां नसीब हुई थी।
जैसे जैसे मोबाइल का रिंग बढ़ता जा रहा था शिखा की धड़कनें भी बढ़ रही थी... खैर आख़री रिंग में कॉल रिसीव हुआ और कमलनाथ का स्वर उभरा," हेलो.. बोलो शिखा बेटा तुम सब ठीक से वहां पहुंच गए न.. मैं कब से प्रतीक्षा को फोन लगा रहा हूं उसका फोन लग ही नहीं रहा.. जरा फोन देना प्रतीक्षा को..? "
ये सुनते ही शिखा की दिग्गी बंध गई , उसके कंठ से आवाज नहीं निकल पा रही थी, आंखों से आंसू गिर रहे थे.. जब शिखा कुछ न बोली तो वे बोले, "क्या हुआ शिखा.. तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही..? बेटा न जाने क्यों मेरा मन काफी घबरा रहा है.. जरा प्रतीक्षा से बात करा दो न दिल को सुकून मिल जाएगा..!"
"अंकल.. अंकल.. प्रतीक्षा.. पहाड़ से गिर गई है..!" शिखा ने जैसे अपने सारे ताकत को इकठ्ठा कर एक ही सांस में बोली तो उधर से आश्चर्य के साथ बैचैनी भरा स्वर उभरा, "क्या..? प्रतीक्षा पहाड़ से गिर गई है.. कहां गिरी.. कब.. कैसे..? "
वे प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहे थे और जबाब में सिर्फ शिखा की सिसकियां गूंज रही थी, जब रोहन से रहा न गया तो उसने शिखा से फोन लिया और बोला," अंकल मैं रोहन..! "
इतना सुनते ही वे बोले," हां रोहन बेटा.. ये शिखा क्या बोल रही थी..? वहां सब कुशल मंगल है न..? "
" शिखा सही कह रही है अंकल.. प्रतीक्षा पहाड़ से फिसलकर नीचे नदी में गिर गई है और अबतक उसका पता नहीं चल पाया है..! "
इतना सुनते ही जैसे उसका कलेजा फट पड़ा और उस चित्कार से पुरी कायनात दहल रही थी। नियति ने उसके साथ जो क्रुर मजाक किया था उसकी कल्पना उसने सपने में भी न किया था।
दुसरे दिन प्रतीक्षा के पिता कमलनाथ और मां के साथ साथ सभी के पैरेंट्स भीमबैठका पहुंच चुके थे। प्रतीक्षा के माता-पिता का रो रो कर बुरा हाल था । स्थानीय प्रशासन पहले से ही मुस्तैद था। रोहन जब अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा तो प्रतीक्षा के पिता ने रोते हुए पूछा, "ये क्या हो गया रोहन.. हमारी प्रतीक्षा तो निडर और साहसी थी.. कहीं किसी ने उसके साथ छल तो नहीं किया..? "
" नहीं.. नहीं... अंकल आप ये क्या कह रहे हैं.. भला प्रतीक्षा के साथ कौन छल करेगा.. वो तो सबकी चहेती थी..! "
" यही तो किसी के आंखों में खटकने का कारण बनता है रोहन.. तुम्हें भी उसका हंसना, खिलखिलाना, बड़े बड़े सपने देखना फूटी आंख न सुहाता था... कहीं..?"
कमलनाथ के बात को बीच में काटते हुए रोहन ने कहा, "आप ये क्या कह रहे हैं अंकल.. भगवान कसम ऐसा सोचना भी मेरे लिए पाप है.. मैं मानता हूं कि उसके बेबाकपन से जलता था.. लेकिन मैं उससे इतना नफरत नहीं करता था कि उसे पहाड़ से नीचे फेंक दूं..! आप ये शक अपने मन से निकाल दें.. मैंने ऐसा कुछ नहीं किया..!"
रोहन बोल ही रहा था कि एसडीआरएफ की टीम पहुंची तो सभी उसके साथ पहाड़ी के ऊपर गए घटनास्थल का मुआयना करने के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने पर मंथन हुआ और गोताखोरों की टीम पुरे साज सज्जा के साथ नदी में उतर कर खोजबीन किया गया.. जब कोई रिजल्ट न मिला तो मोटरबोट के माध्यम से आसपास के एरिया में तलाशी अभियान चलाया गया लेकिन रिजल्ट ढाक के तीन पात ही रहा.. अंततः शाम को रेस्क्यू टीम के हेड ने कहा," हमारे टीम के लोगों ने पहाड़ी के ढलान और नदी में खोजबीन किए लेकिन हमें न मिस प्रतीक्षा मिली और न ही उनका बॉडी..! इसलिए आज का रेस्क्यू स्थगित किया जाता है। अगले कुछ दिनों तक हमारी टीम खोजबीन में जुटी रहेगी अगर कोई रिजल्ट सामने आता है तो आप सबों को सूचित कर दिया जाएगा..!
ये सुनते ही कमलनाथ ने हाथ जोड़कर रोते हुए कहा, "हुजुर प्रतीक्षा हमारी एकलौती बेटी है उसके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते ..अच्छे से देखिए न साहब कहीं तो फंसी होगी.. जाएगी कहां..? "
" देखिए मैं आपके दर्द को समझ सकता हूं.. हमारे गोताखोरों ने पुरे एरिया का चप्पा-चप्पा छान मारा.. अगर वो यहां रहती तो जरुर मिल जाती.. लगता है पानी के तेज बहाव में कहीं दूर बह गई होगी..? "
" उसे ढूंढिए साहब.. वो बहुत कोमल है, बड़े नाजों से पाला है हमने.. वो.. वो.. इस नदी में कैसे रात गुजारेंगी.. उसे ठंड लग जाएगी साहेब उसका तबियत खराब हो जाएगा.. उसे ढूंढ दिजिए साहेब.. उसे ढूंढ दिजिए..!" वह रोता गिड़गिड़ाता उसके चरणों में बैठ गया..!
अगर लोगों की भावनाएं सिस्टम पर हावी हो जाए तो सिस्टम का गुरुर टूट जाता है.. और सिस्टम ये कभी होने नहीं देता..!
क्रमशः. ..