गुनगुन के आने के बाद त्रिशा और राजन के जीवन में खुशियां तो आई पर वहीं खुशियों के साथ साथ जिम्मेदारियां भी आई है दोनों पर। जहां एक ओर त्रिशा पर गुनगुन के आने के बाद उसकी देखभाल के साथ घर के सारे काम ओर बाकी लोगों का ध्यान रखना बहुत ही मुश्किल और थकाने वाला हो गया वहीं राजन पर भी एक सदस्य का भार और पड़। दिन पर दिन दोनों अपनी अपनी जिम्मेदारियों में उलझते जा रहे है।
त्रिशा और राजन दोनों ही अपने अपने कामों में इस कदर से उलझते जा रहे थे कि उनके बीच प्यार के पलों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही थी। कभी त्रिशा को गुनगुन को सुलाते सुलाते देर हो जाती तो उसके सोने तक राजन सो जाता तो कभी राजन को ऑफिस का काम खत्म करते करते इतनी देर हो जाती कि उसके फुरसत होने से पहले त्रिशा सो जाती। और सुबह होते ही फिर दोनों लग जाते अपनी भागम भाग में।
पूरे हफ्ते में एक रविवार का दिन होता था जो राजन को मिलता था अपने परिवार के साथ बिताने को। जिस दिन पहले वो सुबह आराम से अपनी नींद पूरी करता। फिर उठ कर आराम से नाश्ता वाश्ता करके अपनी नन्हीं सी गुड़िया के साथ दिन बिताता और फिर दोपहर में त्रिशा के साथ अपनी सुख दुख की बाते करता जो उसे पूरे हफ्ते में करने की फुर्सत और वक्त दोनों ही नहीं मिलते थे। और रात में सभी को वह बाहर लेकर घूमने जाता, उनके साथ फैमिली टाइम बिताता और रात में गुनगुन को अपनी मां के पास छोड़कर वो और त्रिशा अपने प्यार के पल साथ में बिताकर एक दूसरे की बांहों में सो जाते। जो कि गुनगुन के आने के बाद बहुत ही कम हो गए थे।
ऐसे ही धीरे धीरे समय बितता गया और समय के साथ दोनों अपनी खुशहाल जिंदगीं बिता रहे थे। पर अभी भी उनके बीच राजन की शराब की आदत उनके घर में कलेश का कारण बनी हुई है।
राजन ने वादा किया था और गुनगुन के होने तक उसने शराब को हाथ भी नहीं लगाया था लेकिन जिस दिन उसने गुनगुन के होने की पार्टी रखी उसी दिन से वह फिर से शराब पीने लगा था।
त्रिशा अब राजन की समझा समझा के हार चुकी थी इसलिए उसने भी उसे उसके हाल पर छोड़ दिया और बस अपनी बेटी पर अपना सारा ध्यान लगा दिया। लेकिन हर बितते दिन के साथ राजन का व्यवहार शराब पीने के बाद बदतर होता जा रहा था।
शराब पीकर घर आना, घर आकर बहस करना, बिन बात त्रिशा को सुनना, उसके साथ जोर जबर्दस्ती करना यह सब तो वह पहले भी करता था और तब त्रिशा बस जैसे तैसे कमरे से बाहर निकल जाती और अपनी सास के साथ या बाहर हाल में रात बिताती पर अब बात अलग थी अब त्रिशा के साथ उसके कमरे में गुनगुन भी होती थी।
और बहुत बार ऐसा होता की राजन की बहस या उसके चिल्लाने से नन्ही गुनगुन रो पड़ती पर बजाय इसके की वो अपनी बेटी को चुप करवा के सुला पाती उसे उसके पति की जोर जबर्दस्ती सहनी पड़ती। त्रिशा बहुत बार कोशिश करती की गुनगुन के जागने से पहले वह उसको लेकर कमरे से बाहर चली जाए पर अब तो राजन त्रिशा को कमरे से बाहर भी नहीं जाने देता था।
पूरे टाईम वो त्रिशा को अपने साथ वहीं रुम में रखता और उस पर अपनी भड़ास निकालता रहता। बहुत सी बार यह भड़ास उसके ऑफिस या स्ट्रेस की होती तो बेचारी त्रिशा के शरीर पर या तो उसके पति के पुरुषार्थ के रूप में निकलती या फिर उसके शरीर पर मार पीट कर। त्रिशा को इन सब की आदत हो गई थी और उसे अब हालात के सुधरने के कोई उम्मीद नहीं थी वो सब कुछ जैसा है वैसा अपना चुकी थी उसे अब अपने लिए नहीं अपनी बेटी के लिए बुरा लगता था। क्योंकि अब वो नहीं उसकी बेटी डर और भूख से रोती थी रात थी। इसलिए जैसे ही राजन अपनी मनमानी कर सो जाता अपने लिए दुख मनाने की जगह त्रिशा भागी भागी जाती और अपनी बेटी को छाती से लगा कर उसे लाड़ दुलार कर चुप करवाती, उस दूध पिलाती और उसे अपनी छाती से चिपका कर सो जाती।
त्रिशा को अपनी जिंदगी से और कोई दुख नहीं था थी तो बस यहीं एक शिकायत कि भगवान ने जब उसे सब कुछ अच्छा दिया तो राजन को यह आदत क्यों दे दी जिसने उसके जीवन को नर्क बनाया हुआ है। पर राजन की सारी अच्छी आदतों के आगे और होश में आने के बाद उसकी चिंता, फिक्र, माफी और अपनी बेटी के प्रति उसके प्यार और लगाव को देख वह उसकी इस आदत और व्यवहार को भी सहन कर लेती थी।
उसे बुरा लगता था, दुख होता था, कभी कभी बहुत गुस्सा भी आता था पर फिर भी वह अपने आप को समझा लेती कि यह सब तो नशे में होता है ना वैसे तो राजन उसपर जान देता है। उसका और उसकी बेटी का इतना ध्यान रखता है। और हो सकता है कि गुनगुन बड़ी हो तो वो खुद सुधार ले।
त्रिशा की सास को भी अपनी बहु के बुरा लगता था क्योंकि वो खुद देखती थी कि कैसे वो बेचारी पूरे दिन घर के काम, गुनगुन की देखभाल और उन सबकी जरूरत का ध्यान रखती है और रात में सुकून के दो पल की नींद की जगह उसे मिलती है तो अपने ही पति से इस प्रकार की प्रताड़ना। उन्होंने बहुत बार राजन को समझाने की कोशिश की पर राजन अपनी मां के आगे हर बार यही कहता कि आगे से नहीं होगा और फिर हफ्ते दो हफ्ते बाद वही सब होता। इसलिए जैसे ही गुनगुन थोड़ी सी बड़ी हुई त्रिशा ने जब जब राजन शराब पीकर आता उसे अपनी सास के कमरे में सुलाना शुरू कर दिया ताकि कम से कम उसकी बेटी तो आराम से बिना डर के सो सके।