भूतिया कहानी: “शापित हवेली”
पटना से लगभग 40 किलोमीटर दूर बरौनी नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा था। यह गाँव हरे-भरे खेतों और नदी के किनारे तो था ही, लेकिन इसके बाहर एक पुरानी हवेली खंडहर की शक्ल ले चुकी थी। हवेली की दीवारें काली पड़ गई थीं, जंग लगे द्वार टूटे पड़े थे, और रात के सन्नाटे में वहाँ से अजीबो-गरीब आवाज़ें आतीं—जैसे किसी की सिसकियाँ, साँपों की फुफकार या टूटते कांच की खनक। गाँव वाले डरते थे। वे कहते, “जिसने भी उस हवेली में कदम रखा, वह कभी पहले जैसा नहीं रहा। कोई पागल हो गया, कोई गायब हो गया, और कुछ की लाशें तो कभी मिली ही नहीं।” यह हवेली नागवंश के राजाओं की पुरानी जागीर थी, जहाँ सदियों पुराना एक श्राप छिपा था। रात को दीये अपने आप जल उठते, खिड़कियों से काली परछाइयाँ झाँकतीं, और हवा में सड़े हुए फूलों की दुर्गंध फैल जाती। कोई साहसी वहाँ जाने की हिम्मत न करता। लेकिन एक दिन, एक युवा लेखक का आगमन हुआ, जिसका भूतहा कहानियों से गहरा लगाव था।
पहला भाग
रवि एक 28 साल का युवा लेखक था, जो दिल्ली से पटना आया था। पटना में उसके पुराने दोस्त शंकर से मिलने बरौनी गाँव पहुँचा। शंकर ने उसे हवेली की कहानी सुनाई तो रवि के कानों में जैसे बिजली कौंध गई। “भाई, तू मत जाना वहाँ। बुज़ुर्ग कहते हैं, नागवंश का श्राप है। रात को दीये जलते हैं, साँपों की आकृतियाँ जीवित हो उठती हैं, और परछाइयाँ इंसानों को निगल लेती हैं। एक बार एक व्यापारी गया था, सुबह उसकी सिर्फ परछाई दीवार पर मिली।”
रवि हँस पड़ा। “अरे यार, ये सब अंधविश्वास है। मैं एक हॉरर बुक लिख रहा हूँ। ये परफेक्ट मटेरियल है। आज रात जाऊँगा, टॉर्च, कैमरा और नोटबुक लेकर। कुछ नहीं होगा।” शंकर ने बहुत मनाया, लेकिन रवि का जिद्दी स्वभाव था। गाँव के बुज़ुर्गों ने भी चेतावनी दी—“बेटा, मत जा। वहाँ आत्माएँ भटकती हैं। हर पीढ़ी में एक जान उसकी भेंट चढ़ती है।” रवि ने सिर हिलाया, लेकिन मन ही मन उत्साहित था।
उस रात चाँद की हल्की रोशनी में वह हवेली पहुँचा। हवा ठंडी थी, जैसे कोई साँस ले रहा हो। टूटा दरवाज़ा धीरे से खुल गया, मानो आमंत्रित कर रहा हो। अंदर कदम रखते ही हवा भारी हो गई—सांस लेना मुश्किल। दीवारों पर पुराने चित्र लटके थे: नागराजा, देवियाँ, और योद्धा। अंधेरे में उनकी आँखें चमक रही थीं, जैसे जीवित हों। रवि ने नोटबुक खोली और लिखा—“हवेली का वातावरण दमघोंटू। चित्रों में हलचल?” अचानक एक ठंडी हवा का झोंका आया, और कहीं दूर से सिसकी सुनाई दी। रवि का दिल धक्-धक् करने लगा, लेकिन वह आगे बढ़ा।
दूसरा भाग
हवेली के बीचोंबीच एक विशाल हॉल था। उसके मध्य में एक पुरानी झूला-कुर्सी टूटी पड़ी थी, जो हवा न चलने पर भी हिल रही थी—क्र्रीक... क्र्रीक...। रवि ने टॉर्च की रोशनी डाली। कुर्सी पर खून के धब्बे थे, पुराने लेकिन चमकदार। उसने नोटबुक में लिखा—“अलौकिक हलचल। झूला बिना वजह हिल रहा।”
अचानक पीठ के पीछे साँसों की गर्माहट महसूस हुई। रवि ने झटके से मुड़ा। सामने एक औरत खड़ी थी—सफेद साड़ी में लिपटी, चेहरा पीला, आँखें खून से लाल, और त्वचा पर गहरी दरारें जैसे मिट्टी फट गई हो। उसके बाल हवा में लहरा रहे थे, बिना हवा के। “क्यों आए हो यहाँ?” उसकी आवाज़ गूँजी, जैसे कई गले एक साथ बोल रहे हों।
रवि के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। टॉर्च काँप रही थी। साहस जुटाकर बोला—“मैं... मैं रवि हूँ। लेखक। तुम्हारी कहानी लिखना चाहता हूँ। ये सब क्या है?” औरत मुस्कुराई, दांत नुकीले चमके। “कहानी? हा हा... कहानी लिखोगे तो तेरी जान हवेली की भेंट चढ़ेगी। ये नागवंश की हवेली है। 1857 में राजा विक्रम ने अमरत्व के लिए तांत्रिक अनुष्ठान किया। नागदेवी को बलि चढ़ाई। देवी ने श्राप दिया—‘हर रात यहाँ आत्माएँ भटकेंगी। जो आएगा, वह कैद हो जाएगा।’”
रवि ने चारों तरफ देखा। दीवारों पर साँपों की संगमरमर की आकृतियाँ खुदी थीं। अचानक वे हिलने लगीं—फुफ... फुफ...। साँप लंबे होकर फिसलने लगे, असली जैसे। एक साँप ने रवि के पैर की ओर लपका। वह चीखा और भागा, लेकिन हँसी की गूँज पीछा कर रही थी। “भाग न सकेगा तू...”
तीसरा भाग
रवि भागते-भागते हवेली के तहखाने में पहुँचा। सीढ़ियाँ टूटी हुईं थीं, हर कदम पर कंकड़ सरकते। तहखाने में अंधेरा गाढ़ा था, हवा में सड़ांध की बू। बीच में एक जंग लगी मेज पर पुरानी डायरी पड़ी थी। रवि ने टॉर्च से पढ़ा: “सन 1857। राजा विक्रम ने नागदेवी की पूजा की। अमरत्व के लालच में अपनी बेटी की बलि दी। देवी प्रकट हुईं—‘तेरी हवेली श्रापित। हर पीढ़ी एक आत्मा कैद होगी। दीये जलेंगे, साँप जागेंगे, और परछाइयाँ निगलेंगी। कोई मुक्ति नहीं।’ डायरी के आखिरी पन्ने पर खून से लिखा था—‘मैं विक्रम हूँ। अब मैं भी कैदी।’”
रवि काँप गया। “ये सच है...” तभी तहखाने की दीवारें कँपने लगीं। जमीन फट गई, काला धुआँ उठा। उसी औरत की परछाई सामने—अब कई परछाइयाँ। “अब तू भी हमारा हो गया। श्राप का हिस्सा।” रवि चीखा, “नहीं! मुझे बाहर जाने दो!” लेकिन दरवाज़ा बंद। टॉर्च बुझ गई। अंधेरे में साँपों की फुफकार घेर ली। दीवारों से काले हाथ निकले—नाखून लंबे, ठंडे। वे रवि को खींचने लगे। उसने आखिरी दम में नोटबुक खोली और लिखा—“यह हवेली सचमुच शापित है। साँप जीवित, हाथ पकड़ते हैं। अगर कोई पढ़े, कभी मत आना। मेरी कहानी अधूरी... कोई पूरा करो।” फिर सब शांत।
समापन
अगली सुबह गाँव वाले हवेली के पास पहुँचे। दरवाज़े पर रवि की नोटबुक पड़ी थी, पन्ने खून से सने। रवि गायब। शंकर ने पढ़ी तो काँप गया। अब हवेली से रात को नई आवाज़ आती—“मेरी कहानी अधूरी है... कोई इसे पूरा करो।” गाँव वाले कहते, एक और आत्मा जुड़ गई। लेकिन कौन सुनेगा? श्राप जारी है।