Episode 2: सौदे की सुबह
रात खत्म हुई…पर उस घर में अंधेरा अभी भी बाकी था।आँगन में ठंडी हवा चल रही थी,लेकिन भीतर—हर साँस भारी थी।
गुणवती की आँखें पूरी रात नहीं लगीं।वो बस अपनी बेटी को देखती रही…जैसे हर पल उसे याद कर लेना चाहती हो।कोने में बैठे प्रताप सिंह चुप थे।इतने चुप कि जैसे आवाज़ देना भी भूल गए हों।
और भार्गवी…वो खिड़की के पास खड़ी थी।आसमान में हल्की रोशनी फैल रही थी—एक नई सुबह का इशारा।लेकिन उसके लिए…ये कोई नई शुरुआत नहीं थी।ये एक फैसले की सुबह थी।
“दीदी…”नक्षत्रा की नींद भरी आवाज़ आई।भार्गवी ने मुड़कर उसे देखा।वो भागकर उसके पास आई और कसकर गले लग गई।“तू कहीं मत जाना…”उसकी आवाज़ काँप रही थी।एक पल के लिए—भार्गवी की आँखें बंद हो गईं।उसने उसे कसकर पकड़ा।लेकिन फिर…धीरे-धीरे उसे खुद से अलग कर दिया।
“मैं कहीं नहीं जा रही…”उसने कहा।पर इस बार…उसकी आवाज़ में सच्चाई नहीं थी।कुछ देर बाद—घर के बाहर शोर बढ़ने लगा।ढोल की हल्की आवाज़…घोड़ों की टाप…और लोगों की फुसफुसाहट।“बारात आ गई…”किसी ने धीरे से कहा।
गुणवती का दिल जैसे रुक गया।दरवाज़े के बाहर पूरा गाँव इकट्ठा था।हर कोई देखने आया था—एक और सौदा पूरा होते हुए।आँगन में जल्दी-जल्दी तैयारी होने लगी।लाल जोड़ा लाया गया।गहने सजाए गए।गुणवती के हाथ काँप रहे थे जब वो अपनी बेटी को सजा रही थी।“माफ कर देना…”उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े।
भार्गवी ने कुछ नहीं कहा।बस आईने में खुद को देखती रही।लाल जोड़े में सजी वो लड़की—दुल्हन लग रही थी।लेकिन उसकी आँखों में…ना खुशी थी, ना डर।बस एक अजीब-सी शांति।जैसे उसने सब कुछ स्वीकार कर लिया हो।बाहर—मिहिर राठौड़ घोड़ी से उतर चुका था।काले शेरवानी में सजा हुआ,चेहरा ठंडा…और आँखें बिल्कुल खाली।वो भी इस शादी में खुश नहीं था।ये साफ दिख रहा था।
विवान उसके पास खड़ा मुस्कुरा रहा था।“भाई… आज तो मज़ा आ जाएगा,”उसने धीरे से कहा।मिहिर ने उसे घूरा—“ये मज़ाक नहीं है।”विवान हँस पड़ा—“हमारे लिए सब मज़ाक ही है।”मंडप सज चुका था।आग जलाई गई।और फिर—भार्गवी को लाया गया।
हर कदम के साथ…जैसे उसका अतीत पीछे छूटता जा रहा था।उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।मंडप में बैठते ही—उसकी नज़र पहली बार मिहिर से मिली।दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।वो नज़र…सिर्फ़ पहचान नहीं थी।जैसे दोनों एक-दूसरे को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों।“शुरू करें,”पंडित की आवाज़ आई।मंत्र गूंजने लगे।हर फेरा…हर वचन…एक बंधन नहीं—एक सौदे को पूरा कर रहा था।गुणवती दूर खड़ी रो रही थी।प्रताप सिंह जमीन पर नजरें गड़ाए बैठे थे।नक्षत्रा चुप थी—जैसे वो समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या हो रहा है।फेरे खत्म हुए।मंगलसूत्र पहना दिया गया।सिंदूर भर दिया गया।और उसी पल—एक रिश्ता बन गया।या शायद…एक कैद।शादी के बाद—सबकी नजरों के बीचभार्गवी खामोश खड़ी रही।
विवान उसके पास आया।“अब तुम राठौड़ खानदान की बहू हो,”उसने मुस्कुराते हुए कहा।“अपनी औकात मत भूलना।”भार्गवी ने उसकी तरफ देखा।पहली बार—उसकी आँखों में हल्की-सी चमक आई।
डर नहीं…कुछ और।लेकिन अगले ही पल—वो फिर शांत हो गई।गाड़ी के पास—मिहिर खड़ा था।भार्गवी उसके पास आई।कुछ पल दोनों खामोश रहे।फिर मिहिर ने धीरे से कहा—“ये शादी… मेरी मर्ज़ी से नहीं हुई है।”भार्गवी ने उसकी तरफ देखा।“मेरी भी नहीं,”उसने उतने ही शांत स्वर में जवाब दिया।
दोनों के बीच एक अजीब-सी खामोशी फैल गई।जैसे…दो अजनबी एक ही कैद में बंद हो गए हों।
गाड़ी चल पड़ी।घर…गाँव…सब पीछे छूट गया।भार्गवी खिड़की से बाहर देखती रही।
उसकी आँखों में अब भी वही सन्नाटा था।लेकिन—उस सन्नाटे के पीछे…कुछ और भी था।कुछ… जो अभी सामने नहीं आया था।
🔥 End Hookक्या भार्गवी सच में इस शादी की कैदी है…या वो खुद इस खेल की सबसे बड़ी खिलाड़ी है?
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