दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड और कनॉट प्लेस की उस भीड़-भाड़ वाली शाम में अद्वैत अपनी कॉफी का कप पकड़े एक बेंच पर बैठा था। वह पेशे से एक आर्किटेक्ट था, जिसकी दुनिया नक्शों और पैमानों में सिमटी हुई थी, लेकिन उसका दिल हमेशा से ही कुछ अनकहा ढूंढता था। तभी उसकी नजर सामने वाले कैफे से निकलती एक लड़की पर पड़ी। उसने गहरे नीले रंग का ओवरकोट पहना था और उसके बिखरे हुए बाल हवा में उसकी आंखों के सामने आ रहे थे। वह लड़की, सारा, हाथ में एक डायरी दबाए हुए बहुत तेजी से सड़क पार करने की कोशिश कर रही थी कि अचानक उसका पैर फिसला और वह गिरते-गिरते बची। अद्वैत झटके से उठा और उसकी मदद के लिए लपका। सारा की डायरी जमीन पर गिर गई थी और उसके पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे।
"अरे! आप ठीक तो हैं?" अद्वैत ने उसका हाथ थामते हुए पूछा। सारा ने घबराहट में अपनी झुकी हुई पलकें उठाईं और अद्वैत की आंखों में झांका। उस पल जैसे समय थम गया। सारा ने जल्दी से अपना हाथ छुड़ाया और अपनी डायरी उठाने लगी। "जी, शुक्रिया। मैं बिल्कुल ठीक हूं। बस ये दिल्ली की सड़कें और मेरा ये ध्यान..." उसने झेंपते हुए कहा। अद्वैत मुस्कुराया और बोला, "ध्यान अक्सर वहां जाता है जहां उसे नहीं जाना चाहिए, या फिर वहां जहां उसे होना चाहिए। वैसे आपकी डायरी के पन्ने गवाही दे रहे हैं कि आप कुछ बहुत जरूरी लिख रही थीं।" सारा ने उसे एक तिरछी नजर से देखा और कहा, "शायद। वैसे भी, मदद के लिए दोबारा शुक्रिया।" वह मुड़ी और चली गई, लेकिन अद्वैत के पास उसकी डायरी का एक छोटा सा टुकड़ा रह गया था जो गिरने के दौरान फट गया था। उस पर बस एक लाइन लिखी थी— 'अधूरी कहानियाँ अक्सर सबसे खूबसूरत मोड़ पर रुकती हैं।'
अगले कुछ दिनों तक अद्वैत का मन उस नीले ओवरकोट वाली लड़की में ही अटका रहा। वह रोज़ उसी जगह आता, इसी उम्मीद में कि शायद वह फिर दिखे। और आखिरकार, एक हफ्ते बाद, वह उसे वहीं मिली, उसी कैफे के कोने वाली मेज पर। अद्वैत बिना सोचे-समझे उसके पास गया और बोला, "क्या अधूरी कहानियों को पूरा करने का इरादा है आपका?" सारा ने उसे पहचाना और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। "आप फिर से? और आपको कैसे पता कि मेरी कहानी अधूरी है?" अद्वैत ने वह कागज़ का टुकड़ा उसकी मेज पर रखा। "क्योंकि आपने खुद लिखा था। वैसे मेरा नाम अद्वैत है।" सारा ने उसे बैठने का इशारा किया और बोली, "मैं सारा हूं। एक फ्रीलांस लेखिका, जो अपनी ही कहानी का अंत नहीं ढूंढ पा रही।"
अद्वैत ने हंसते हुए कहा, "अंत की चिंता क्यों करना? सफर का मजा लीजिए। वैसे, अगर आप बुरा न मानें, तो क्या हम इस शहर को एक नए नजरिए से देख सकते हैं? शायद आपको अपनी कहानी का अंत मिल जाए।" सारा को उसकी बेबाकी पसंद आई। अगले कुछ घंटों तक वे दिल्ली की गलियों में घूमते रहे।
चांदनी चौक की तंग गलियों से लेकर हुमायूं के मकबरे की शांति तक, उन्होंने हर जगह बातें कीं। उनके साथ अद्वैत के दो दोस्त, कबीर और रिया भी जुड़ गए, और सारा की सहेली तान्या भी। पाँचों का यह ग्रुप लोधी गार्डन की घास पर बैठा था। कबीर, जो हमेशा मजाक के मूड में रहता था, बोला, "भाई अद्वैत, तू तो नक्शे बनाता था, ये सारा के ख्यालों के नक्शे कब से बनाने लगा?" रिया ने उसे टोकते हुए कहा, "चुप कर कबीर! देख नहीं रहा, दो कलाकार मिल रहे हैं। साला, तू तो बस कबाब रोल के सपने देख।"
तान्या ने सारा की ओर देख कर शरारत से पूछा, "सारा, तेरी डायरी में आज कुछ नया जुड़ा क्या?" सारा ने शरमाते हुए सिर झुका लिया। उसके मन में एक अजीब सी हलचल थी। वह हमेशा से अकेले रहना पसंद करती थी, लेकिन अद्वैत के साथ उसे एक अलग ही सुकून महसूस हो रहा था। अद्वैत का बात करने का तरीका, उसकी हंसी और उसका वह बार-बार सारा के बालों को कान के पीछे करने का इशारा— सब कुछ सारा के दिल में घर कर रहा था। शाम ढल रही थी और आसमान में गुलाबी रंग की परतें बिछ गई थीं। अद्वैत ने सारा की ओर देख कर धीमे से कहा, "पता है सारा, कभी-कभी हम शब्दों में वो नहीं कह पाते जो एक खामोश निगाह कह जाती है।"
सारा ने लंबी सांस ली और बोला, "अद्वैत, मुझे डर लगता है। कहानियाँ जब खूबसूरत होने लगती हैं, तो अक्सर उनके खत्म होने का डर बढ़ जाता है।" अद्वैत ने उसका हाथ थाम लिया। उसके हाथों की गर्माहट सारा की धड़कनों तक पहुंच रही थी। "तो फिर उसे खत्म मत होने दो। उसे एक नई शुरुआत का नाम दे दो।" उस रात घर लौटते समय सारा की डायरी में एक नया पन्ना जुड़ा, लेकिन उस पर कोई डर नहीं, बल्कि एक उम्मीद लिखी थी। अगले कुछ हफ्ते उनके बीच मुलाकातों का सिलसिला और गहरा हो गया। वे कभी पहाड़ों की सैर पर निकल जाते, तो कभी आधी रात को इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाते। एक रात, जब वे ऋषिकेश की गंगा आरती देख रहे थे, सारा अचानक खामोश हो गई।
"क्या हुआ सारा? तुम अचानक इतनी चुप क्यों हो गई?" अद्वैत ने चिंता से पूछा। सारा की आंखों में आंसू थे। "अद्वैत, मुझे लंदन से एक बहुत बड़े पब्लिशिंग हाउस का ऑफर आया है। वे चाहते हैं कि मैं वहां जाकर अपनी किताब पूरी करूं और उनके साथ काम करूं। लेकिन..." अद्वैत का दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना भूल गया। उसने अपनी भावनाओं को छुपाते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, "ये तो बहुत अच्छी खबर है सारा! तुम्हारा सपना पूरा होने वाला है। तुम्हें जाना चाहिए।" सारा ने उसका कॉलर पकड़कर अपनी तरफ खींचा और गुस्से में बोली, "बस? तुम्हें बस यही कहना है? कि मुझे जाना चाहिए? क्या तुम्हें रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमसे दूर चली जाऊंगी?"
अद्वैत की आंखों में अब बेबसी साफ दिख रही थी। "फर्क पड़ता है सारा, बहुत फर्क पड़ता है। इतना कि शायद मैं सांस लेना भी भूल जाऊं। लेकिन मैं तुम्हारे सपनों के बीच में नहीं आना चाहता। मैं नहीं चाहता कि कल को तुम अपनी अधूरी कहानी के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराओ।" सारा फूट-फूट कर रोने लगी।
"बेवकूफ हो तुम! मेरी कहानी अब तुम्हारे बिना पूरी ही नहीं हो सकती। ये किताब, ये करियर, ये सब कुछ अधूरा है अगर तुम मेरे साथ नहीं हो।" अद्वैत ने उसे अपने गले से लगा लिया। उस समय पहाड़ों की ठंडी हवा और गंगा की लहरों का शोर जैसे उनकी गवाही दे रहा था। कबीर और रिया दूर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। कबीर ने हल्की आवाज में कहा, "यार रिया, ये प्यार भी कितनी अजीब चीज है ना? रुलाता भी है और फिर यही आंसू मरहम भी बन जाते हैं।" रिया ने उसका हाथ दबाते हुए कहा, "कम से कम ये दोनों अपनी बात तो कह पाए, वरना आधे लोग तो बस खामोशी में ही जिंदगी गुजार देते हैं।"
अगले कुछ दिन बहुत भारी थे। सारा के जाने की तारीख नजदीक आ रही थी। तान्या ने एक विदाई पार्टी रखी थी। सब हंस रहे थे, मजाक कर रहे थे, लेकिन अद्वैत और सारा की निगाहें एक-दूसरे को ढूंढ रही थीं। पार्टी के बीच में अद्वैत सारा को छत पर ले गया। वहां चांदनी बिखरी हुई थी। अद्वैत ने अपनी जेब से एक छोटी सी अंगूठी निकाली। "मैं नहीं जानता कि कल क्या होगा, सारा। मैं नहीं जानता कि ये फासले हमें कहां ले जाएंगे। लेकिन मैं ये जानता हूं कि मेरी हर सुबह और हर शाम अब सिर्फ तुम्हारी यादों से जुड़ी है। क्या तुम इस कहानी का हिस्सा हमेशा के लिए बनना चाहोगी?" सारा की आंखों में चमक आ गई। उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। "अद्वैत, ये कहानी सिर्फ तुम्हारी या मेरी नहीं है, ये हमारी है। और 'हमारी' कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं।"
सारा लंदन चली गई, लेकिन फासलों ने उनके प्यार को कम नहीं किया। हर रात घंटों वीडियो कॉल, लंबी चिट्ठियां और एक-दूसरे के प्रति वह अटूट विश्वास। अद्वैत ने दिल्ली में अपने प्रोजेक्ट्स के बीच सारा के लिए एक छोटा सा घर डिजाइन करना शुरू कर दिया था, जिसकी बालकनी से डूबता हुआ सूरज वैसा ही दिखता था जैसा उन्होंने लोधी गार्डन में देखा था। सारा की किताब पब्लिश हुई और वह रातों-रात एक मशहूर लेखिका बन गई। उसकी किताब का टाइटल था— 'कहानी तेरी मेरी'। किताब के लॉन्च के मौके पर उसने अद्वैत को लंदन बुलाया। हजारों की भीड़ के सामने, स्टेज पर खड़ी सारा ने माइक थामा और कहा, "ये किताब उन शब्दों के बारे में नहीं है जो मैंने लिखे हैं, बल्कि उस इंसान के बारे में है जिसने मुझे शब्द दिए। अद्वैत, अगर तुम उस दिन कनॉट प्लेस में मेरी डायरी नहीं उठाते, तो शायद ये कहानी कभी शुरू ही नहीं होती।"
अद्वैत भीड़ में खड़ा होकर बस मुस्कुरा रहा था। उसकी आंखों में गर्व और बेइंतहा प्यार था। तभी अचानक सारा ने स्टेज से नीचे उतरकर अद्वैत का हाथ पकड़ा और उसे ऊपर ले आई। "अब वक्त है इस कहानी के अगले अध्याय का।" उसने सबके सामने अद्वैत को गले लगा लिया। वहां मौजूद हर शख्स की आंखों में नमी थी। वापस दिल्ली लौटते समय फ्लाइट में सारा अद्वैत के कंधे पर सिर रखकर सो रही थी। अद्वैत ने धीरे से उसके माथे को चूमा और सोचा कि नक्शे बनाना तो आसान है, लेकिन दिल के रास्तों पर चलना सबसे बड़ा रोमांच है।
दिल्ली एयरपोर्ट पर कबीर, रिया और तान्या उनका इंतजार कर रहे थे। कबीर ने बड़े-बड़े गुब्बारे पकड़ रखे थे जिन पर लिखा था 'स्वागत है, मिसेज लेखिका!' रिया ने सारा को गले लगाया और कहा, "अब हमें छोड़कर कहीं मत जाना, वरना अद्वैत फिर से देवदास बन जाएगा।" सारा हंसी और बोली, "अब तो ये चाहकर भी मुझे नहीं भेज पाएगा।" वे सब कार में बैठकर शहर की ओर निकले। दिल्ली की सड़कें वही थीं, वही भीड़, वही शोर, लेकिन अद्वैत और सारा के लिए सब कुछ बदल चुका था। उन्हें समझ आ गया था कि प्यार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को बढ़ने की आजादी देने और फिर वापस उसी एक इंसान के पास लौट आने का नाम है।
शाम को वे फिर उसी कैफे में बैठे थे जहां वे पहली बार मिले थे। वेटर ने वही पुरानी कॉफी लाकर मेज पर रखी। अद्वैत ने सारा की डायरी उठाई और उसके आखिरी पन्ने पर कुछ लिखा। सारा ने उत्सुकता से पूछा, "क्या लिखा तुमने?" अद्वैत ने डायरी सारा की ओर बढ़ा दी। वहां लिखा था— 'कहानी अभी बाकी है...' सारा ने मुस्कुराते हुए अद्वैत का हाथ थामा और खिड़की से बाहर गिरती बारिश की बूंदों को देखने लगी। उनके मन में अब कोई डर नहीं था, कोई बेचैनी नहीं थी। बस एक सुकून था कि चाहे रास्ते कितने भी कठिन क्यों न हों, उनकी मंजिल हमेशा एक-दूसरे के दिल में ही होगी।
तभी कबीर का फोन बजा। "अरे ओ मजनू! नीचे आओ जल्दी, तान्या ने पार्टी रखी है और अगर तुम लोग 5 मिनट में नहीं आए, तो सारा खाना मैं अकेले खा जाऊंगा।" अद्वैत और सारा एक-दूसरे को देखकर जोर से हंस पड़े। उनकी हंसी में वो खनक थी जो सिर्फ उन लोगों के पास होती है जिन्होंने अपनी मोहब्बत को मुकम्मल किया हो। वे कैफे से बाहर निकले और दौड़ते हुए अपनी गाड़ी की तरफ बढ़े। रात की रोशनी में दिल्ली जगमगा रही थी, और उस रोशनी में अद्वैत और सारा का साया एक होता हुआ दिखाई दे रहा था। यह एक अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी कहानी का आगाज़ था जिसे वक्त भी कभी धुंधला नहीं कर पाएगा।
अद्वैत ने गाड़ी चलाते हुए सारा की तरफ देखा, जो बाहर के नजारों को बड़े चाव से देख रही थी। उसने महसूस किया कि प्यार कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप ढूंढते हैं, बल्कि प्यार वो है जो आपको तब मिलता है जब आप उसे ढूंढना छोड़ देते हैं। सारा ने अपनी डायरी बंद की और अद्वैत के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। "पता है अद्वैत, लंदन में हर पल मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरा कोई हिस्सा यहीं दिल्ली में छूट गया है।" अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा, "वो हिस्सा नहीं सारा, वो मेरी धड़कन थी जो तुम्हारे पास थी।" सारा ने उसे एक प्यार भरी चपत लगाई और बोली, "इतने फिल्मी डायलॉग मारना कब से सीख लिया?" अद्वैत हंस पड़ा, "जब से एक लेखिका से प्यार हुआ है।"
उनकी गाड़ी अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी, और पीछे छूट रही थी वो सारी यादें जिन्होंने उन्हें यहाँ तक पहुँचाया था। अब उनके सामने एक पूरी ज़िंदगी पड़ी थी, जिसमें नए रंग भरने थे, नई यादें बनानी थीं और एक ऐसी 'कहानी तेरी मेरी' लिखनी थी जो हमेशा के लिए अमर हो जाए। रास्ते के मोड़ पर अद्वैत ने गाड़ी की रफ्तार धीमी की और सारा की आँखों में देखते हुए कहा, "तैयार हो अगले मोड़ के लिए?" सारा ने बस अपनी आँखें मूंद लीं और धीमे से सिर हिलाया। उसे पता था कि जब तक अद्वैत का साथ है, हर मोड़ सिर्फ खुशियाँ ही लाएगा। इस तरह उनकी अधूरी कहानी ने एक ऐसी मुकम्मल शक्ल ले ली थी जिसकी मिसाल उनके दोस्त आज भी दिया करते थे। और उस रात, दिल्ली के आसमान के नीचे, दो रूहें फिर से एक नए सफर पर निकल पड़ी थीं, जहाँ सिर्फ प्यार की भाषा बोली जाती थी।