चलो दूर कहीं... 12
पश्चिम क्षितिज पर सुरज, किसी नई नवेली दुल्हन के घूंघट की भांति सरक रहा था.. जिससे क्षितिज में रक्तांबर आभा फैली हुई थी। गोधूलि बेला में जंगल में जैसे अफरातफरी मची हुई थी... पक्षियों के कलरव से वातावरण गुंजायमान हो रहा था और स्वच्छ नीले आसमान में अठखेलियां करते पक्षियों के झुंड की अदभुत तस्वीरें बन और बिगड़ रही थी..उन तस्वीरों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे किसी कुशल ट्रेनर के देख रेख में एक लय में डुबते सुर्य को सलामी दी जा रही है..! जंगली पशुओं का झुंड आपस में लड़ते झगड़ते धूल उड़ाते अपने अपने मांद में लौट रहे थे। जैसे जैसे शाम ढलती जा रही थी कोलाहल बढ़ता जा रहा था.. प्रतीक्षा झोपड़ी के बाहर बैठी शाम के ठंडी हवा का आनंद लेते हुए प्रकृति के इस अद्भभुत लीला को देख रही थी, सबकुछ व्यवस्थित ढंग से घटित हो रहा था..पशु, पक्षी, पेड़, पौधे,फूल पत्ती सबकुछ जैसे प्राकृतिक घड़ी के अनुरूप अपने आपको ढाल रहा था...!
प्रकृति के सानिध्य में उसका रुप लावण्य खिल उठा था, गुलाब के पंखुड़ियों सा खिला चेहरा, सुरमई आंखें , शबनम से लरजते होंठ और हवा से लहराते खुले बाल और गठीले बदन में लिपटी सफेद धोती में वह किसी कुशल शिल्पकार के द्वारा तराशी गई मूरत प्रतीत हो रही थी।
वह एक बड़े से पत्थर पर बैठी बड़ी बैचैनी से चारों ओर नजरें दौड़ाकर रवि को ढूंढ रही थी। जब वह नहीं दिखा तो मन ही मन बुदबुदाई,"शाम के वक्त ये रवि न जाने कहां चला गया..? ये लड़का न जाने क्यों मुझसे इतना डरता है.. शायद चुड़ैल समझ कर इतना डर रहा है? कैसे इसके मन से ये डर निकालूं..?"
वह चिंता मग्न बैठी सोच रही थी कि उसे अनाह का ध्यान आया शायद अनाह रवि के मन से ये भ्रम दूर कर सकता है? वह मन ही मन उसे याद कर ही रही थी कि एकाएक अनाह उसके सामने प्रकट हुआ और बेहद मीठे स्वर में बोला,"तुम तो रवि के लिए ऐसे उतावली हो रही हो जैसे उसे दिल दे बैठी हो..?"
अनाह पर नजर पड़ते ही वह दौड़कर उससे ऐसे लिपटी मानो कोई बिछड़े हुए प्रेमी से मिल रही हो,उसकी सांसें तेज थी, आंखों में आंसू थे और उसने थरथराते जुबान से कहा,"अनाह.. कहां चले गए थे तुम..? तुम्हारे बिना सबकुछ सुना सुना लग रहा था.. तुम वादा करो फिर मुझे अकेला छोड़ कर नहीं जाओगे..?"
" तुम्हारा दिल रवि के लिए तड़प रहा है और मुझे झूठा दिलासा दे रही हो कि मेरे बिना सबकुछ सुना सुना लग रहा है..?"
अनाह ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा तो वह बोली, "तुम रवि को जानते हो..?
" हां.. और ये भी जानता हूं कि रवि को तुम प्यार करने लगी हो लेकिन वह तुम्हें चुड़ैल समझता है..! "
" अदभूत..अनाह .. अदभूत..सच कहा तुमने वो मुझे चुड़ैल समझ कर मुझसे दूर भागता है..वैसे तुम उसके मन की बातों को कैसे जानते हो ? "
" इस रहस्य को रहस्य ही रहने दो तो अच्छा है..बस ये जान लो कि तुम जिसे जानोगी उसे मैं भी जान जाऊंगा..! तुम जानना नहीं चाहोगी जिसके लिए तुम यहां बैचैन हो वह तुम्हारे पीठ पीछे क्या गुल खिला रहा है..!"
"सच में अनाह तुम रवि से जल रहे हो..? अरे वो इतना शर्मीला और भोला है कि मेरे आंखों में झांक नहीं सकता... फिर उससे कोई क्या उम्मीद कर सकता है..!"
"अच्छा एक ही दिन में इतना भरोसा करने लगी हो रवि पर.. ठीक है चलो देखते हैं तुम्हारा रवि क्या कर रहा है...!"
कहकर अनाह ने प्रतीक्षा के आंखों में देखा तो उसके आंखों के सामने एक खूबसूरत दृश्य था, नदी तट पर अनगिनत जंगली फूल खिले थे, चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे और पहाड़ों के पीछे डुबते सुर्य की लालिमा छितिज में फैली हुई थी जिससे नदी का जल सिंदूरी प्रतीत हो रहा था.. नदी जल के सिंदूरी आभा में ऊंचे ऊंचे पेड़ों की हिलती डुलती छाया से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई प्रेमी युगल प्रेमालिंगन कर रहा हो...सांझ की धूंधलिका में मखमली घास पर किसी युवती को गले लगाए बैठा उसे रवि दिखा तो वह चीखी," ये कौन है..जिसे रवि अपने सीने से चिपकाए बैठा है..?"
" मुझे क्या पता कि ये कौन है..? अगर तुम्हें उससे जलन हो रही है तो जाकर पता लगाओ कि ये लड़की कौन है...या रवि को भूल जाओ ..?"
" ये क्या बकवास कर रहे हो अनाह..भला मैं क्यों जलूंगी उससे...?"
" मुझे तो जलने की बू आ रही है... देखो प्रतीक्षा तुम लाख सफाई दो लेकिन तुम मुझे धोखा नहीं दे सकती ... मुझे पता है तुम चाहती क्या हो... तुम यहीं बैठो मैं अभी आया..!"
कहकर वह प्रतीक्षा के आंखों के सामने से ऐसे ओझल हो गया जैसे कोई जादूगर किसी को गायब करता है...!वह वहीं बैठी अनाह और रवि के बारे में सोचती रही..उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है... आखिर ये अनाह चाहता क्या है?
उधर अनाह रवि के पास पहुंचा तो वह गांव के एक आदिवासी युवती के साथ बैठा बातें कर रहा था, युवती सामान्य कद काठी की थी,सांवला रंग था और देखने में भी प्रतीक्षा जैसी सुंदर नहीं थी ! उसने उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर सहलाते हुए कहा," तुम मेरा इंतजार करना.. मैं तुम्हें लेने जरुर आऊंगा..! भगवान से प्रार्थना करना कि किसी तरह उस चुड़ैल से पीछा छुटे .. अगर मैं यहां से नहीं भागा तो वो चुड़ैल मुझे अपने वश में कर लेगी .. फिर न मैं घर का रहूंगा न घाट का ..!"
अनाह ठीक उसके सामने झाड़ियों में छुपा बैठा था और वह उससे नजरें मिलाने के फ़िराक़ में था लेकिन वह उस युवती में ऐसा रमा था कि नजरें उसी पर जमाए हुए था..जब अनाह ने देखा कि वह इधर-उधर तांक-झांक करने वाला नहीं है तो उसने एक पत्थर उठाया और उसके ओर उछाल दिया.. जब पत्थर उसके बगल में गिरा तब उसकी तंद्रा टुटी और उसने इधर-उधर देखते हुए चीखा,"कौन है वहां..? हिम्मत है तो बाहर आओ.. ये कायर के तरह पत्थर फेंक कर क्या साबित करना चाहते हो..?"
रवि चीखते हुए इधर-उधर देख रहा था और अनाह को इसी मौके की तलाश थी.. उसने उसके आंखों में अपनी आंखें गड़ा दिया...
क्रमशः...