I will come secretly - Part 9 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 9

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 9

लेखक - एसटीडी मौर्य ✍️

कटनी मध्य प्रदेश  भारत 

जैसे ही हम कमरे में पहुँचे, मैंने उत्साहित होकर कहा—

“अरे अंकिता! देखो… मम्मी को होश आ गया है!”
अंकिता खुशी से बोली—
“हाँ भैया… अब मम्मी ठीक हैं।”
हम तीनों तुरंत मम्मी के पास जाकर बैठ गए।
अंकिता मम्मी के पैरों को दबाने लगी,
और प्रियांशी मम्मी के सिर में हल्के-हल्के तेल लगाने लगी।
मम्मी बोलीं—
“अरे बेटी, रहने दो… मैं अब ठीक हूँ, सिर पर तेल मत लगाओ।”
प्रियांशी मुस्कुराकर बोली—
“नहीं आंटी जी, आप अभी ठीक नहीं हैं… आप बस आराम कीजिए।”
मम्मी फिर बोलीं—
“अरे बेटी, रहने दो… अंकिता ही कर देगी। तुम कर रही हो, अच्छा नहीं लगता।”
प्रियांशी हल्का सा हँसते हुए बोली—
“क्यों आंटी जी? क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ… या मुझे पराया समझ रही हैं?”
मम्मी तुरंत बोलीं—
“अरे नहीं-नहीं… तुम तो बिल्कुल मेरी बेटी जैसी हो।”
यह सब सुनकर मैं अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहा था।
मम्मी ने मुझे देख लिया और बोलीं—
“अरे नालायक! तू अंदर ही अंदर हँस क्यों रहा है?”
यह सुनकर प्रियांशी हँस पड़ी।
अंकिता भी मज़ाक में बोली—
“हाँ, हमारे नालायक भैया कैसे हो?”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे चुड़ैल! तेरी चोटी काट दूँगा।”
हम सब हँसने लगे।
प्रियांशी मुस्कुराते हुए बोली—
“आप दोनों तो बहुत लड़ते हो… आंटी जी, इन्हें थोड़ा मारो, तभी सुधरेंगे।”
मम्मी बोलीं—
“इसकी शादी कर देंगे, तब अपने आप सुधर जाएगा।”
यह सुनकर प्रियांशी हल्का सा मुस्कुराने लगी—
“हाँ, बिल्कुल…”
थोड़ी देर बाद हमने पापा को बुलाकर मम्मी के पास बैठा दिया और हम तीनों मार्केट जाने के लिए निकल गए।
शाम भी हो चुकी थी, इसलिए हमने सोचा कि बाहर ही खाना खा लें और पापा-मम्मी के लिए पैक करवा लाएँ।
हम तीनों साथ-साथ चल रहे थे—
प्रियांशी ने मेरा हाथ पकड़ रखा था,
और अंकिता ने प्रियांशी का हाथ।
पापा ने यह सब खिड़की से देख लिया था…
हम अपनी ही बातों में इतने खोए हुए थे कि आसपास की कोई आवाज़ हमें सुनाई ही नहीं दे रही थी।
हम सड़क पर चल रहे थे, लेकिन हमारी नज़रें एक-दूसरे पर ही टिकी थीं…
कुछ देर बाद प्रियांशी के पापा का कॉल आया।
प्रियांशी ने फोन उठाया—
“नमस्ते पापा, मैं ठीक हूँ… अभी मैं मार्केट में हूँ।”
पापा बोले—
“ठीक है बेटी, घर पहुँचकर कॉल करना।”
प्रियांशी बोली—
“ठीक है पापा, बाद में बात करती हूँ… बाय।”
इतना कहकर उसने कॉल कट कर दिया…
फिर हम लोग एक छोटे से होटल (टपरी) पर पहुँचे।
प्रियांशी इधर-उधर देखते हुए बोली—
“अंकिता, देखो… यहाँ तो बाटी-चोखा बन रहा है! मैं तो बाटी-चोखा ही खाऊँगी… तुम लोग भी खाओगे?”
अंकिता तुरंत बोली—
“हाँ! यहाँ का बाटी-चोखा बहुत मशहूर है। दूर-दूर से लोग खाने आते हैं… भले ही यह टपरी ही क्यों न हो।”
प्रियांशी खुश होकर बोली—
“तो चलो, आज इसी टपरी में बैठकर खाते हैं… देखो ना, कितनी गरम-गरम बाटी बन रही है!”
फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए शरारती अंदाज़ में कहा—
“क्या बात है जी… आपके मुँह में पानी नहीं आ रहा?”
मैं मुस्कुराकर बोला—
“नहीं पगली! मैं तो अक्सर खाता रहता हूँ, इसलिए अब इतना एक्साइटमेंट नहीं होता।”
प्रियांशी तुरंत बोली—
“अच्छा! तो क्या मैं नहीं खाती हूँ क्या?”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे नहीं पगली, तुम गलत समझ रही हो… तुम खाओ, मैं भी खाऊँगा।”
अंकिता यह सब देख मुस्कुराते हुए बोली—
“सुनो भाभी… आप मेरे भैया की बातों में मत आना, ये तो बस ऐसे ही बनते हैं।”
यह सुनते ही मैं चौंक गया—
“अरे! क्या बोल रही है तू?”
प्रियांशी शर्माते हुए हल्का सा मुस्कुरा दी और बोली—
“अंकिता… चुप भी रहो!”
अंकिता हँसते हुए बोली—
“क्यों? सच ही तो कह रही हूँ…”
हम तीनों हँसते हुए टपरी पर बैठ गए।
थोड़ी ही देर में गरम-गरम बाटी, चोखा और घी की खुशबू हमारे सामने आ गई…
हमने खाना शुरू किया—
और हर निवाले के साथ थकान जैसे धीरे-धीरे खत्म होने लगी…
लेकिन उस शाम का असली स्वाद सिर्फ खाने में नहीं था…
बल्कि उस साथ में था, जो हम तीनों के बीच बनता जा रहा था…
ऐसे ही बातें करते-करते काफी समय बीत गया।
हम लोग शाम करीब 7 बजे मार्केट गए थे और जब वापस लौटे, तो 9 बज चुके थे।
मैंने थोड़ा घबराते हुए कहा—
“चलो जल्दी चलते हैं… हम लोग काफी लेट हो गए हैं, नहीं तो पापा डाँटेंगे।”
अंकिता हँसते हुए बोली—
“पापा तो तुम्हें डाँटेंगे भैया… हमें क्या! तुम ही सुनना उनकी बातें।”
प्रियांशी भी मुस्कुराते हुए बोली—
“हाँ, अंकिता सही कह रही है…”
हम तीनों हँसते हुए अस्पताल की ओर चल पड़े।
कुछ ही देर में हम अस्पताल पहुँच गए।
मैंने खाना रखते हुए कहा—
“लो पापा, पहले आप खाना खा लो… मम्मी, आप भी थोड़ा खा लो।”
प्रियांशी ने भी कहा—
“हाँ अंकल जी, आप लोग खा लीजिए… काफी देर हो गई है।”
यह कहकर प्रियांशी ने खाना खोलकर सबको परोसना शुरू कर दिया।
तभी कुछ ही पल बाद एक नर्स कमरे में आई और मम्मी से बोली—
“अब कैसा लग रहा है आपको?”
मैंने जैसे ही उसकी तरफ देखा, मैं थोड़ा चौंक गया—
“अरे… आप यहाँ?”
वह नर्स कोई और नहीं, बल्कि गुड़िया ही थी।
गुड़िया मुस्कुराते हुए बोली—
“अरे आप लोग? आप यहाँ कैसे?”
मैंने कहा—
“ये मेरी मम्मी हैं… ये बीमार हैं, इसलिए हम यहाँ अस्पताल में हैं।”
गुड़िया तुरंत गंभीर होकर बोली—
“अच्छा… कोई बात नहीं। अब मैं आ गई हूँ, आप लोग चिंता मत कीजिए।
मैं मम्मी का अच्छे से ध्यान रखूँगी… और इन्हें जल्दी ठीक कर देंगे।”
उसकी बात सुनकर जैसे हमारे दिल को थोड़ी राहत मिल गई…
पापा ने गुड़िया की ओर देखते हुए कहा—
“अरे बेटी, क्या तुम पहले कभी मेरे बच्चों से मिली हो?”
गुड़िया मुस्कुराकर बोली—
“जी अंकल जी… हम लोग दो दिन पहले ही ट्रेन में मिले थे।”
इसके बाद गुड़िया ने मम्मी का बीपी चेक किया और बोली—
“ठीक है, अब मैं चलती हूँ… बाकी मरीजों को भी देखना है।”
मैंने कहा—
“ठीक है… जब समय मिले तो फिर आइएगा, साथ में बैठकर बातें करेंगे।”
गुड़िया हल्का सा मुस्कुराई और वहाँ से चली गई।
कुछ देर बाद पापा ने खाना खा लिया और मुझे इशारे से बुलाया—
“अरे बेटा, जरा इधर आना… कुछ बात करनी है।”
मैंने कहा—
“जी पापा, आता हूँ।”
मैं और पापा थोड़ा दूर आ गए, ताकि अंकिता और प्रियांशी हमारी बातें न सुन सकें।
पापा धीरे से बोले—
“सच-सच बता… ये लड़की (प्रियांशी) तुझे पसंद करती है ना?
और तू भी उसे पसंद करता है?”
मैं थोड़ा घबरा गया और बोला—
“नहीं पापा… ऐसी कोई बात नहीं है अभी। जब कुछ होगा, तो मैं आपको खुद बता दूँगा।”
पापा ने गंभीर होकर कहा—
“मुझसे मत छुपा… सच बता।
नहीं तो मैं खुद उसके पापा से बात कर लूँगा।”
मैं जल्दी से बोला—
“नहीं पापा! ऐसा मत करना… मैं घर जाकर आपको सब बता दूँगा।”
पापा मुझे देखते रहे, फिर हल्का सा मुस्कुरा दिए।
मैं वापस आकर मम्मी के पास बैठ गया।
तभी अंकिता शरारती अंदाज़ में बोली—
“देख रही हो मम्मी… पापा से पुसुर-पुसुर बात करके आ गया।
पक्का मेरी ही बुराई कर रहा था!”
मैं तुरंत बोला—
“नहीं चुड़ैल! तेरी नहीं… कुछ और बात थी।”
अंकिता मुँह बनाते हुए बोली—
“तो फिर बताओ ना, क्या बात हुई?”
पापा भी मुस्कुराते हुए बोले—
“अरे अंकिता बेटी, क्यों अपने भाई पर गुस्सा कर रही हो… तुम्हारी ही बातें कर रहे थे।”
अंकिता तुरंत बोली—
“देखा! मैं कह रही थी ना!”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे आ इधर… बताता हूँ तुझे।”