Forgotten station. in Hindi Horror Stories by Jeetendra books and stories PDF | भूला हुआ स्टेशन।

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भूला हुआ स्टेशन।

बारिश का मौसम था। और बारिश भी ऐसी जो बस गिरती नहीं थी। बल्कि छत पर बैठकर कान के अंदर तक उतर जाती थी। जैसे कोई दूर खड़ा आदमी लगातार किसी टूटे हुए गाने को बुदबुदा रहा हो।

सुमित ने अपनी पुरानी जीप को सड़क के किनारे रोका और शीशा नीचे किया। सामने घने पेड़ों के बीच एक लोहे का टूटा हुआ गेट खड़ा था। उसके ऊपर जंग लगी हुई पट्टी पर लिखा था।

रानीपुर स्वागत करता है।

लेकिन स्वागत जैसा कुछ नहीं था वहाँ। बस सन्नाटा था। इतना भारी सन्नाटा कि सुमित को लगा अगर वह तेज सांस लेगा तो किसी को खबर हो जाएगी।

उसने मोबाइल की स्क्रीन देखी। नेटवर्क नहीं था। समय था रात के दस बजकर तेरह मिनट। और पीछे शहर से यहां तक आने का रास्ता इतना सुनसान था कि वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि उसने यह सफर क्यों किया।

वो बस कुछ कागज लेने आया था।

अपने मरे हुए पिता के पुराने मकान की रजिस्ट्री के कागज।

तीन हफ्ते पहले पिता की मौत के बाद वकील ने कहा था कि गांव के पुराने घर का कुछ पेपर अभी भी रानीपुर के तहसील दफ्तर में अटका हुआ है। अगर यह नहीं मिला तो जमीन का हिस्सा कानूनी झंझट में फंस सकता है। सुमित ने पहले मना किया था। फिर पैसों की जरूरत और मां की चुप निगाहों ने उसे मानने पर मजबूर कर दिया।

रानीपुर।

उसका बचपन वहीं बीता था। मगर वह जगह उसके दिमाग में हमेशा धुंधली रही थी। जैसे कोई पुरानी फोटो जिसे बार बार गीला किया गया हो।

उसने गेट धकेला। गेट भीतर की तरफ बहुत धीमे खुला। एक लंबी चीख जैसी आवाज आई। सुमित ने रुककर इधर उधर देखा। दूर कहीं एक कुत्ता भौंका। फिर चुप हो गया।

सड़क पतली थी। दोनों ओर पुराने घर थे। खिड़कियों पर लकड़ी के तख्ते। कई दरवाजे आधे खुले। जैसे लोग बहुत जल्दी में घर छोड़कर भाग गए हों। बिजली के खंभे थे। पर रोशनी नहीं। बारिश के बाद हवा में मिट्टी की ऐसी गंध थी जिसमें सड़न भी मिली हुई थी।

सुमित ने जीप आगे बढ़ाई।

दस साल पहले वह आखिरी बार यहां आया था। तब उसकी उम्र सत्रह रही होगी। तब उसके छोटे भाई की मौत हुई थी।

अजय।

नाम याद आते ही उसकी रीढ़ में ठंड सी दौड़ गई।

अजय खेलते खेलते पुराने कुएं के पास गिर गया था। या कम से कम यही कहा गया था। गांव वालों ने कहा था कि फिसल गया। मां ने कहा था कि गांव के पुराने घर में बुरी नजर का असर है। पिता ने कहा था कि लड़के को संभलकर रहना चाहिए था। और सुमित ने... सुमित ने कुछ नहीं कहा था।

क्योंकि उस रात उसने कुएं के पास किसी और को देखा था।

एक बहुत लंबा आदमी।

बिना चेहरे का आदमी।

उसने यह बात किसी को नहीं बताई थी। उस समय वह खुद भी नहीं जानता था कि उसने सच देखा था या डर ने उसे झूठ दिखाया था।

अब वही डर वापस लौट रहा था।

तहसील दफ्तर जिस इमारत में था वह शहर के बीचोंबीच नहीं। बल्कि पुराने बाजार के पीछे एक अधपकी नींद जैसी जगह पर था। सुमित वहां पहुंचा तो दरवाजा बंद था। ऊपर एक पीली बल्ब की रोशनी डोल रही थी। खिड़की पर बैठा एक बूढ़ा चपरासी झपकी ले रहा था।

सुमित ने कांच पर हल्की दस्तक दी।

बूढ़े ने आंखें खोलीं। उसे देखा। फिर बिना कुछ पूछे दरवाजा खोल दिया। उसके चेहरे पर अजीब थकान थी। जैसे वह आदमी नहीं बल्कि किसी थके हुए पेड़ की छाल हो।

आओ।

उसने धीरे कहा।

सुमित भीतर गया। दफ्तर में सीलन थी। दीवारों पर पुराने पोस्टर। लकड़ी की अलमारियां। फाइलों की गंध। और एक कोने में रखी लाल टेबल लैंप की धुंधली रोशनी।

कौन सी फाइल चाहिए?

बूढ़े ने पूछा।

सुमित ने पिता का नाम बताया। बूढ़ा एक पल उसे घूरता रहा। फिर उसने अपनी उंगलियां मेज पर रखीं। नाखून बहुत लंबे थे। पीले और टूटे हुए।

तुम लोग फिर आ गए।

उसने बेहद धीमे स्वर में कहा।

सुमित ने भौंचक्का होकर देखा।

क्या मतलब।

बूढ़ा मुस्कराया नहीं। उसकी आंखों में कोई दया नहीं थी। बस वही थकान। और उससे भी गहरी कोई पुरानी घृणा।

पुराने घर के कागज? उसने पूछा। रात में कोई नहीं आता इनके लिए। जो आता है वह सुबह तक याद नहीं रहता।

सुमित ने असहज होकर सिर हिलाया।

मुझे बस कागज चाहिए।

बूढ़े ने फाइलों के ढेर की ओर हाथ बढ़ाया। कुछ देर टटोलता रहा। फिर एक पतली सी लाल फाइल निकाली। उस पर धूल जमी थी। उसने फाइल सुमित की तरफ बढ़ाई नहीं। बस हाथ में पकड़े रखा।

तुम सुमित हो।

यह सवाल नहीं था।

सुमित ने हां कहा।

बूढ़ा कुछ और बोलने ही वाला था कि बाहर कहीं बहुत दूर घंटी बजी।

एक बार।

फिर दूसरी बार।

फिर सब चुप।

बूढ़ा अचानक पीला पड़ गया। जैसे किसी ने उसकी हवा छीन ली हो।

दरवाजा बंद कर लो।

उसने कहा।

क्यों?

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया। उसने फाइल मेज पर पटक दी और जल्दी से लाइट बंद कर दी। अंधेरा एकदम से कमरे में भर गया। बाहर की बारिश की आवाज तेज लगने लगी।

सुमित घबरा गया।

क्या हुआ?

श्श्श।

बूढ़े ने कहा।

अब कुछ नहीं बोलना।

फिर बाहर से कदमों की आवाज आई।

धीमी।

नंगी।

जैसे कोई गीली मिट्टी पर चलता हुआ आ रहा हो।

सुमित ने सांस रोक ली।

कदम दफ्तर के सामने आकर थमे।

फिर कांच के बाहर एक परछाईं रुकी।

लंबी।

बहुत लंबी।

इतनी लंबी कि वह दरवाजे से ऊपर तक दिख रही थी।

सुमित का मुंह सूख गया। उसने बहुत कोशिश की पर अपनी आंखें हिला नहीं पाया।

परछाईं ने हल्के से कांच पर हाथ रखा।

और उस हाथ में उंगलियां नहीं थीं।

बस हड्डी जैसी पतली टहनियां थीं।

बूढ़े ने फुसफुसाया।

मत देखो।

लेकिन सुमित देख चुका था।

बाहर खड़ा वह आदमी वही नहीं था जो इंसान होता है। उसके कंधे बहुत झुके हुए थे। चेहरा अंधेरा था। पर उसकी छाती पर एक छोटी सी सफेद चीज चमक रही थी।

घंटी।

पुराने मंदिर की छोटी घंटी।

वही घंटी जो गांव में उस कुएं के पास हमेशा लटकती थी।

सुमित का दिल जोर से धड़कने लगा।

परछाईं धीरे से दरवाजे की तरफ मुड़ी।

और फिर आवाज आई।

बहुत गहरी। बहुत नीचे से निकलती हुई।

सुमित।

नाम सुनते ही उसकी जीभ सुन्न हो गई।

बूढ़ा फुसफुसाया।

तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।

दरवाजे के बाहर उस आवाज ने फिर कहा।

अजय कहां है।

सुमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

उसने खुद को संभालने की कोशिश की। यह नाम तो मर चुका था। अजय मर चुका था। उसका शव देखा गया था। उसका अंतिम संस्कार हुआ था। फिर यह कौन पूछ रहा था?

बूढ़ा बहुत धीमे से उठा।

तहखाने में मत जाना।

उसने कहा।

कौन सा तहखाना?

बूढ़े ने सुमित की तरफ नहीं देखा।

जिसे तुम्हारे पिता ने बंद किया था।

फिर वह अचानक दरवाजे की तरफ बढ़ा। जैसे उसने निर्णय ले लिया हो। उसने कुंडी खींची। बाहर का अंधेरा एकदम कमरे में लपक पड़ा। फिर बूढ़ा चीख भी नहीं सका। बस एक भारी सा झटका लगा। और उसका शरीर पीछे की ओर गिर गया।

सुमित ने सिर्फ एक आवाज सुनी।

खरखराहट।

जैसे किसी ने इंसानी हड्डी को धीरे से मोड़ा हो।

फिर सन्नाटा।

सुमित पीछे हट गया। उसके हाथ से फाइल गिर गई। उसकी नजर फाइल पर पड़ी तो उसमें पिता के नाम के नीचे एक पुरानी टिप्पणी लिखी थी।

कब्र खाली है।

उसके पैरों तले जमीन हिल गई।

कब्र खाली है?

क्या मतलब था इसका?

उसी पल उसे याद आया। बचपन की एक कटी फटी याद।

बरसात की रात।

पिता।

मां रोती हुई।

और घर के पीछे किसी के मिट्टी खोदने की आवाज।

सुमित ने तेज कदमों से फाइल उठाई और दफ्तर से बाहर भागा। गलियारे में अंधेरा था। एक तरफ टूटी कुर्सियां। दूसरी तरफ सरकारी रैक। उसने मोबाइल जलाकर देखा। स्क्रीन पर बार बार चमकता हुआ एक ही संदेश आ रहा था।

तुम पीछे देख रहे हो।

उसका दम घुट गया।

किसने भेजा।

नेटवर्क नहीं था। फिर यह संदेश कैसे आया।

वह भागता हुआ बाहर निकला। बारिश अब और तेज थी। सड़क लगभग खाली। दूर एक रिक्शा खड़ा था जो किसी भूत की तरह बिना हिले वहीं मौजूद था।

सुमित ने जीप की तरफ दौड़ लगाई।

और तभी उसे पीछे से बच्चों की हंसी सुनाई दी।

वह पलटकर नहीं देखा।

उसने सिर्फ भागना जारी रखा।

जीप का दरवाजा खोला। अंदर कूदा। इंजन स्टार्ट किया। लेकिन गाड़ी रुकी रही। फिर एक बार झटका दिया। फिर दूसरी बार। बैटरी खत्म नहीं थी। पेट्रोल भी था। फिर क्यों नहीं चल रही थी।

कांच पर किसी ने उंगली से दस्तक दी।

धीमी।

एक दो तीन।

सुमित ने सिर घुमाया।

विंडस्क्रीन के बाहर कोई नहीं था। लेकिन हुड पर पानी में एक हाथ का निशान बन गया। उसके बाद दूसरा। फिर तीसरा।

जैसे कोई वहां खड़ा होकर गीले हाथों से गाड़ी पर चढ़ रहा हो।

सुमित ने चीखते हुए स्टार्टर फिर घुमाया।

इंजन गरजा। जीप ने एकदम झटका खाया और आगे बढ़ गई।

उसने शहर की तंग गलियों से जीप दौड़ाई। बारिश में रास्ता चमक रहा था। वह बस निकल जाना चाहता था। इस जगह से। इस नाम से। इस याद से।

फिर सामने उसे घर दिखा।

पुराना घर।

वहीं जहां उसका बचपन बीता था।

उसने झटके से ब्रेक लगाया।

घर की खिड़कियों से पीली रोशनी आ रही थी।

सुमित जम गया।

यह असंभव था। वह घर तो सालों से बंद था। मां वहां नहीं थी। पिता मर चुके थे। फिर रोशनी कौन जलाता था?

वह जीप से उतरा। पैर कांप रहे थे। हाथ में लाल फाइल थी। उसने धीरे से गेट खोला। आंगन में पानी भरा था। दीवारों पर काई। लेकिन भीतर का दरवाजा खुला था।

उसने पुकारा।

कोई है?

जवाब नहीं आया।

फिर भीतर से मां की आवाज आई।

आ जा बेटा।

सुमित ठिठक गया।

यह उसकी मां की आवाज नहीं थी।

हां, आवाज बिलकुल वही थी। लेकिन उसमें जिंदा इंसान वाली गर्माहट नहीं थी। उसमें मिट्टी और ठंड थी। जैसे किसी कब्र ने बोलना सीख लिया हो।

सुमित का सिर भारी होने लगा।

उसने दरवाजे की तरफ देखा।

अंदर वही पुराना हॉल था। लकड़ी की कुर्सियां। दीवार पर टूटी तस्वीरें। और बीच में उसकी मां की पुरानी सिलाई मशीन।

पर मशीन के सामने कोई बैठा था।

पीठ उसकी तरफ थी।

बड़ी पीठ।

झुका हुआ कंधा।

सुमित के मुंह से सूखी सांस निकली।

पिता?

पीठ वाला आदमी धीरे से हिला।

फिर कुर्सी चरमराई।

और वह चेहरा उसकी तरफ मुड़ा।

चेहरा नहीं था।

बस एक काला छेद था।

जैसे किसी ने त्वचा को पूरी तरह हटा दिया हो और उसके नीचे कुछ बहुत पुराना और भूखा बचा हो।

सुमित ने चीखने की कोशिश की। आवाज नहीं निकली।

वह पीछे हटना चाहता था लेकिन उसके पैर पत्थर बन चुके थे।

उस काले चेहरों वाले प्राणी ने धीरे से कहा।

तुमने दरवाजा खुला छोड़ दिया था।

सुमित को अचानक सब याद आने लगा।

अजय की मौत।

उस रात पिता का कुएं तक जाना।

मां की रोती हुई आंखें।

और वह लाल फाइल।

बचपन में पिता ने कहा था कि गांव के पुराने घर के नीचे एक तहखाना है। वहां अनाज नहीं रखा जाता। वहां कुछ और रखा जाता है। कुछ ऐसा जिसे नाम नहीं देना चाहिए। परिवार के सबसे बड़े बेटे को एक रात वहां नीचे जाना था। यह परंपरा थी। एक डरावनी और पागल परंपरा। पिता ने मना किया। फिर भी गांव वाले बार बार आते रहे। कहते रहे कि अगर यह नहीं किया गया तो घर में छाया बैठ जाएगी।

सुमित छोटा था। उसे सिर्फ इतना याद था कि उस रात अजय गायब हो गया। और पिता ने सबको बताया कि वह कुएं में गिर गया।

लेकिन सच कुछ और था।

सच यह था कि पिता ने तहखाने का पत्थर दरवाजा खोला था।

और अंदर जो था वह बाहर निकल आया था।

धीरे धीरे।

पहले अजय को ले गया था।

फिर मां की हंसी को।

फिर पिता की आंखों की चमक को।

और आज सुमित को।

सुमित ने कांपते हाथों से फाइल खोली। आखिरी पन्ने पर पिता का साइन था। और नीचे एक वाक्य था।

अगर सुमित लौटे तो उसे मत आने देना। वह वही चुना गया है।

सुमित का गला सूख गया।

किसने चुना?

तभी पीछे से फुसफुसाहट आई।

मैंने।

वह पलटा।

अजय खड़ा था।

उसी उम्र में जैसे मरते समय था। गीले बाल। पीली आंखें। लेकिन उसके चेहरे पर अब इंसानी मासूमियत नहीं थी। उसके होठों पर एक खिंची हुई मुस्कान थी।

तुम मुझे छोड़ आए।

अजय ने कहा।

मैं नहीं चाहता था।

सुमित ने कांपते हुए कहा।

मैं बच्चा था।

अजय की हंसी बहुत हल्की थी। और बहुत गलत।

हम सब बच्चे थे।

फिर घर की दीवारों से ठक ठक की आवाज आई।

जैसे अंदर कुछ चल रहा हो।

जैसे घर के भीतर केवल कमरे नहीं। बल्कि और भी गहरे रास्ते हों।

अजय ने फर्श की तरफ इशारा किया।

नीचे आओ।

सुमित के पास भागने की जगह नहीं थी। पीछे काला चेहरा वाला आदमी। सामने मरा हुआ भाई। और चारों तरफ वही घर जो अब सांस लेता लग रहा था।

उसने एक कदम पीछे रखा।

और फर्श टूट गया।

वह सीधे अंधेरे में गिरा।

गिरते ही उसके कानों में चीखें भर गईं। बहुत सारी। स्त्रियों की। बच्चों की। बूढ़ों की। जैसे सैकड़ों आवाजें किसी गड्ढे में बंद कर दी गई हों। वह पत्थरों पर लुढ़कता हुआ एक ठंडी जमीन पर आ गिरा। उसके सिर में चोट लगी। आंखों के सामने तारे नाच गए।

जब उसे होश आया तो वह एक बड़े तहखाने में था।

छत इतनी नीची थी कि झुकना पड़ा।

दीवारों पर काली नमी। कोनों में पुराने कंकाल। और बीच में एक बहुत पुराना पत्थर का कुआं।

कुआं नहीं।

कब्र।

उसके ऊपर लोहे की जंजीर लिपटी थी।

सुमित ने जैसे ही उसका मुंह खोलकर देखा वैसे ही उसे समझ आ गया कि यह कोई कुआं नहीं बल्कि किसी चीज का मुंह था। अंदर से गरम सांस जैसी हवा आ रही थी। और उसमें किसी के बोलने की आवाज थी।

लो मुझे बाहर निकालो।

सुमित पीछे हट गया।

तभी अजय उसकी बगल में आ खड़ा हुआ।

अब समझे?

उसने कहा।

तुम्हारे पिता ने हमें बचाने के लिए नहीं। मुझे और मां को बंद करने के लिए इसे बंद किया था। गांव में हर पीढ़ी में एक लड़का नीचे उतारा जाता था। किसी ने पहले इसे सीख लिया था। किसी ने बाद में छुपा दिया। लेकिन यह भूख कभी खत्म नहीं हुई।

सुमित की आंखों से आंसू बहने लगे।

तो मैं क्यों।

अजय ने उसकी तरफ देखा।

क्योंकि तुम लौट आए।

सुमित ने सिर हिलाया।

मैंने तो सिर्फ कागज लेने आए।

अजय बहुत धीरे से हंसा।

तुम कागज नहीं लेने आए थे। तुम उसे वापस लेने आए थे जो तुम्हें बचपन में दिया गया था।

सुमित ने जेब में हाथ डाला। वहां से वही लाल फाइल निकल आई। फाइल अपने आप खुल गई। उसके अंदर एक छोटा सा पुराना कागज था। उस पर कांपते अक्षरों में लिखा था।

सुमित का जन्म रात्रि सेवा के नाम से दर्ज किया गया है।

उसकी सांस रुक गई।

क्या?

अजय ने कहा।

तुम इस घर के बच्चे नहीं हो।

तुम इसकी देन हो।

तभी कुएं के अंदर से हड्डियों की चरमराहट सुनाई दी।

जंजीरें हिलने लगीं।

सुमित घबराकर पीछे हटा।

दरारों से बहुत पतली काली उंगलियां बाहर आने लगीं।

फिर एक आंख।

बहुत बड़ी।

भूखी।

उस आंख में सुमित ने अपने पिता का चेहरा देखा। मां की रोती हुई परछाईं देखी। अजय की टूटी हुई हंसी देखी। और खुद को भी देखा। एक छोटे बच्चे की तरह जो रात में किसी को पुकार रहा है।

आवाज आई।

तुम लौट आए हो।

सुमित ने भागने की कोशिश की लेकिन अजय ने उसका हाथ पकड़ लिया।

अब नहीं।

उसने कहा।

इस बार कोई बाहर नहीं जाएगा।

सुमित ने उसे धक्का दिया।

अजय दीवार से टकराया। उसके शरीर से धूल निकली। लेकिन वह गिरा नहीं। वह बस खड़ा रहा। फिर उसने अपना चेहरा उठाया। और सुमित ने देखा कि उसकी गर्दन पर रस्सी के निशान नहीं। बल्कि लोहे की मोटी जंजीर के चिह्न थे।

वह भी बंद था।

वह भी कैद था।

और इसी कैद ने उसे बोलने दिया था।

सुमित ने जोर से कुएं की जंजीरें पकड़ीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कर रहा है। लेकिन एक बात साफ थी। अगर यह खुला तो सब खत्म। और अगर यह बंद रहा तो शायद यही अंत है।

उसने पूरी ताकत लगाई।

जंजीरें हिलीं।

आवाज और तेज हुई।

दीवारें कांपने लगीं।

अजय ने चिल्लाकर कहा।

रुक जाओ।

सुमित ने नहीं रोका।

उसके मन में सिर्फ एक बात थी। यह सब खत्म होना चाहिए।

उसने जंजीर को पूरी ताकत से खींचा।

और तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

वह पलटा।

उसकी मां खड़ी थी।

वही चेहरा। वही आंखें। लेकिन एकदम सफेद। जैसे पानी में बहुत देर पड़ी हुई लाश।

बेटा।

उसने बहुत प्यार से कहा।

उसे खोल मत।

सुमित के हाथ कांप गए।

मां?

मां ने आंखें नीचे कीं।

मैंने भी यही कहा था तुम्हारे पिता से।

क्यों?

मां की आंखों में पहले डर आया। फिर अपराध। फिर बहुत पुराना पछतावा।

क्योंकि नीचे वाला भूखा नहीं था। वह इंतजार कर रहा था। हमारे ही घर का सबसे सच्चा डर उसे खुलने देता है।

सुमित ने फाइल पर नजर डाली। उसमें आखिरी पन्ना और खुला था। उस पर एक और लाइन उभर आई।

दरवाजा वही खोलता है जो खुद बंद नहीं रहना चाहता।

सुमित को लगा जैसे किसी ने उसके पेट में हाथ डाल दिया हो।

वह बच्चा था।

उस रात।

दरवाजा उसने ही खोला था।

बिना समझे।

बिना जानें।

और उसी वजह से अजय गया था।

उसकी सांसें तेज हो गईं।

कुएं के अंदर से अब कई आवाजें आ रही थीं। मां। पिता। अजय। और कोई और। बहुत पुराना। बहुत गहरा। जैसे सबके भीतर से कोई एक ही भूखा स्वर बोल रहा हो।

मां ने उसका हाथ थामा।

तुम अभी भी उसे चुन सकते हो।

कैसे?

मां ने कुएं की तरफ देखा।

दरवाजा खुलने के बाद किसी को अंदर जाना होगा।

सुमित समझ गया।

उसकी आंखों के सामने पूरा जीवन एक धुंधली नदी की तरह बह गया। मां की बीमारी। पिता की खामोशी। अजय की मौत। उसका अपना भागना। और अब वापसी।

उसने अजय की तरफ देखा।

तुम?

अजय ने सिर हिलाया।

मैं पहले ही मर चुका हूं।

सुमित ने मां को देखा।

आप?

मां ने पहली बार मुस्कराने की कोशिश की।

मैं बहुत पहले यहीं रह गई थी।

फिर उसने सुमित की जेब में रखी लाल फाइल निकाली और कुएं के ऊपर फेंक दी। फाइल जलने लगी। बिना आग के। कागज काला पड़ने लगा। कुएं के भीतर से क्रोध की चीख उठी। इतने जोर से कि तहखाने की दीवारें फटने लगीं।

सुमित ने समझ लिया।

अब निर्णय उसका था।

या तो वह भागे।

या फिर नीचे जाए।

वह एक लंबा पल वहीं खड़ा रहा। फिर उसने मां की ओर देखा। अजय की ओर देखा। और उस अंधेरे की ओर भी जिसमें उसका बचपन अभी भी बैठा था।

उसने धीरे से कहा।

इस बार मैं भागूंगा नहीं।

फिर उसने कुएं की तरफ कदम बढ़ाया।

जंजीरें अपने आप खुल गईं।

अंधेरा ऊपर की तरफ उठा।

सुमित ने आखिरी बार पीछे देखा।

मां ने आंखें बंद कर ली थीं।

अजय खड़ा था।

और दोनों के पीछे घर की दीवारें सांस ले रही थीं।

फिर सुमित नीचे उतर गया।

वह कितना समय गिरता रहा। यह उसे याद नहीं। बस इतना याद है कि नीचे जाते जाते उसे बच्चों की हंसी सुनाई देना बंद हो गई। और उसकी जगह एक शांत आवाज आ गई।

जो बहुत पुरानी थी।

बहुत भूखी थी।

लेकिन अब पहली बार संतुष्ट लग रही थी।

सुबह रानीपुर में बारिश रुक गई।

तहसील दफ्तर के सामने एक जीप खड़ी थी।

खाली।

घर के आंगन में दरवाजा खुला था।

लेकिन भीतर कोई नहीं था।

गांव के लोग आए। फिर रुके। फिर चुपचाप लौट गए। कुछ ने कहा कि रात में पुराने घर से रोशनी निकली थी। कुछ ने कहा कि किसी ने मंदिर की घंटी बजाई थी। कुछ ने कहा कि दूर खेतों में एक आदमी चलता दिखा था। लेकिन कोई पक्का नहीं था।

तीन दिन बाद गांव के स्कूल के पीछे एक छोटा लड़का मिट्टी में खेलते समय एक लाल फाइल निकाल लाया।

उसने उसे खोला।

अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

उस पर कांपते अक्षरों में लिखा था।

दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ।

और उसके नीचे एक नया नाम उभर रहा था।

उस लड़के का।

कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।

क्योंकि कुछ दरवाजे बंद होकर भी खुले रहते हैं।

और कुछ घर बारिश में नहीं।

इंसान के लौटने से भी भीगते हैं।