Chupke Chupke Anunga - Part 5 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 5

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 5

जैसा कि पिछले भाग में मैंने बताया था, हमारे रिश्ते की बात धीरे-धीरे घर के लोगों तक पहुँच गई थी। पहले तो सबको थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन बाद में घर में इस बात पर चर्चा होने लगी कि अगर हम दोनों एक-दूसरे को सच में चाहते हैं, तो आगे क्या किया जाए।
दादी तो शुरू से ही हमारे साथ थीं। वह बार-बार यही कहती थीं कि लड़की की खुशी सबसे बड़ी होती है। लेकिन घर के कुछ लोग अभी भी सोच में पड़े थे। इसी बीच घर में यह भी बात उठने लगी कि अगर सब ठीक रहा, तो शादी की तैयारी के बारे में भी सोचना पड़ेगा।
इन्हीं बातों के बीच घर का माहौल कभी हल्का-फुल्का तो कभी गंभीर हो जाता था। हम दोनों भी समझ नहीं पा रहे थे कि आगे क्या होगा।
अब आगे की कहानी यहीं से शुरू होती है…

प्रियांशी की मौसी यह कहकर भी कान भरने लगीं कि वह लड़का कहीं किसी अन्य जाति का न हो। पहले देख लो, पूछ लो। नहीं तो समाज हमें क्या कहेगा? हम समाज को क्या मुँह दिखाएँगे? सोच लो, तब उस लड़की से शादी करने के लिए सोचना।
यह सब देखकर मेरा मन थोड़ा टूट गया। जब यह बात मैंने प्रियांशी को बताई, तो वह भी उदास हो गई। यही सोचकर कि हमारी शादी नहीं हो पाएगी, क्योंकि हम दोनों अलग-अलग जाति और धर्म के हैं।
लेकिन जब यह बात प्रियांशी की दादी को पता चली, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। वह चाहती थीं कि उनकी नातिन सुखी रहे। उन्होंने कहा कि चाहे किसी दूसरे लड़के से शादी करें या अपने मन से, वही शादी करेंगे जो मेरी नातिन को पसंद हो, क्योंकि मेरी नातिन को ही उस लड़के के साथ रहना है, हमें नहीं।
यह बात सुनकर मुझे अच्छा लगा और प्रियांशी को भी। लेकिन प्रियांशी के पापा के मन में कुछ गलत भाव आ गए। वह मेरे साथ शादी करने से इनकार करने लगे।
प्रियांशी के पापा ने कहा—
“यह शादी नहीं हो सकती, जब तक लड़के के बारे में पूरी जानकारी न हो जाए। लड़के को बुलाओ।”
प्रियांशी ने कहा—
“ठीक है पापा, मैं उन्हें कॉल करके बुलाती हूँ।”
प्रियांशी ने मुझे कॉल किया और कहा—
“आप कहाँ हो?”
मैंने कहा—
“घर में हूँ। क्या कोई काम है?”
प्रियांशी बोली—
“क्या आप मेरे घर आ सकते हैं? पापा बुला रहे हैं, कुछ काम है।”
मैंने कहा—
“ठीक है, मैं पाँच मिनट में आ रहा हूँ।”
प्रियांशी बोली—
“ठीक है, आप आराम से आओ।”
यह कहकर उसने कॉल काट दी।
फिर मैं प्रियांशी के घर गया। वहाँ उसके पापा, दादी और भाई बैठे थे। मैं वहाँ पहुँचा और पूछा—
“आप लोगों ने मुझे बुलाया है क्या?”
प्रियांशी के पापा बोले—
“हाँ बेटा, मैंने ही बुलाया है। तुम्हारे बारे में कुछ जानना है।”
मैं सोचने लगा कि मेरे बारे में क्या पूछेंगे। फिर मैंने कहा—
“जी अंकल जी, पूछिए।”
प्रियांशी के पापा बोले—
“तुम्हारे पापा क्या करते हैं?”
मैंने कहा—
“कुछ नहीं, बस खेती-बाड़ी संभालते हैं। और मैं भी कभी-कभी उनका सहयोग करता रहता हूँ।”
प्रियांशी के पापा बोले—
“ठीक है, और तुम क्या करते हो? कितनी पढ़ाई की है?”
मैंने कहा—
“अंकल जी, मैंने ज़्यादा पढ़ाई नहीं की है। बस 12वीं तक पढ़ाई की है। और मैं कविता लिखता हूँ। सामाजिक सेवा की सोच रखता हूँ और दबे हुए लोगों की आवाज़ बुलंद करता हूँ।”
प्रियांशी के पापा बोले—
“ठीक है, बहुत अच्छा। तो तुम लेखक और कवि भी हो?”
“क्या कोई पुस्तक लिखी है या नहीं?”
मैंने कहा—
“जी हाँ, मैं लेखक और कवि हूँ। मेरी एक किताब भी प्रकाशित हुई है — ‘रूह की स्याही’।”
प्रियांशी के पापा बोले—
“बहुत खूब। क्या मैं तुम्हारा पूरा नाम जान सकता हूँ?”
मैंने कहा—
“क्यों नहीं, मेरा नाम सत्येंद्र कुमार है।”
प्रियांशी के पापा कहते हैं—
“ठीक है बेटा, तुम्हारी जाति क्या है?”
मैंने कहा—
“अंकल जी, जाति से क्या मतलब? मैं तो एक इंसान हूँ। मैं और मेरे घर के लोग जाति-धर्म को नहीं मानते।”
प्रियांशी के पापा कहते हैं—
“ऐसा क्यों? यह तो सबको मानना पड़ता है। फिर तुम क्यों नहीं मानोगे?”
(डाँटते हुए कहा)
मैंने शांत स्वर में कहा—
“अंकल जी, आपका गुस्सा होना जायज़ है। मान लीजिए आप कहीं गए हैं और वहाँ रहना भी जरूरी हो गया है। तब आप क्या करेंगे?”
प्रियांशी के पापा बोले—
“कुछ नहीं, मैं अपने लोगों को तलाश करूँगा और उन्हें अपनी जरूरी बात बताऊँगा।”
मैंने कहा—
“अगर वहाँ आपके समाज का कोई भी व्यक्ति न हो तो?
और आपको बहुत तेज भूख-प्यास लगी हो, यहाँ तक कि आप बेहोश हो जाएँ, तब क्या करेंगे?
अगर किसी दूसरे समाज के लोग आपकी सहायता करें तो?”
मेरी बात सुनकर प्रियांशी के पापा कुछ पल के लिए चुप हो गए।
उन्होंने मेरी ओर देखा और धीरे से बोले—
“तब तो… जो भी मदद करेगा, उसकी मदद लेनी ही पड़ेगी। आखिर इंसानियत भी कोई चीज होती है।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“बस अंकल जी, मैं भी यही कहना चाहता हूँ।
जब मुश्किल समय में इंसान को इंसान ही सहारा देता है, तब जाति और धर्म पीछे रह जाते हैं।
मेरे लिए सबसे बड़ी पहचान इंसानियत है।”
मेरी यह बात सुनकर कमरे में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
प्रियांशी की दादी मुझे देखकर हल्के से मुस्कुरा रही थीं, और प्रियांशी भी चुपचाप खड़ी मेरी बात सुन रही थी।
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