Trisha - 44 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 44

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त्रिशा... - 44

अस्पताल के गलियारे में बैठे त्रिशा के परिवार के सभी लोग उसके लिए चिंतित हो रहे है। सभी परेशान है और राजन तो टेंशन में इधर से उधर घूम रहा है। मानस और कल्पेश ने उसे कहा भी कि सब ठीक होगा चिंता ना करें पर वह फिर भी नर्वस है। राजन की मां और त्रिशा की मां  दोनों बस जच्चा और बच्चा कि सलामति के लिए इश्वर से प्रार्थना कर रही है‌‌। सभी बस किसी ना किसी तरह इस समय को काट रहे है। 

उन सभी की चिंता और परेशानी तब दूर हुई जब अंदर से आई नर्स ने उन्हें बच्चे के जन्म की सूचना देते हुए बताया कि उनके घर लक्ष्मी आई है। सभी लोग इस खबर को पाकर खुशी से एक दूसरे के गले लगने लगे। दोनों मां भगवान का शुक्रिया करने लगी और सभी ने राजन को एक एक कर उसके गले लग बधाई दी। 

वो लोग खुशी मना ही रहे थे की तभी अंदर से आए डाॅक्टर ने बताया कि जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित है। बच्ची  की सांस अभी  कुछ धीमी है तो उसे 24 घंटे तक ओबजर्वेशन में रखा जाएगा और त्रिशा को भी नार्मल वार्ड में शिफ्ट किया जा रहा है उसके होश में आने के बाद वो सब आराम से उस से मिल सकते है। 

डाॅक्टर के जाने के बाद और त्रिशा के नॉर्मल वार्ड में शिफ्ट होने के बाद जब सब ओके हो गया तो राजन ने सबको घर भेज दिया पर सबके सुझाव पर कल्पना वहीं रुक गई। और बाकी सभी को मानस वापस घर ले आया। 

शाम होते होते त्रिशा को भी होश आ गया था और राजन ने उसे भी अपनी बेटी के आने की खुश खबरी दी। त्रिशा तो तभी के तभी अपनी बच्ची को देखना और गले लगाना चाहती थी पर राजन ने उसे बताया कि उसे कुछ समय इंतजार करना पड़ेगा और अपने मन को समझा कर वह भी कल सुबह तक का इंतजार करने लगी। 

अगली सुबह त्रिशा के जीवन की कुछ खूबसूरत सुबह में से एक है। क्योंकि आज पहली बार वो अपनी बच्ची को अपने हाथों से छू रही थी, उसे अपनी गोद में ले रही है, उसे अपने सीने से लगा रही है, उसके माथे को बार बार चूम रही है, यह सब एहसास, खुशी और इस पल उसमें उमड़ रहे वात्सल्य को शब्दों में कैसे बयां करे यह तो समझ के परे है। पर मातृत्व के इस सुख ने त्रिशा को जीवन का शब्द बड़ा सुख और संतोष दिया है। 

खैर त्रिशा ने जब अपनी बच्ची को गोद में लेकर सीने से लगाया तो वो वह सारी तकलीफ, वह सारा दर्द भूल गई जो उसने उसके जन्म के वक्त सहा था। आज उसकी खुशी शब्दों से परे है। यह एहसास सिर्फ और सिर्फ वो समझ सकती है। त्रिशा अपनी बच्ची को सीने से चिपकाए बैठी ही थी कि तभी पीछे से राजन आया और उसने त्रिशा को अपनी बच्ची सहित अपने सीने से लगा लिया और उसके कान में फुसफुसाया," मेरा बिना अकेले खुश हो रही हो???"

"आपके बिना तो मेरी हर खुशी अधूरी है!!!!!!" त्रिशा ने शर्माते हुए कहा और अपनी बच्ची को प्यार से पकड़ कर खुद राजन के सीने से चिपक गई। और फिर राजन ने पहले उसका और फिर अपनी बच्ची का माथा बारी बारी से चूमते हुए बोला," और अबसे मेरी तुम दोनों के बिना!!!!!!"

राजन की बात सुनकर त्रिशा मुस्कुरा दी और उसे मुस्काता देख वह भी मुस्कुरा दिया। तभी पीछे से कल्पेश ने आकर कहा," अच्छा बेटा राजन, त्रिशा की छुट्टी तो हो गई है, चलो मानस गाड़ी लेकर खड़ा है बाहर तुम सब को घर छोड़ दे।" 

इसके बाद कल्पेश, राजन, त्रिशा सभी घर वापस लौट आए अपनी छोटी सी परी के साथ। जहां उसका स्वागत उसकी दादी और परनानी ने बड़ी ही खुशी से किया। घर आने के बाद सबसे पहले राजन की नानी ने उस बच्ची को टिका लगा कर उसकी आरती उतारी और फिर तो बस उसे गोद में लेने और खिलाने की तो जंग सी ही छिड़ गई सबमें।

पूरा दिन सभी लोग उसके आगे पीछे घूमते उसकी देखभाल करने को क्योंकि त्रिशा को तो यह सब आता नहीं था इसलिए उसकी सांस ही सब कुछ संभाल रही है। त्रिशा के अस्पताल से आने के थोड़े दिन बाद  घर में हवन कराया गया और फिर बच्ची का नामकरण किया गया। 

वैसे तो उसकी दादी ने पहले ही उसका नाम रख लिया था जो सभी को बहुत पसंद भी आया पर आज औपचारिक तौर पर राजन और त्रिशा की बेटी का नाम उसकी दादी ने गुनगुन रखा। हवन और नामकरण के बाद मेहमानों के लिए दावत का इंतजाम भी किया गया। उस दिन का सारा कार्यक्रम आराम से और बड़ी खुशी से निबट गया। 

नामकरण के एक हफ्ते बाद ही राजन अपनी मां, पत्नी और बेटी के साथ पूना लौट आया और वहां फिर से उनकी जिंदगी पहले की तरह चलने लगी पर बस अब उनकी जिंदगी में एक नया रंग गुनगुन ने आकर भर दिया। 

पहले कि तरह अभी भी त्रिशा रोज सुबह पांच बजे उठ जाती है और अगर  गुनगुन उससे पहले उठ गई तो कभी कभी बेचारी पांच बजे से पहले ही उठ जाती है। उठकर गुनगुन को दूध पिलाकर फिर से सुलाने के बाद घर में झाड़ू लगाकर वह नहाकर पूजा करके अपनी और अपनी मम्मी जी की चाय बनाती है। फिर से नाश्ते के बाद वह खाने की तैयारी करती है और अगर बीच बीच में गुनगुन रोने लगे तो उसे देखती है उसे फिर से दूध पिलाकर वह गुनगुन को उसकी दादी के पास छोड़ आती है और फटाफट अपना सारा काम निबटाने में लग जाती है। फिर राजन को उठाती है और फिर उसके कपड़े और बाकी सामान निकाल कर रखती है फिर उसके तैयार होने से पहले उसका टिफिन पैक करती है और नाश्ता देती है। और राजन के बाद और उसके आने तक वह कभी इस काम में तो कभी उस काम में लगी ही रहती।