Kanyadaan in Hindi Short Stories by Jeetendra books and stories PDF | कन्यादान

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कन्यादान

दिल्ली की एक छोटी सी कॉलोनी में, जनवरी का महीना था। ठंडी हवा चल रही थी, और घरों में हीटर चल रहे थे। शर्मा जी का घर हमेशा की तरह हलचल भरा था। उनकी बेटी नेहा की शादी की बात चल रही थी। नेहा 28 साल की थी, एक अच्छी एमएनसी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर। घर में वो सबसे छोटी थी, लेकिन सबसे समझदार।

शर्मा जी रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे। उनकी पत्नी रीता जी स्कूल टीचर रही थीं, अब घर संभालती थीं। बड़ा बेटा राहुल मुंबई में सेटल था, अपनी फैमिली के साथ। अब घर में सिर्फ नेहा की शादी की चर्चा होती थी।

एक शाम, डिनर टेबल पर सब बैठे थे। नेहा फोन पर कुछ देख रही थी, रीता जी सब्जी परोस रही थीं, और शर्मा जी अखबार पढ़ते हुए बोले, "नेहा, वो रोहित का प्रोपोजल आया है ना? लड़के वाले कल आने वाले हैं। अच्छा परिवार है, लड़का आईटी में है, बैंगलोर में जॉब। सैलरी भी अच्छी।"

नेहा ने फोन साइड रखा और मुस्कुरा कर बोली, "पापा, मैंने कहा ना, मैं खुद देख लूंगी। अरेंज्ड मैरिज ठीक है, लेकिन जल्दबाजी क्यों? मैं रोहित से बात कर रही हूं ऑनलाइन, अच्छा लग रहा है। लेकिन अभी फैसला नहीं किया।"

रीता जी ने प्लेट रखते हुए कहा, "बेटा, उम्र हो रही है। 28 हो गई तू। समाज क्या कहेगा? लड़कियां जल्दी सेटल हो जाती हैं। और रोहित अच्छा लड़का है, फैमिली भी ट्रेडिशनल है। हमने पूछा था, दहेज की कोई डिमांड नहीं।"

नेहा हंस पड़ी। "मम्मी, दहेज? आजकल कौन मांगता है खुलकर? लेकिन ट्रेडिशनल फैमिली मतलब क्या? कन्यादान करेंगे, विदाई में रोएंगे, और मैं ससुराल की बहू बनकर सब सहूंगी?"

शर्मा जी ने अखबार नीचे रखा और गंभीर होकर बोले, "नेहा, ये सब रस्में हैं। हमारी संस्कृति का हिस्सा। कन्यादान तो सबसे पवित्र रसम है। पिता अपनी बेटी का दान करता है, जैसे सबसे बड़ा पुण्य। मैंने तेरी मां का भी कन्यादान किया था।"

नेहा की आंखें सिकुड़ गईं। वो चुप हो गई एक पल के लिए, फिर बोली, "पापा, दान? मतलब मैं कोई चीज हूं जो दान की जा रही है? जैसे कोई सामान ट्रांसफर हो रहा हो? आजकल ये रसम क्यों? मैं तो खुद अपनी जिंदगी चुन रही हूं। रोहित से शादी करूंगी तो पार्टनरशिप में, ना कि कोई दान लेने-देने में।"

रीता जी चौंक गईं। "अरे नेहा, ऐसा मत बोल। ये तो भावनात्मक है। पापा तेरे लिए कितना कुछ करते हैं, और शादी में वो तुझे groom के हाथ में सौंपते हैं, मतलब जिम्मेदारी ट्रांसफर।"

"ट्रांसफर?" नेहा ने आवाज ऊंची कर दी। "मम्मी, यही तो प्रॉब्लम है। मैं कोई प्रॉपर्टी नहीं हूं। मैं इंसान हूं। क्यों सिर्फ लड़की की जिम्मेदारी ट्रांसफर होती है? लड़के की क्यों नहीं? पुत्रदान क्यों नहीं होता?"

शर्मा जी खांसते हुए बोले, "बेटा, पुरानी बातें हैं। शास्त्रों में लिखा है। कन्यादान से पिता को मोक्ष मिलता है।"

नेहा ने सिर हिला दिया। "पापा, मोक्ष के लिए मुझे दान करना पड़ेगा? अगर मैं शादी ना करूं तो क्या आपको मोक्ष नहीं मिलेगा? और वैसे भी, आजकल कोर्ट ने कहा है ना, कन्यादान जरूरी नहीं शादी के लिए। सिर्फ सप्तपदी और मंत्र suficiente हैं।"

घर में सन्नाटा छा गया। रीता जी ने नेहा को इशारा किया चुप होने को, लेकिन नेहा रुकने वाली नहीं थी। वो उठी और अपने कमरे में चली गई।

अगले दिन सुबह, नेहा ऑफिस जाने से पहले कॉफी पी रही थी। रीता जी किचन में थीं। शर्मा जी सोफे पर बैठे टीवी देख रहे थे। नेहा ने बोला, "मम्मी, पापा से बात करो ना। अगर रोहित वाले आ रहे हैं, तो मैं उनसे क्लियर कह दूंगी। शादी करूंगी तो अपनी शर्तों पर। कोई कन्यादान नहीं, कोई विदाई में रोना-धोना नहीं। हम दोनों फैमिली साथ रहेंगी।"

रीता जी ने सिर पकड़ लिया। "नेहा, तू ये क्या बातें कर रही है? रोहित की फैमिली ट्रेडिशनल है। वो मानेगी नहीं। और पापा का दिल दुखेगा। वो तो सपने देख रहे हैं कि अपनी बेटी का कन्यादान करेंगे।"

"मम्मी, पापा का सपना क्यों मेरी जिंदगी पर भारी? मैंने इतना पढ़ा, जॉब की, खुद कमाती हूं। फिर क्यों मुझे दान की तरह ट्रीट किया जाए?"

दोपहर में रोहित के घर से कॉल आया। रोहित की मां ने रीता जी से बात की। "बहन जी, हम कल आ रहे हैं। लड़की देखने। और हां, शादी सिंपल रखें, लेकिन रस्में पूरी। कन्यादान तो जरूरी है ना?"

रीता जी ने हामी भरी, लेकिन मन में घबराहट थी। शाम को नेहा घर आई तो रीता जी ने बताया। नेहा बोली, "ठीक है, मिल लें। लेकिन मैं क्लियर कर दूंगी।"

अगला दिन आया। रोहित की फैमिली आई। रोहित अच्छा लग रहा था, स्मार्ट, कॉन्फिडेंट। उसकी मां-बाप, चाचा-चाची सब आए। लिविंग रूम में सब बैठे। चाय-नाश्ता हुआ। बातें हुईं।

रोहित की मां बोलीं, "नेहा बेटा, तुम बहुत अच्छी लग रही हो। रोहित ने तुम्हारी फोटो देखी थी, बहुत पसंद आई। हमारी फैमिली में बहू को बहुत इज्जत मिलती है।"

नेहा मुस्कुराई। "थैंक यू आंटी। रोहित से बात करके अच्छा लगा। वो प्रोग्रेसिव लगते हैं।"

रोहित ने बोला, "हां नेहा, मैं तो मानता हूं कि शादी इक्वल पार्टनरशिप है। दोनों काम करें, दोनों घर संभालें।"

शर्मा जी खुश हुए। "बहुत अच्छा। हम भी यही चाहते हैं।"

बात आगे बढ़ी। रोहित के पापा बोले, "शादी की डेट फिक्स करें? मई में अच्छा मुहूर्त है। और रस्में ट्रेडिशनल रखें। कन्यादान, मंगलसूत्र, सब।"

नेहा ने चुपचाप सुना, फिर बोली, "अंकल, एक बात कहूं? मैं कन्यादान नहीं चाहती। ये रसम मुझे पसंद नहीं। लगता है पुरानी सोच है। मैं खुद रोहित के साथ जाना चाहती हूं, ना कि दान में दी जाऊं।"

कमरे में सन्नाटा हो गया। रोहित की मां चौंक गईं। "क्या? कन्यादान नहीं? ये तो सबसे इंपॉर्टेंट रसम है। बिना इसके शादी पूरी कैसे?"

रोहित के पापा ने कहा, "बेटा, ये हमारी परंपरा है। ऐसा कैसे छोड़ दें?"

रोहित ने नेहा की तरफ देखा। "नेहा, तुम्हें प्रॉब्लम क्यों है? ये तो सिर्फ सिम्बॉलिक है।"

नेहा ने शांत स्वर में कहा, "रोहित, सिम्बॉलिक ही तो प्रॉब्लम है। ये सिम्बॉल बताता है कि लड़की पैरेंट्स की प्रॉपर्टी है, जो groom को दी जाती है। मैं इक्वल हूं। हम दोनों एक-दूसरे चुन रहे हैं। तो क्यों सिर्फ मैं दान होऊं?"

रोहित की मां नाराज हो गईं। "ये क्या फेमिनिज्म है? आजकल की लड़कियां सब तोड़ना चाहती हैं। हमारी बहू ऐसी नहीं होनी चाहिए।"

शर्मा जी ने बीच में बोला, "अरे नहीं नहीं, नेहा अभी समझ जाएगी। हम बात करेंगे।"

लेकिन नेहा रुकी नहीं। "पापा, आप क्यों माफी मांग रहे हो? मैंने कुछ गलत नहीं कहा। अगर रोहित को प्रॉब्लम नहीं तो फैमिली क्यों?"

रोहित चुप था। वो बोला, "मॉम, नेहा की बात में दम है। आजकल कई कपल्स मॉडर्न तरीके से शादी करते हैं। हम विदा नहीं करेंगे, दोनों फैमिली साथ पार्टी करेंगे।"

उसकी मां भड़क गईं। "तू चुप कर! हम ट्रेडिशनल घर से हैं। कन्यादान नहीं तो शादी नहीं।"

मीटिंग खत्म हुई ठंडे माहौल में। रोहित की फैमिली चली गई। घर में तूफान आ गया।

शर्मा जी गुस्से में नेहा पर चिल्लाए। "तूने सब बिगाड़ दिया! अच्छा रिश्ता था। अब क्या होगा?"

रीता जी रोने लगीं। "बेटा, तू इतनी जिद क्यों करती है? थोड़ा समझौता कर लेती।"

नेहा की आंखें भर आईं, लेकिन वो बोली, "मम्मी, समझौता क्यों सिर्फ मुझे करना पड़े? मैं अपनी शादी अपनी शर्तों पर करूंगी। अगर रोहित मुझे सच में चाहता है, तो वापस आएगा।"

रात भर घर में चर्चा होती रही। नेहा अपने कमरे में थी, फोन पर दोस्त से बात कर रही थी। "यार, सही कहा ना मैंने? कन्यादान क्यों? लगता है जैसे बेटी बोझ है, जो दान करके छुटकारा पा रहे हैं।"

दोस्त ने कहा, "बिल्कुल सही। आजकल कई लोग स्किप करते हैं। तू स्ट्रॉंग है।"

कई दिन बीत गए। रोहित से कोई कॉन्टैक्ट नहीं। नेहा उदास थी, लेकिन जिद पर अड़ी थी। एक दिन रोहित का मैसेज आया। "नेहा, सॉरी। फैमिली को मनाने की कोशिश की, लेकिन नहीं माने। वो कहते हैं ट्रेडिशन ब्रेक नहीं कर सकते।"

नेहा ने रिप्लाई किया, "कोई नहीं रोहित। अगर तुम भी नहीं मना सके, तो शायद हम मैच नहीं।"

शर्मा जी को लगा सब खत्म। वो नेहा से बोले, "बेटा, अब क्या? नया रिश्ता देखें?"

नेहा बोली, "पापा, देखें। लेकिन इस बार क्लियर कह देंगे शुरू में। कोई कन्यादान नहीं।"

फिर महीनों बाद एक नया प्रोपोजल आया। लड़का था विक्रम, दिल्ली में ही। दोनों मिले, बातें हुईं। विक्रम प्रोग्रेसिव था। उसने कहा, "नेहा, मैंने तेरी कन्यादान वाली बात सुनी फैमिली से। मुझे कोई इश्यू नहीं। हम शादी करेंगे तो इक्वल तरीके से। दोनों पैरेंट्स साथ बैठेंगे, आशीर्वाद देंगे। कोई दान नहीं।"

नेहा खुश हो गई। विक्रम की फैमिली भी मान गई, हालांकि थोड़ी हिचकिचाहट के बाद।

शादी की तैयारी शुरू हुई। शर्मा जी मन ही मन उदास थे। वो रीता जी से बोले, "रीता, मैं क्या करूं? कन्यादान नहीं कर पाऊंगा। सपना था कि अपनी बेटी का हाथ groom को दूं।"

रीता जी ने कहा, "जी, नेहा खुश है ना? आजकल टाइम बदल गया। हम भी बदलें।"

शादी का दिन आया। मंडप में सब बैठे। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। कन्यादान की बारी आई तो नेहा और विक्रम ने दोनों पैरेंट्स को बुलाया। शर्मा जी और विक्रम के पापा साथ बैठे। नेहा का हाथ विक्रम के हाथ में रखा गया, लेकिन पंडित जी ने नया मंत्र पढ़ा – आशीर्वाद का। कोई दान शब्द नहीं।

शर्मा जी की आंखें भर आईं, लेकिन मुस्कुरा रहे थे। नेहा ने पापा को देखा और बोली, "पापा, थैंक यू। आपने मुझे दान नहीं किया, बल्कि आजादी दी।"

शादी खत्म हुई। विदाई नहीं हुई, बल्कि दोनों फैमिली साथ डिनर किया। नेहा नई जिंदगी शुरू करने जा रही थी, लेकिन अपनी शर्तों पर।

घर लौटकर शर्मा जी ने रीता जी से कहा, "तू सही कहती थी। नेहा ने सही किया। पुरानी रस्में बदलनी चाहिए। अब लगता है, असली कन्यादान तो बेटी को मजबूत बनाना है, ना कि दान करना।"

और इस तरह, एक परिवार ने ट्रेडिशन को मॉडर्न तरीके से अपनाया। नेहा खुश थी, विक्रम के साथ। जिंदगी आगे बढ़ रही थी, बिना किसी बोझ के।