अस्पताल की गलियों में भागते हुए अर्जुन और राधा के पैर थक रहे थे, पर दिल की धड़कनें रुकी हुई थीं। जब वे आईसीयू (ICU) के बाहर पहुँचे, तो देखा कि समीर ऑक्सीजन मास्क के सहारे लेटा हुआ था। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन होंठ रह-रहकर राधा का नाम पुकार रहे थे।
राधा भागकर उसके करीब गई और उसका हाथ थाम लिया। "समीर... मैं आ गई। आँखें खोलो समीर!"
समीर ने बहुत मुश्किल से अपनी पलकें झपकाईं। उसकी धुंधली नज़रों में राधा का चेहरा आया, और फिर उसकी नज़र पीछे खड़े अर्जुन पर पड़ी। समीर के चेहरे पर एक हल्की सी, दर्द भरी मुस्कान आई। उसने कांपते हाथों से अपना ऑक्सीजन मास्क थोड़ा हटाया।
"राधा... मैंने... मैंने तुम्हें आजाद कर दिया था। तुम... यहाँ क्यों आई?" समीर की आवाज़ बहुत धीमी थी।
राधा फूट-फूटकर रोने लगी। "कैसी आज़ादी समीर? क्या तुम मुझे इस बोझ के साथ जीने के लिए छोड़ देते कि मेरी वजह से तुम्हारी यह हालत हुई?"
समीर ने धीरे से अपना दूसरा हाथ बढ़ाया और पास खड़े अर्जुन का हाथ पकड़ लिया। उसने अर्जुन का हाथ राधा के हाथ के ऊपर रख दिया। अस्पताल के उस कमरे में सन्नाटा पसर गया। अर्जुन की आँखों से भी आँसू बह रहे थे।
"अर्जुन भाई..." समीर ने रुक-रुक कर कहा, "मैंने... मैंने अपनी ज़िंदगी में हमेशा सही काम करने की कोशिश की। राधा के दिल में जगह नहीं बना पाया, पर... पर उसे खोना नहीं चाहता था। आज... आज मैं अपनी सबसे कीमती चीज़ आपको सौंप रहा हूँ। वादा कीजिए... इसे कभी रोने नहीं देंगे।"
अर्जुन ने भारी आवाज़ में कहा, "समीर, तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम ठीक हो जाओगे..."
समीर ने धीरे से अपना सिर हिलाया। "नहीं... मेरा सफर यहीं तक था। राधा, मुझे माफ करना... मैं तुम्हें वो मोहब्बत नहीं दे पाया जिसकी तुम हकदार थी।"
इतना कहते ही समीर की पकड़ ढीली पड़ गई। मॉनिटर पर चलती लंबी 'बीप' की आवाज़ ने कमरे की शांति को चीर दिया। समीर की रूह उसे छोड़ चुकी थी।
राधा की एक चीख निकली और वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई। अर्जुन उसे संभालना चाहता था, पर उसके खुद के पैर कांप रहे थे। समीर ने मरते-मरते भी अपनी मोहब्बत का ऐसा सबूत दिया था कि अर्जुन और राधा के लिए अब एक होना इतना आसान नहीं था।
हफ़्तों बीत गए। समीर का अंतिम संस्कार हो चुका था। अर्जुन रोज़ राधा के घर के बाहर जाता, पर अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह जानता था कि समीर की मौत ने उनके बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जिसे पार करना किसी गुनाह जैसा महसूस हो रहा था।
एक शाम, राधा ने खुद अर्जुन को उसी पार्क में बुलाया।
अर्जुन जब पहुँचा, तो राधा ने उसकी तरफ एक छोटा सा लिफाफा बढ़ाया। "समीर की एक डायरी मिली है अर्जुन। उसने आखिरी पन्ने पर लिखा था कि अगर वह नहीं रहा, तो हम दोनों को दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। उसने लिखा है कि 'प्यार किसी को पाने का नाम नहीं, बल्कि किसी को मुकम्मल करने का नाम है'।"
राधा ने अर्जुन की आँखों में देखा। "पर अर्जुन, क्या हम समीर की चिता की राख पर अपनी खुशियों का महल बना पाएंगे?"
अर्जुन खामोश रहा। आसमान फिर से नारंगी हो रहा था, ठीक उसी शाम की तरह जब वे पहली बार जुदा हुए थे। पर इस बार सवाल जुदाई का नहीं, बल्कि 'पश्चाताप' और 'प्रेम' के बीच के चुनाव का था।
क्या अर्जुन और राधा इस बोझ के साथ एक नई शुरुआत कर पाएंगे? या उनकी मोहब्बत हमेशा के लिए 'अधूरी' ही रह जाएगी?
जानने के लिए पढ़ें — अंतिम अध्याय (अध्याय 10) ✨📖