Let's go somewhere far away...! - 7 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 7

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चलो दूर कहीं..! - 7

चलो दूर कहीं... 7

अपनत्व और सुख दुख का साथ ही प्यार का आधार है.. और कोई निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता करता है तो उसका दिल उस व्यक्ति के प्रति ऋणी हो जाता है। प्रतीक्षा का भी हाल कुछ ऐसा ही था अनाह के लिए उसके दिल में अथाह प्यार उमड़ रहा था, उसे पता था कि उस अंधेरे गुफा से अनाह ने ही उसे निकाल कर यहां लाया है.. लेकिन वो मुझे यहां छोड़कर कहां चला गया...? ये अनाह भी न एक अबूझ पहेली है..? वह अनाह के बारे में सोचते सोचते इधर-उधर देखते हुए उस जंगल के एक पगडंडी रास्ते पर चले जा रही थी..उसे कुछ पता न था कि वह कहां जा रही है, ये कौन सी जगह है..बस उस घने जंगल के बीच बने संकरे से पगडंडी पर लगभग दौड़ती चली जा रही थी।

उसके नंगे पांव ज़ख़्मी हो चुके थे, नंगे बदन में कंटीली झाड़ियों से की जगह ख़रोंच लग गई थी जिससे खून बह रहा था.. लेकिन उसे अपने बदन के जख्मों की कोई परवाह न थी ..बस वह भागती जा रही थी...! भागते भागते वह एक नदी के तट पर पहुंची तो उसके जान में जान आया..प्यास से उसका गला सूख रहा था,वह एक नजर नदी का मुआयना की .. वहां बह रही ठंडी हवा के झोंके ने उसके जलते बदन को शीतलता प्रदान किया था, जंगली फूलों की खूशबू से मन प्रफुल्लित हो उठा था..न जाने कितने दिनों बाद उसे पानी का दर्शन हुआ था..वह आहिस्ते से नदी में उतरी और पहले हाथ मुंह धोई फिर अंजुली से पानी भर भर कर जी भर पानी पी..तो उसे लगा जैसे उसकी आत्मा तृप्त हो गई है..!

पानी पीकर वह वहीं मखमली मुलायम घास पर बैठ गई.. और प्रकृति के अद्भभुत नजारे का दीदार करने लगी..!नदी का कल-कल जल हवा के झोंके के साथ अनवरत हिलोरें मार रहा था, जिससे उस शांत वातावरण में अनवरत छपाक् छपाक् की ध्वनि गूंज रही थी। शांत खड़े ऊंचे ऊंचे पेड़ों के फड़फड़ाते पत्ते इस निशब्द सन्नाटे में एक मधुर संगीत उत्पन्न कर रहे थे, दूर कहीं से मुर्गे की बांग से अपने अपने घोंषले में अलसाए पक्षियों के बीच हलचल तेज हो रही थी.. और उनका कलरव बढ़ रहा था। कलियां खिलकर फूल बनने को आतुर थी ! पूर्व क्षितिज के नीले आकाश में उषा काल की लालिमा से नारंगी रंग का अलौकिक आभा प्रस्फुटित हो रहा था। प्रकृति के इस नवसृजन और हर क्षण बदलते परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सचमुच कोई जादूगर अपने जादू से इस विराट संसार को अपने इशारे पर नचा रहा है..!

प्रतीक्षा अपने दुख दर्द को भूलकर इस अलौकिक संसार में खोई हुई थी कि एक कुत्ते के भौंकने से उसकी तंद्रा टुटी..वह कुत्ता उसपर ऐसे टूट पड़ा था मानो उसे काट खाएगा..! वह डरकर वहां से भाग कर ऊपर आई तो कुत्ता भी उसके साथ ऊपर आया और भौंकते हुए उसे नदी तट पर बने एक पगडंडी रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया... वह क्या करती उस पगडंडी पर पीछे खिसकती चली गई... और पीछे खिसकते खिसकते जब उसे एक झोपड़ी नजर आया तो वह कुत्ता एकदम से शांत हो गया और अपना दुम हिलाने लगा..!

प्रतीक्षा हैरत भरी नजरों से कभी उस कुत्ते को देखती तो कभी उस झोपड़ी को..वह सोच रही थी कहीं ये कुत्ता के रुप में अनाह तो नहीं..? लेकिन अनाह को मेरे सामने कुत्ता का रुप धरने की क्या जरूरत है..वह सीधे मेरे पास आ सकता था? नहीं ये एक आम कुत्ता ही है.. कुत्ते भी काफी संवेदनशील होते हैं..! शायद इसने मुझे अकेला देखकर ऐसा किया होगा.. सोचते सोचते वो कुत्ते के पास पहुंची और उसे पुचकारी तो वह उससे ऐसे घुल मिल गया जैसे बरसों से जान पहचान हो..!

प्रतीक्षा आहिस्ते आहिस्ते झोपड़ी के अंदर गई तो उसमें मात्र एक कमरा था,झोपड़ी को बांस और खर पतवार से तैयार किया गया था । एक कोने में खटिया पर चादर ताने कोई सोया था। और दुसरे कोने में पुआल का ढेर था। प्रतीक्षा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस जंगल में ये झोपड़ी किसका है और यहां कौन रहता है..? मन में ये ख्याल आते ही अनाह की बातें याद आ गई..'आम खाने से मतलब रखो, गुठली गिनने से क्या फायदा..!' वह मन ही मन बुदबुदाई,"तुम ठीक कहते हो अनाह..आम खाने से ही मतलब रखना चाहिए..!" 

और उसने झोपड़ी में नजर दौड़ाई तो उसे वहां रस्सी में टंगा कुछ कपड़ा दिखाई दिया.. उसके बदन में जगह जगह खरोंच के ज़ख्म थे जिससे रिस रहा खून जम गया था उसने उन जख्मों को वहां पड़े गमछा से पोंछी और रस्सी में टंगे धोती को उतारकर अपने बदन में जैसे तैसे लपेटते हुए खटिया में सोए शख़्स पर सरसरी नजर डाली ..वह घोड़ा बेचकर सोया हुआ था।वह मन ही मन अनाह को धन्यवाद देते हुए बुदबुदाई,"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद अनाह ..आज तुम्हारे कारण मैं उस गुफा से निकल कर यहां पहुंच पाई..अब मुझे विश्वास हो गया है कि मैं जिंदा बच जाऊंगी..!" सोचते सोचते वह पास पड़े पुआल के ढेर पर सिकुड़ कर लेटी और गमछा ओढ़ ली। ये पुआल का बिस्तर उसके लिए मखमल के गद्दे से ज्यादा सुकून दायक था, उसके मन मस्तिष्क में अनाह की तस्वीर तैर रही थी,उसकी एक एक हरकतें किसी चलचित्र की भांति उसके आंखों के सामने नाच रहा था..अनाह का ख्वाब देखते देखते कब उसकी आंखें लग गई उसे पता ही न चला..!

संघर्ष के पथ पर एक छोटी सी सफलता जो सुकून देती है.. वहीं संघर्ष के उत्कर्ष पर मिलने वाला सुकून उसका मुखौटा मात्र होता है। 

सुबह की शीतल किरणें जब झोपड़ी के झरोखों से छनकर खाट पर सोए व्यक्ति पर पड़ा तो उसकी नींद खुली और वह अंगड़ाई लेते हुए उठ बैठा.. ये 20-22 साल का नौजवान था, गेंहुआं रंग,हृष्ट-पुष्ट बदन, बड़ी बड़ी आकर्षक आंखें,हल्की मूंछें और छोटी दाढ़ी में वह बहुत खूबसूरत लग रहा था..वह खटिया से नीचे उतरा और अपने खुले लुंगी को दुरुस्त किया और रस्सी में हमेशा टंगे रहने वाले गमछा को न देखकर मन ही मन बुदबुदाया,,"ये गमछा आज कहां चला गया..? हमेशा तो यही टंगा रहता था..?" वह रस्सी में टंगे कप़ड़े को उलट पलट कर गमछा को खोजने में व्यस्त था कि वही कुत्ता जो प्रतीक्षा को यहां तक लाया था उसके चारों ओर घुम घुम कर कूं..कूं...कर रहा था,जब उसका ध्यान कुत्ते पर गया तो उसने उसे पुचकारते हुए कहा,"क्या बात है शेरु..आज इतना खुश क्यों है.. कहीं सुबह-सुबह कोई बढ़िया दावत उड़ा आया है क्या..?" 

शेरु जैसे उसके बातों को समझ रहा था और उसने आव देखा न ताव दौड़कर प्रतीक्षा के बदन पर पड़े गमछा के एक छोर को मुंह में दबाया और उसके सम्मुख खड़ा हो गया.. प्रतीक्षा गहरी नींद में थी और उस युवक की नजर जैसे ही प्रतीक्षा पर पड़ी उसकी आंखें फटी की फटी रह गई... उसके आंखों के सामने जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा उतर आई थी। उसपर पड़ते सुबह के सुनहरी किरणों से उसका बदन ऐसा खिल रहा था जैसे कीचड़ में कमल खिला हो..! उसके गोरे चेहरे पर उसके खुले बाल बिखरे हुए थे और एक प्रकाश पुंज से चमकता गोरा चेहरा देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे बादलों के पीछे चांद छुपा हो..वह युवक मंत्रमुग्ध उस अनुपम सौंदर्य का दीदार कर रहा था और अनुपम सौंदर्य की मल्लिका इन सबसे बेखबर सुबह की मीठी नींद में अपने राजकुमार के सपने में खोई थी..!

                                                  क्रमशः...